लोक संस्कृति के रंग से सराबोर हुई ग्रीष्मकालीन राजधानी

–भराड़ीसैंण से महिपाल गुसाईं-
उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण स्थित विधानसभा परिसर और विधानभवन बजट सत्र के दौरान पूरी तरह उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया। बजट सत्र के पहले दिन विधानसभा भवन में राज्यपाल, मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों, विधायकों का स्वागत वेद मंत्रों और स्वस्ति वाचन से हुआ। पर्वतीय लोक संस्कृति में नया कार्य शुरू करने से पूर्व स्वस्ति वाचन की वैदिक परम्परा सदियों से चली आ रही है, वहीं विधानसभा भवन में बने उत्तराखण्ड शोध संस्थान के सभागार में प्रदर्शित पहाडी पेंटिग और पहाड़ के धार्मिक – सांस्कृतिक आयोजनों यथा देव नृत्य आदि में प्रयोग आने वाले काष्ठ मुखौटों की अप्रतिम छटा सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र बनी। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है। कि बजट सत्र में अपने अभिभाषण के तुरंत बाद राज्यपाल ले.ज. गुरमीत सिंह और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं इस कला संसार का अवलोकन किया।
उत्तराखंड की लोक संस्कृति और कला के इस अदभुत संग्रह और इसके प्रदर्शन की राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने मुक्तकंठ से सराहना की। कलादीर्घा की सराहना से विधानसभा अध्यक्ष ऋतु भूषण खंडूडी गदगद नजर आई। उन्होंने विधानभवन में उत्तराखण्ड की कला, संस्कृति, काष्ठ मुखौटों के अवलोकन के बाद इसकी सराहना करने पर राज्यपाल का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके द्वारा उत्तराखण्ड की कला – संस्कृति के प्रति जिस तरह से दिलचस्पी दिखाई गई, यह हमारे साथ ही तमाम कलाकारों के लिए उत्साहवर्धक है।
स्पीकर श्रीमती ऋतु भूषण खंडूड़ी इस बात से प्रसन्न नजर आई कि राज्यपाल ने प्रोटोकॉल से इतर उत्तराखण्ड शोध संस्थान केन्द्र के सभागार में लगी पेंटिंग्स और काष्ठ मुखौटा कला को देखने में विशेष रुचि दिखाई, वह निसंदेह कुछ नया करने के प्रति प्रोत्साहन है।
उल्लेखनीय है कि भराड़ीसैंण स्थित विधानभवन में सीएम पुष्कर सिंह धामी और विधानसभा अध्यक्ष ऋतु भूषण खंडूड़ी की संयुक्त पहल पर उत्तराखण्ड शोध संस्थान केन्द्र बनाया गया है। इस केंद्र में संस्कृति, विचार विमर्श और सृजनात्मक कार्यों का आयोजन होता है।
सोमवार से शुरू हुए बजट सत्र से पूर्व इस केन्द्र में नवोदित कलाकारों और पहाडी़ पेंटिंग की अनेक आकर्षक कृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। सबसे अधिक आकर्षण का केन्द्र मानवता की अमूर्त विश्व धरोहर रम्माण संस्कृति के काष्ठ शिल्प के मुखौटे हैं।
मुखौटे बने कलादीर्घा के आकर्षण
विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी ने बताया उत्तराखण्ड शोध संस्थान केन्द्र की कलादीर्घा में पहाडी़ पेंटिंग और रम्माण संस्कृति के मुखौटों सहित कई अन्य कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं। वस्तुत यह उत्तराखंड के लोक समाज की सांस्कृतिक उपलब्धि का झरोखा सा है। भविष्य में शोधकर्ताओं के लिए यह उपयोगी केंद्र सिद्ध हो सकता है। इस बात की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।
रम्माण के मुखौटों का अलग संसार
रम्माण संस्कृति के काष्ठ शिल्प और अन्य देव नृत्यों के काष्ठ मुखौटे पूरे विश्व में विख्यात हैं। उत्तराखण्ड के चमोली जिले में अभी भी मुखौटा कला विद्यमान है। चाहे रम्माण हो या चंडिका देवयात्रा। मुखौटा लोक जीवन की अभिव्यक्ति का बड़ा माध्यम हैं। बेशक इस कला के पुराने कलाकार अब वृद्ध हो गये हैं किंतु संतोष की बात यह है कि नयी पीढ़ी इस कला से जुड़ रही है और इस कला को आगे भी बढ़ा रही है। जोशीमठ के निकट सलूड डूंग्रा में आज भी ये विशिष्ट मुखौटे बनाए जा रहे हैं और नए बच्चे इसे सीख कर अपनी लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में योगदान दे रहे हैं।
