धर्म/संस्कृति/ चारधाम यात्राब्लॉग

गीता का अद्भुत दर्शन और लोकमान्य तिलक की अद्वितीय दृष्टि

गोविन्द प्रसाद बहुगुणा

बहुत दिनों से गीता का स्वाध्याय रुका हुआ था। आज फिर लंबे अंतराल के बाद “गीता रहस्य” का पन्ना खोला। हर बार की तरह पहला ही भाव मन में आया—आधुनिक समय में गीता के सर्वश्रेष्ठ टीकाकार और भाष्यकार यदि कोई थे तो वह निःसंदेह लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक थे।

तिलक लिखते हैं कि कोई भी लेखक किसी विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही अपना ग्रंथ लिखता है, और जब वह उद्देश्य सिद्ध हो जाता है तभी उसकी रचना पूर्ण होती है। मीमांसकों ने किसी भी ग्रंथ के तात्पर्य का निर्णय करने के लिए सात साधनों (लिंगों) का उल्लेख किया है—

उपक्रमोपसंहारो अभ्यासोSपूर्वता फलम् ।
अर्थवादोपपत्ति च लिंग तात्पर्यनिर्णये ॥”

अर्थात किसी भी ग्रंथ की मूल बात समझने के लिए सात बिंदु महत्वपूर्ण होते हैं—

1. उपक्रम (Beginning) – ग्रंथ की शुरुआत ही संकेत देती है कि इसमें क्या मिलने वाला है।

2. उपसंहार (Conclusion) – लेखक अपनी बात कहाँ समाप्त करता है, यह भी दिशा दिखाता है।

3. अभ्यास – किस विषय पर बार–बार चिंतन किया गया है।

4. अपूर्वता – ग्रंथ में क्या नया कहा गया है जो पहले नहीं कहा गया था।

5. फल – लेखन का परिणाम और उसका पाठकों पर प्रभाव।

6. अर्थवाद – ग्रंथ का मूल प्रयोजन और उसके पीछे की भावना।

7. उपपत्ति – यह ग्रंथ किन नए निष्कर्षों, उपायों या जीवन-पद्धतियों को जन्म देता है।

तिलक कहते हैं कि गीता के अध्ययन में इन संकेतों को समझे बिना कोई पाठक उसके गूढ़ संदेश तक नहीं पहुँच सकता।

अर्जुन का संशय: युगों–युगों से चलता प्रश्न

ग्रहण कीजिए—गीता के प्रारम्भ में अर्जुन दो विपरीत धर्मों के संघर्ष में फँसकर कर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। जो स्थिति उस पर आई, वह कोई अद्भुत या पहली बार हुई बात नहीं थी। समाज में रहकर धर्म और नीति के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करने वाले कर्मशील व्यक्तियों के सामने ऐसे अवसर बार–बार आते हैं।

संन्यास ग्रहण कर पलायन कर जाने वाले या दुर्बल लोग तो अन्याय सहन कर लेते हैं, परंतु जो समाज में रहकर धर्मानुसार कर्तव्य निभाते हैं, वही अक्सर इस प्रकार के नैतिक द्वंद्व में उलझते हैं। अर्जुन की यही स्थिति थी—युद्ध के आरम्भ में ही कर्तव्य और मोह के संघर्ष ने उसे आ घेरा।युद्धिष्ठिर भी इसी प्रकार के मोह से ग्रस्त हुए थे—युद्धोपरांत रिश्तेदारों के श्राद्ध करते समय उन्होंने राजपाट त्यागने का विचार बना लिया था। तब उनकी रक्षा के लिए महाभारत में शांतिपर्व जोड़ा गया।

कर्म–अकर्म का प्रश्न साहित्य में सर्वत्र

कर्म और अकर्म के इसी प्रकार के संशय साहित्य में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। उदाहरण के लिए—

हेमलेट का द्वंद्व

शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक हेमलेट को ही लीजिए। डेनमार्क के राजकुमार हेमलेट के चाचा क्लाडियस ने उसके पिता की हत्या कर दी, उसकी माता को अपनी पत्नी बना लिया और राजगद्दी छीन ली।
अब युवा हेमलेट के सामने नैतिक प्रश्न खड़ा हुआ—

क्या पापी चाचा का वध करके पुत्रधर्म निभाए?

या फिर उसी चाचा पर दया करे जो अब उसका सौतेला पिता भी बन चुका था?इस द्वंद्व के कारण वह लगातार विलंब करता गया और अंततः मानसिक अशांति तथा विषाद का शिकार हो गया। उसके पास कृष्ण जैसा मार्गदर्शक नहीं था, इसलिए वह दिशा खो बैठा।

हेमलेट में अनगिनत नैतिक और मनोवैज्ञानिक प्रश्न समाहित हैं। समीक्षक इन्हीं उलझनों पर गंभीर विचार रखते आए हैं।

कृष्ण का समाधान

गीता में कृष्ण अर्जुन को यही समझाते हैं—
कर्म क्या है? अकर्म क्या है? किस कर्म को धर्म कहा जाए और किसे धर्म–विरुद्ध?कर्म–अकर्म की यह उलझन हर युग में मनुष्य के सामने खड़ी होती है।

लोकमान्य तिलक गीता रहस्य में यही बताते हैं कि—

**गीता का केंद्रीय संदेश कर्म है—

कर्तव्यपरायण, निष्काम, और लोककल्याणकारी कर्म।**

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