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यह आनुवंशिक रूप से परिवर्तित फफूंदी आपकी मच्छर समस्या का हल बन सकती है

अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि बीमारी फैलाने वाले मच्छर इस फफूंदी की मीठी गंध के आकर्षण से खुद को रोक नहीं पाए और अंततः उससे संक्रमित होकर मर गए।


-लेखक: जेसन पी. डिन्ह-

 1 नवम्बर 2025, 

सावधान रहिए, डीईईटी (DEET)! मच्छरों से निपटने का एक नया तरीका सामने आया है — जिसमें गंध का भ्रम, आनुवंशिक अभियांत्रिकी और एक घातक संक्रमणकारी फफूंदी शामिल है।

हाल ही में नेचर माइक्रोबायोलॉजी (Nature Microbiology) पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि मेटारहाइज़ियम (Metarhizium) नामक फफूंदी — जो पहले से ही कई कीटों को नियंत्रित करने में प्रयुक्त होती है — को आनुवंशिक रूप से इस प्रकार संशोधित किया जा सकता है कि यह अत्यधिक मात्रा में एक मीठी गंध वाला रासायनिक यौगिक उत्पन्न करे, जो मच्छरों के लिए अप्रतिरोध्य (irresistible) हो जाता है।

जब वैज्ञानिकों ने इस संशोधित फफूंदी को मच्छर-फंदों (traps) में प्रयोग किया, तो प्रयोगशाला में 90 से 100 प्रतिशत तक मच्छर मारे गए। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका मच्छरों को नियंत्रित करने का एक किफायती, विस्तार योग्य (scalable) और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प साबित हो सकता है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो के जीवविज्ञानी नोआ रोज़ ने कहा, “यह शोध रोचक है क्योंकि इसमें पारंपरिक जैविक नियंत्रण की अवधारणा को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि यह विचार व्यवहारिक रूप से कारगर हो सकता है।”

मच्छरों को दुनिया का सबसे घातक जीव माना जाता है — वे मलेरिया, डेंगू और अन्य बीमारियाँ फैलाते हैं, जो हर वर्ष लगभग 70 करोड़ लोगों को संक्रमित करती हैं और लगभग 10 लाख लोगों की जान लेती हैं।

स्वास्थ्य विभाग मच्छर नियंत्रण के लिए फॉगिंग (fumigation) और कीटनाशक-युक्त जालियों का उपयोग करता है, लेकिन समय के साथ कई मच्छर रासायनिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक बन चुके हैं।

नई तकनीकें इन कीटों को नियंत्रित करने के लिए जैविक उपाय अपनाती हैं — जैसे वोल्बेशिया (Wolbachia) नामक जीवाणु से मच्छरों को संक्रमित कर बीमारियों के प्रसार को रोकना, या उन्हें विकिरण (radiation) से बाँझ बनाना। नवीनतम अध्ययन में एक और तरीका सामने आया है — एक ऐसी फफूंदी जो अपनी सुगंध से मच्छरों को आकर्षित कर उनकी मृत्यु का कारण बनती है।

मेटारहाइज़ियम एक प्राकृतिक फफूंदी है जो लॉन्गिफोलीन (longifolene) नामक लकड़ी जैसी सुगंधित गैस उत्सर्जित करती है — यह वही यौगिक है जिसका उपयोग इत्र उद्योग में भी किया जाता है। यह फफूंदी खुद को एक “सुगंधित फूल” के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसकी ओर मच्छर आकर्षित होते हैं। फफूंदी के बीजाणु (spores) मच्छरों के शरीर में प्रवेश कर उन्हें भीतर से नष्ट कर पोषक तत्व प्राप्त करते हैं।

हालाँकि, स्वाभाविक रूप से मेटारहाइज़ियम केवल तब लॉन्गिफोलीन उत्पन्न करती है जब वह पहले ही किसी कीट को मार चुकी होती है।

इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने मेटारहाइज़ियम की एक ऐसी प्रजाति तैयार की, जो लगातार और अत्यधिक मात्रा में लॉन्गिफोलीन बनाती रहती है। इसके लिए उन्होंने पाइन (देवदार) वृक्ष से लॉन्गिफोलीन संश्लेषण करने वाला जीन लेकर फफूंदी में प्रविष्ट कराया।

शोधकर्ताओं ने इस संशोधित फफूंदी को गेहूँ और चावल से बने सस्ते माध्यम पर उगाया और इसे चौकोर फंदों में स्थापित किया, जो आकार में किसी पत्रिका से थोड़ा छोटा था।

प्रयोगशाला परीक्षणों में पाँच दिनों के भीतर इन फंदों ने आधे से अधिक मच्छरों को मार दिया, और कुछ दिनों में लगभग सभी मच्छर मर गए। यहाँ तक कि जब वैज्ञानिकों ने कमरे में मानव गंध सहित प्रतिस्पर्धी सुगंधें भी रखीं — जहाँ स्वयंसेवक मच्छरदानी के नीचे सो रहे थे — तब भी फफूंदी वाले फंदे अधिक प्रभावी साबित हुए।

मैरीलैंड विश्वविद्यालय के माइकोलॉजिस्ट और कीट वैज्ञानिक डॉ. रेमंड सेंट लेजर, जो इस अध्ययन के प्रमुख लेखक हैं, ने बताया कि उनकी टीम ने ऐसा फंदा डिज़ाइन किया है, जिसमें केवल मच्छरों के प्रवेश योग्य छोटे-छोटे छिद्र हैं। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि फंदे किसी उपयोगी या दुर्लभ कीट को नुकसान न पहुँचाएँ। टीम जल्द ही इन नमूनों का बाहरी वातावरण में परीक्षण करेगी।

डॉ. सेंट लेजर का कहना है कि यह तकनीक अन्य मच्छर नियंत्रण विधियों का विकल्प नहीं बल्कि पूरक के रूप में काम करेगी। वे और उनकी टीम यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि मेटारहाइज़ियम को अन्य जैविक नियंत्रण तकनीकों के साथ मिलाकर कैसे उपयोग किया जा सकता है।

उनके अनुसार, इस पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि फफूंदी का उत्पादन सरल और सस्ता है। चीन में उनकी टीम ने पहले से ही मेटारहाइज़ियम उत्पादन के लिए एक कारखाना स्थापित किया है, जबकि विश्व के ग्रामीण समुदाय इसे चावल और मुर्गी की बीट पर भी उगा सकते हैं।

डॉ. नोआ रोज़ के अनुसार, इस तकनीक की सफलता का एक और पहलू यह है कि मच्छरों के लिए इसके प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना कठिन होगा।

उन्होंने कहा, “मच्छर हमेशा इंसानी प्रयासों से बच निकलने का तरीका खोज लेते हैं। इस स्थिति में फफूंदी और कीटों के लाखों वर्षों के प्राकृतिक विकास को हमारे पक्ष में काम करने देना समझदारी है।”

उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “मुझे यह विचार पसंद है कि अब हमें उन्हें मारने के लिए भागना नहीं पड़ेगा — वे खुद हमारे पास आएँगे, और प्रकृति उनके लिए न्याय कर देगी।”

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