यह जोंक केवल खून की भूखी नहीं थी…
437 मिलियन वर्ष पुराना एक जीवाश्म, जो विस्कॉन्सिन में मिला है, अब तक का सबसे प्राचीन ज्ञात जोंक हो सकता है।

-जैक टैमिसीया-
1 अक्तूबर, 2025
आज यदि आप अमेरिका के विस्कॉन्सिन राज्य के वॉकेशा काउंटी में नज़र डालें तो वहां का शांत परिदृश्य देखकर किसी को भी यह कल्पना करना कठिन होगा कि कभी यहां उष्णकटिबंधीय समुद्र तट पर ट्राइलोबाइट्स, सबसे पुराने बिच्छू और जबड़ों से रहित कशेरुकी जीवों की भरमार हुआ करती थी। लेकिन 43.7 करोड़ वर्ष पहले, सिल्यूरियन काल में, ये जीव यहीं रहते और मरते थे। कुछ जीव समुद्र की खारी खाड़ी में बहकर आ जाते और सूक्ष्मजीवों की परतों के नीचे दबकर अद्भुत ढंग से संरक्षित हो जाते। मुलायम शरीर वाले कई जीव तो इतनी बारीकी से सुरक्षित हुए कि उनकी आंखें, आंतें और यहां तक कि दिल के निशान तक मिलते हैं।
हाल ही में वैज्ञानिकों की एक टीम ने यहां से एक नया जीवाश्म खोजा है—अब तक ज्ञात सबसे पुरानी जोंक। बुधवार को पीयरजे नामक पत्रिका में प्रकाशित शोधपत्र में बताया गया कि यह परजीवी कृमि जोंकों की उत्पत्ति को कम से कम 20 करोड़ वर्ष पीछे ले जाता है। इसमें चूषण की असाधारण शक्ति और आश्चर्यजनक भोजन-प्रियता भी पाई गई।
आज की जोंक कभी मित्र तो कभी शत्रु मानी जाती है—एक ओर पारंपरिक चिकित्सा में खून निकालने में सहायक, तो दूसरी ओर दलदली क्षेत्रों में यात्रियों के लिए खतरा। लेकिन जोंकों की विकास यात्रा अब तक रहस्यमय रही है, क्योंकि इनके मुलायम शरीर शायद ही कभी जीवाश्म के रूप में सुरक्षित रह पाते हैं।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, रिवरसाइड के पैलियंटोलॉजिस्ट और शोधपत्र के सहलेखक डॉ. कर्मा नांगलू कहते हैं—“जोंक जीवन वृक्ष की पूरी एक शाखा है, जिसकी हमें जीवाश्म अभिलेखों में लगभग कोई गवाही नहीं मिलती।”
डॉ. नांगलू ने जब दक्षिण-पूर्वी विस्कॉन्सिन की खदानों से मिले जीवाश्मों पर एक शोधपत्र पढ़ा, तो उनमें पाए गए कृमि जैसे जीवों को देखकर अचंभित रह गए, जिन्हें संभावित जोंक कहा गया था। उन्होंने यह जानकारी टोरंटो विश्वविद्यालय की आधुनिक जोंकों की विशेषज्ञ और इस नए अध्ययन की प्रमुख लेखिका डॉ. डेनियल डे कार्ले से साझा की।
डॉ. डे कार्ले विशेष रूप से तब उत्साहित हुईं जब उन्होंने मेडिसन स्थित विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय भूविज्ञान संग्रहालय में रखे दो इंच लंबे जीवाश्म की तस्वीर देखी। उन्होंने कहा—“यह हमें सबसे ज्यादा जोंक जैसा लगा। जिस क्षण हमने इसे देखा, हमें समझ आ गया कि हमारे पास कुछ खास है।”
टीम ने जीवाश्म का विश्लेषण किया। इसका आकार घंटी जैसा है और इसके शरीर में खंडन (segmentation) है, जो चौड़े चूषण-पात्र (sucker) पर समाप्त होता है—बिल्कुल आधुनिक जोंक जैसी चिपकने की संरचना। इस जीव का नाम रखा गया मैक्रोमाइज़न (Macromyzon) सिल्यूरिकस, जिसका अर्थ है “बड़ा चूषक।”
मैक्रोमाइज़न ने जोंकों की उत्पत्ति को सिल्यूरियन युग तक पीछे धकेल दिया और पूरे समूह के बारे में मौजूदा धारणाओं पर सवाल खड़े कर दिए। आज अधिकांश जोंक मीठे पानी में पाई जाती हैं और माना जाता था कि यही उनका मूल निवास रहा होगा। लेकिन मैक्रोमाइज़न खारे समुद्री वातावरण में रहता था।
वैज्ञानिक लंबे समय से मानते आए हैं कि सबसे शुरुआती जोंक खून चूसने वाली थीं। सभी आधुनिक जोंक, चाहे वे खून न भी चूसें, खून जमने से रोकने वाले रसायनों (anticoagulants) का समूह रखती हैं। लेकिन मैक्रोमाइज़न ऐसे वातावरण में रहता था जहां कशेरुकी जीव बहुत कम थे, इसलिए केवल खून पर निर्भर रहना संभव नहीं था।
इसके बजाय शोधकर्ताओं ने प्रस्ताव रखा कि मैक्रोमाइज़न अपने शिकार अकशेरुकी जीवों को पूरा निगल जाता था या उनके शरीर के अंदरूनी हिस्सों को चूस लेता था।
डॉ. डे कार्ले बताती हैं—“आज भी कुछ जोंक आर्थ्रोपोड्स से चिपककर उनके शरीर की कोमल झिल्लियों से द्रव चूसती हैं। वॉकेशा में बहुत सारे ट्राइलोबाइट्स थे, इसलिए हमें लगता है कि वे भोजन का अच्छा स्रोत रहे होंगे।”
मिलवॉकी पब्लिक म्यूज़ियम के पैलियंटोलॉजिस्ट केनेथ गास, जो इस अध्ययन से जुड़े नहीं थे, मानते हैं कि चूंकि जीव का अगला हिस्सा पूर्ण रूप से संरक्षित नहीं है, इसलिए मैक्रोमाइज़न को निश्चित रूप से जोंक कहना कठिन है। 2023 में गास और उनके सहयोगियों ने एक अध्ययन प्रकाशित किया था, जिसमें वॉकेशा से मिली एक अन्य संदिग्ध जोंक वास्तव में एक कीड़ा निकला, जो अपनी खाल बदलते समय जीवाश्मीकृत हो गया था। उसका चूषक वास्तव में झड़ी हुई खाल निकली।
फिर भी श्री गास पूरी तरह से यह मानने से इनकार नहीं करते कि प्राचीन विस्कॉन्सिन में जोंकों ने ट्राइलोबाइट्स को सताया होगा।
उनका कहना है—“यदि जोंक वाकई इतने पुराने हैं, तो यह आश्चर्यजनक नहीं होगा कि उनके जीवाश्म वॉकेशा बायोटा में मिलें।”
