खेल/मनोरंजन

दून पुस्तकालय में तीन वृत्तचित्रों के प्रदर्शन की एक शाम का आयोजन

 

देहरादून 16 नवंबर। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से आज सायं भारत की अवधारणा पर आधारित तीन वृत्तचित्रों के प्रदर्शन की एक शाम का आयोजन किया गया। प्रदर्शित की गई फिल्में थीं -बिन सवल्यांच्या गावत, मेरा अपना शहर तथा परवाज़। इन फिल्मों की कुल अवधि लगभग 160 मिनट के करीब रही। फिल्म प्रदर्शन के बाद सामान्य चर्चा भी हुई. इसमें उपस्थित लोगों ने जबाब सवाल भी किये.

बिन सवल्यांच्या गावत का निर्देशन गौरी पटवर्धन ने किया है.अंग्रेजी उपशीर्षक के साथ मराठी में इसकी अवधि 63 मिनट थी.

एक शहर कैसे बनता है? बनते समय क्या याद रखा जाता है? क्या भुला दिया जाता है जैसे कुछ अहम सवाल उठाते हुए, यह फिल्म इस बात पर गौर करती है कि कैसे पुणे के हेरिटेज वॉक शहर के इतिहास को एक संकीर्ण ढाँचे में परिभाषित करने की कोशिश करते हैं, जो सिर्फ़ ऊँची जातियों तक सीमित है । शहर के दलित-बहुजन समुदाय के लिए ऐतिहासिक शख्सियतों और इमारतों के मिट जाने का क्या मतलब है, जबकि वे उनमें से कुछ को वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं?

गौरी पटवर्धन गोवा कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स और भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविज़न संस्थान की पूर्व छात्रा हैं। उन्होंने कला, पर्यावरण और शैक्षणिक प्रथाओं पर कई फ़िल्में बनाई हैं।

दूसरी फिल्म मेरा अपना शहर, समीरा जैन द्वारा निर्देशित हिंदी व इंग्लिश उप र्शीर्षकों के साथ 56 मिनट की रही। यह फ़िल्म इस बात पर प्रकाश डालती है कि दिल्ली शहर में महिलाएँ शहरी परिदृश्य तक कैसे पहुँचती हैं और उसका अनुभव कैसे करती हैं। निरंतर और नियंत्रित निगरानी के संदर्भ में, क्या महिलाएँ वास्तव में अपने शहरी स्थानों पर स्वामित्व और स्वामित्व रख सकती हैं? क्या वे स्वतंत्र हो सकती हैं?

परवाज़ फिल्म का निर्देशन सैयद मोहम्मद अफनान ने किया है. हिंदी व इंग्लिश उप शीर्षक में इसकी अवधि 38 मिनट की थी। यह फ़िल्म पुरानी दिल्ली या पुरानी दिल्ली की छतों और उनके नीचे बसे जीवन की कहानी कहती है। यह दो परिवारों के माध्यम से पुराने शहर की वर्तमान स्थिति को दर्शाती है, जो जगह, संस्कृति और समय के इस नुकसान को देख रहे हैं। एक परवाज़ या उड़ान, हर किसी की चाहत होती है, और उन जड़ों से जुड़े रहना जो हमें यह उड़ान देती हैं, यही इस फ़िल्म का उद्देश्य है।

इन तीनों फिल्मों का प्रदर्शन निकोलस हॉफलैण्ड ने किया। इस अवसर पर श्रीमती विभापुरी दास, अरुण कुमार असफल, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के प्रोग्राम एसोसिएट चन्द्रशेखर तिवारी, डॉ. वी. के. डोभाल, डॉ.अतुल शर्मा, साहब नकवी,हिमांशु आहूजा, डॉ. लालता प्रसाद, सुन्दर सिंह बिष्ट, कुल भूषण नैथानी मेघा विल्सन तथा आलोक सरीन सहित फ़िल्म प्रेमी व पाठक गण उपस्थित थे।

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