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संवाद की संस्कृति और परंपरा – Tradition of Dialogue Culture 

 

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-

Parliament अथवा संसदीय परंपरा की स्थापना के पीछे यही मूल उद्देश्य था कि किसी भी समस्या के समाधान और निराकरण के लिए संवाद आवश्यक है, यह मानवीय उपकरण मनुष्य को सभ्यता के विकास के मार्फ़त उपलब्ध हुआ था।

मैंने देखा कि प्राचीन यूनान की विचार परंपरा और शैली भारतीय संवाद पद्धति से आश्चर्यजनक रूप से मिलती- जुलती है। वैचारिक आदान- प्रदान की यह संवाद प्रणाली और परंपरा हमारे यहां वैदिक काल से ही गतिमान रही है ।

गीता के बाद उपनिषदों में भी संवाद शैली के माध्यम से जीवन दर्शन की गूढ़ पहेलियों को सुलझाने की चेष्ठा की गई। यहीं से अभिव्यक्ति की आजादी का विचार पनपा।
यूनान में प्लेटो और सोक्रेटीज ने dialogue (संवाद ) शैली का ही अनुसरण किया है ।

अपने यहां जैसे प्रश्नोपनिषद में महर्षि पिप्लाद से प्रश्न पूछे गए थे , उसी तरह प्लेटो ने भी सोक्रेटीज से प्रश्न पूछे थे और ऐसे ही जीवन से सम्बंधित सामान्य समस्याओं पर वे लोगों से भी प्रश्न पूछकर संवाद स्थापित करते थे I यूनान के दार्शनिक चितंक सीधे संवाद करते थे इसलिए सत्ताधारियों ने प्लेटो और सोक्रेटीज को विद्रोही माना । स्वतन्त्र विचारक सोक्रेटीज को जेल भेजकर मार डाला गया । प्लेटो के जमाने में विद्याध्ययन और प्रशिक्षण के लिए “जिम्नास्टिक” और “म्यूजिक’ दो तरह की गुरुकुल परंपरा शुरू की थी ।

“जिम्नास्टिक” यानी जिनको हम अपनी भाषा में “अखाड़ा” कह सकते हैं विद्याध्यन के बौद्धिक प्रशिक्षण केंद्र थे । उसी तरह म्यूजिक भी गीतों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की एक विधा थी ।

उपरोक्त बातों को देखने से पता चलता है यूनानी शिक्षण परंपरा हमारे गुरुकुलों से मिलती जुलती थी I प्लेटो और सोक्रेटीज की शैली को हम अपनी भाषा में “प्रबोधन संवाद ” (Dialouge and Didacticism ) नाम दे सकते हैं।

संवाद शैली के पुरोधा अपने यहां महर्षि वेदव्यास रहे हैं ,उनका अनुकरण फिर अन्य ऋषि- महर्षियों ने किया। संवाद शैली का उत्कृष्ट उदाहरण तो श्रीमद्भागवत गीता है, उसके बाद उपनिषदों का नंबर आता है ।लेकिन संवाद उससे किया जाय जो सुनने का इच्छुक हो – “श्रद्धावान लभते ज्ञानं” संवाद का सिलसिला तब टूटना शुरू हुआ जब निरंकुश शासकों ने अपनी मन -मर्जी से शासन चलाना शुरू किया और जनता की भागीदारी दिन प्रतिदिन कम होती चली गई। प्राचीन राजतंत्र में फिर भी कमोवेश संवाद जनता से हो जाता था लेकिन आधुनिक काल में यह औपचारिकता भी लोप होने लगी और संवाद की जगह संसद भी विवाद का मंच बन गया। …उपहास और निन्दा करने गाली देने का मंच बन गया……

GPB

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