अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: ट्रंप के वैश्विक टैरिफ हुए निरस्त

The U.S. Supreme Court’s 6-3 ruling to strike down President Trump’s sweeping global tariffs marks a historic shift in international trade. By declaring the use of emergency powers (IEEPA) for broad import taxes unconstitutional, the Court has curtailed executive overreach and restored market stability. For India, this is a significant victory, shielding over 55% of its exports—including textiles and gems—from retaliatory duties. Beyond immediate relief and potential refunds, the verdict strengthens India’s bargaining power in trade negotiations, ensuring a more predictable and secure economic partnership between the world’s two largest democracies.The outcome of the case could significantly affect the global economy and American businesses and consumers, and shape Mr. Trump’s foreign policy and economic initiatives for the remainder of his term. The Trump administration had said that a loss at the Supreme Court could force the government to unwind trade deals with other countries and potentially pay hefty refunds to importers. But the president’s top trade negotiator said last month that the administration would move quickly to replace any tariffs invalidated by the court with other levies.

– जयसिंह रावत –
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वैश्विक टैरिफ को असंवैधानिक घोषित करने का निर्णय वैश्विक व्यापार के इतिहास में एक युगांतकारी घटना है। 20 फरवरी 2026 को आए इस फैसले ने न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमाएं तय की हैं, बल्कि भारत जैसे प्रमुख व्यापारिक भागीदारों के लिए आर्थिक संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं। कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ने 1977 के ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (IEEPA) का दुरुपयोग किया है, जो उन्हें केवल राष्ट्रीय आपातकाल के समय विदेशी खतरों से निपटने की अनुमति देता है, न कि सामान्य व्यापारिक शुल्कों के माध्यम से राजस्व जुटाने की। सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े प्रहार के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हलचल तेज हो गई है। पिछले एक साल में अमेरिकी सरकार ने इन टैरिफ के जरिए लगभग 200 बिलियन डॉलर की विशाल राशि एकत्र की थी। अब सबसे बड़ा कानूनी और आर्थिक प्रश्न यह है कि क्या यह पूरी राशि उन कंपनियों को लौटानी होगी जिन्होंने इसे भारी दबाव में चुकाया था। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस फैसले को देश के लिए एक अपमान बताया है और दावा किया है कि उनके पास अन्य कानूनी रास्ते मौजूद हैं जिनसे वे इन शुल्कों को पुनः लागू कर सकेंगे। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अब उनके पास मौजूद विकल्प समय और अधिकार दोनों ही दृष्टि से सीमित हैं।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दूरगामी प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फैसले का प्रभाव अलग-अलग देशों पर अलग तरह से दिखाई दे रहा है। ब्राजील जैसे देशों के लिए, जहाँ पहले ही कुछ प्रमुख निर्यातों पर से शुल्क हटा लिए गए थे, यह निर्णय केवल एक प्रतीकात्मक जीत है। वहीं दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने इस फैसले के बाद एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। यूरोपीय नेताओं को डर है कि ट्रंप प्रशासन अब उन पर दबाव बनाने के लिए अन्य कानूनों का सहारा ले सकता है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के भविष्य पर अब अनिश्चितता के बादल मंदरा रहे हैं, जिसका समाधान आने वाले महीनों में होने वाली कूटनीतिक वार्ताओं पर निर्भर करेगा। भारतीय अर्थव्यवस्था और विशेष रूप से निर्यातकों के लिए यह खबर किसी वरदान से कम नहीं है। पिछले वर्ष जब ट्रंप प्रशासन ने ‘प्रतिशोधात्मक’ टैरिफ की घोषणा की थी, तब भारतीय व्यापार जगत में गहरी चिंता व्याप्त थी। अब इस कानूनी जीत के बाद भारत के लगभग 55 प्रतिशत निर्यात पर से 18 प्रतिशत तक का अतिरिक्त बोझ हटने की उम्मीद है। विशेष रूप से कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान और रसायन जैसे क्षेत्रों को इससे तत्काल राहत मिलेगी। भारतीय निर्यातकों के लिए सबसे उत्साहजनक बात यह है कि वे अब पिछले एक साल में चुकाए गए करोड़ों डॉलर के रिफंड के लिए दावा पेश कर सकते हैं।
भारत–अमेरिका आर्थिक संबंधों का नया स्वरूप
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी इस फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। हाल के महीनों में भारत ने टैरिफ की धमकी के तहत अमेरिकी कृषि उत्पादों को जो रियायतें दी थीं, उन पर अब नए सिरे से विचार किया जा सकता है। सौदेबाजी की मेज पर अब भारत का पक्ष अधिक मजबूत हो गया है। साथ ही, रूसी तेल की खरीद और रूस के साथ रणनीतिक संबंधों को लेकर भी भारत पर अमेरिकी दबाव अब कम होगा, क्योंकि राष्ट्रपति के पास टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की शक्तियां अब न्यायपालिका द्वारा सीमित कर दी गई हैं। भारतीय उद्योग मंडलों जैसे फिक्की और सीआईआई ने इस निर्णय का पुरजोर स्वागत किया है। उद्योग जगत का मानना है कि इससे व्यापार में वह स्थिरता लौटेगी जो पिछले एक साल से गायब थी। फिक्की के अनुसार, टैरिफ हटने से भारतीय कंपनियों की ‘प्राइसिंग पावर’ बढ़ेगी और उनके लाभ के मार्जिन में सुधार होगा। सीआईआई ने भी इसे भारत-अमेरिका रणनीतिक आर्थिक साझेदारी के लिए एक सार्थक कदम बताया है। उद्योगपतियों का मानना है कि इस फैसले से भारतीय उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी, जिससे देश में विनिर्माण और रोजगार सृजन को नई गति मिलेगी।
भारतीय निर्यात और भविष्य की रणनीतिक जीत
विशिष्ट आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत का लगभग 87 बिलियन डॉलर का वार्षिक निर्यात अमेरिका को होता है। इसमें से रत्न और आभूषण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र, जिनका टर्नओवर टैरिफ के कारण 50 प्रतिशत तक गिर गया था, अब तेजी से रिकवरी की ओर बढ़ेंगे। फार्मास्युटिकल और तकनीकी सेवाओं के निर्यात में भी अब अधिक स्पष्टता और तेजी आने की संभावना है। हालांकि, भविष्य की चुनौती यह है कि अमेरिकी प्रशासन ‘1974 ट्रेड एक्ट’ जैसे अन्य प्रावधानों के जरिए नए अवरोध खड़े कर सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह वर्तमान फैसला लंबी अवधि के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। अंततः, यह अदालती निर्णय केवल व्यापार के बारे में नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन और वैश्विक आर्थिक संतुलन की जीत है। भारतीय निर्यातकों के लिए यह समय अपनी रणनीतियों को पुनर्गठित करने और अमेरिकी बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का है। यदि रिफंड की प्रक्रिया सुचारू रूप से आगे बढ़ती है, तो यह भारतीय व्यवसायों के लिए एक बड़ी पूंजीगत राहत होगी जो उन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा में और अधिक मजबूती प्रदान करेगी।
भारत-अमेरिका व्यापारिक सांख्यिकी (अनुमानित 2024-25)
| व्यापारिक श्रेणी | विवरण और आंकड़े |
| कुल द्विपक्षीय व्यापार | लगभग 120-130 बिलियन डॉलर |
| भारत का अमेरिका को निर्यात | लगभग 75-80 बिलियन डॉलर |
| भारत का अमेरिका से आयात | लगभग 45-50 बिलियन डॉलर |
| व्यापार संतुलन | भारत के पक्ष में (लगभग 30+ बिलियन डॉलर अधिशेष) |
| प्रमुख भारतीय निर्यात क्षेत्र | रत्न एवं आभूषण, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान |
| प्रमुख अमेरिकी निर्यात क्षेत्र | कच्चा तेल, रक्षा उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोना-चांदी |
| टैरिफ प्रभावित निर्यात (अनुमानित) | भारत के कुल निर्यात का लगभग 55% हिस्सा |
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बना हुआ है। भारत के पास अमेरिका के साथ व्यापार में एक महत्वपूर्ण अधिशेष (Trade Surplus) है, जिसका अर्थ है कि हम अमेरिका को सामान बेचते अधिक हैं और वहां से खरीदते कम हैं। यही कारण था कि ट्रंप प्रशासन ने ‘प्रतिशोधात्मक टैरिफ’ के जरिए इस संतुलन को बदलने की कोशिश की थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, वह 55% निर्यात जो टैरिफ की मार झेल रहा था, अब फिर से प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अमेरिकी बाजार में उपलब्ध होगा। इससे आने वाले वित्तीय वर्ष में भारत के निर्यात आंकड़ों में 10% से 15% तक की अतिरिक्त वृद्धि देखी जा सकती है।
