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संवैधानिक संरक्षण की बाट जोहता उत्तराखंड

श्याम सिंह रावत-

यह आश्चर्यजनक है कि हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड ही एकमात्र ऐसा प्रदेश है जिसके निवासियों के लिए भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा सामरिक दृष्टि से इन राज्यों की तरह कोई संवैधानिक संरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई है। हालाँकि यह अन्य हिमालयी राज्यों में सबके बाद वर्ष 2000 में गठित किया गया है लेकिन न तो इसकी स्थाई राजधानी तय की गई और न ही इसके निमित्त अन्य दस हिमालयी राज्यों की तरह किसी भी तरह के विशिष्ट संवैधानिक संरक्षण का ध्यान रखा गया।

भारतीय संविधान सभा के अंतर्गत जनवरी 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में गठित सलाहकार समिति (Advisory Committee on Fundamental Rights, Minorities and Tribal Areas) ने संविधान के भाग III में वर्णित मौलिक अधिकारों की रूपरेखा तय करने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी।

इसी सलाहकार समिति के भीतर फरवरी 1947 में एक उप-समिति, जिसे मौलिक अधिकार उप-समिति कहा गया, का गठन किया गया था। इसका प्रमुख उद्देश्य भारतीय नागरिकों के लिए गारंटीशुदा अधिकारों की सूची तैयार करना और उन पर संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने का ढाँचा बनाना था।

समिति में कुल 12 सदस्य थे, जिनमें जे. बी. कृपलानी (अध्यक्ष), कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, एच. सी. मुखर्जी, एन. गोपालस्वामी आयंगार, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, के. टी. शाह, वी. एन. राव (संविधानिक सलाहकार के रूप में सहयोगी) और अन्य प्रतिनिधि जो विभिन्न सामाजिक, भाषाई और धार्मिक समूहों का प्रतिनिधित्व करते थे।

कार्य और योगदान
यह समिति मौलिक अधिकारों की परिभाषा, दायरा और प्रवर्तनीयता तय करने के लिए उत्तरदायी थी। समिति के कार्य पर अमेरिकी ‘Bill of Rights’ और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणापत्र का प्रभाव पड़ा। समिति ने अप्रैल 1947 में अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे बाद में पूरी सलाहकार समिति व संविधान सभा के समक्ष रखा गया।

इन प्रस्तावित अधिकारों पर सभा में विस्तृत बहसें हुईं और दिसंबर 1948 तक अधिकांश सुझावों को स्वीकार कर लिया गया।

परिणामस्वरूप इस समिति के सुझावों के आधार पर संविधान का भाग III तैयार हुआ, जिसमें अंततः छह (प्रारंभ में सात)—समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार तथा संवैधानिक उपचार का अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में समाविष्ट किए गए

इस उप-समिति ने भारतीय लोकतंत्र का नैतिक और विधिक ढाँचा गढ़ने में निर्णायक भूमिका निभाने से ही इसे संविधान सभा की सबसे प्रभावशाली उप-समितियों में गिना जाता है।

आदिवासी अधिकारों का संवैधानिक संरक्षण—
भारतीय संविधान सभा की मौलिक अधिकार समिति की सिफारिशों में आदिवासी समुदायों के परंपरागत अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण देने का प्रावधान शामिल था।

संविधान सभा में आदिवासी और बहिष्कृत क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधानों के संदर्भ में एक अलग अध्याय पर विचार किया गया था। इस समिति ने आदिवासी समुदायों की विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, उन्हें उनके परंपरागत अधिकारों का संरक्षण देने पर ज़ोर दिया।

संविधान के अनुच्छेद 244 और पाँचवीं अनुसूची ने आदिवासी बहुल अनुसूचित क्षेत्रों की प्रशासनिक स्वायत्तता सुनिश्चित की।

अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति की पहचान और प्रदेशों में उनके संरक्षण का प्रावधान किया गया।

अनुच्छेद 15(4), 29, 46 आदि ने विशेष आरक्षण और सांस्कृतिक अधिकार दिये ताकि सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्र में आदिवासियों के हित सुरक्षित रहें।

आदिवासी समुदायों की जमीन और वन संसाधनों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा वन अधिकार अधिनियम जैसे बाद के कानूनों में भी की गई है, जो संविधान के मूल विचारों पर आधारित हैं।

इस प्रकार, मौलिक अधिकार समिति की सिफारिशों और संविधान सभा की बहसों ने आदिवासियों को उनके सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक संरक्षण का संवैधानिक मंच दिया। यह संरक्षण उनकी परंपरागत जीवनशैली, जमीन, वन संसाधनों तथा स्वायत्त प्रशासन पर केंद्रित था, जो भारतीय संविधान के अंतर्गत जारी है।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में आदिवासियों के अंग्रेजी राज से प्राप्त परंपरागत संरक्षण को स्वतंत्र भारत में संविधान लागू होने पर चरणबद्ध तरीके से खत्म कर दिया गया। ऐसा करने के प्रमुख कारणों में प्रशासनिक, राजनीतिक और संवैधानिक पहलू शामिल हैं।
1. 5वीं अनुसूची से वंचित होना—उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र को आजाद भारत के संविधान में वे विशेष आदिवासी अधिकार प्रदान करने वाले संवैधानिक प्रावधान, जैसे कि संविधान की 5वीं अनुसूची, के लाभ नहीं दिए गए। जबकि हिमालय के अन्य क्षेत्रों को 5वीं अनुसूची के तहत जनजातीय संरक्षण मिला, उत्तराखंड में यह दर्जा 1972 में हटा दिया गया या लागू नहीं किया गया। जिससे स्थानीय आदिवासी अधिकारविहीन सामान्य जातीय समूह में परिगणित हो गए।

2. प्रशासनिक लापरवाही और संरक्षण के अभाव से ही उत्तराखंड सरकार की वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत वनवासियों के अधिकारों की पहचान और संरक्षण में लगातार असफलता रही है। सरकारी तंत्र की उपेक्षा या लापरवाही से, 2022 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के वन अधिकार दावों को 97% से ज़्यादा खारिज किया गया, जो राष्ट्रीय औसत (68%) से बहुत अधिक है। इससे वनवासियों के परंपरागत अधिकारों की रक्षा नहीं हो पाई और वन संसाधनों के व्यवसायिक शोषण की संभावना बढ़ी है। उच्च न्यायालय ने भी इस मामले में सरकार की कमजोरी और लापरवाही की निंदा की है।

3. सामाजिक-राजनीतिक मान्यता का अभाव—उत्तराखंड के आदिवासी समुदायों को पूरे हिमालय क्षेत्र के अन्य जनजातीय समूहों के समान कानूनी जनजातीय दर्जा और संरक्षण नहीं मिला। राज्य के स्थानीय प्रशासन और केंद्र सरकार के बीच इस वर्ग को जनजातीय के रूप में मान्यता देने को लेकर सहमति नहीं बन पाई, जिससे उनके अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण देना टाल दिया गया।

संक्षेप में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में आदिवासियों के अधिकारों को समाप्त किए जाने के पीछे 5वीं अनुसूची से वंचित करना, वन अधिकार अधिनियम की प्रभावहीनता, सुरक्षा-आर्थिक हित और सामाजिक-राजनीतिक मान्यता की कमी प्रमुख कारण हैं। इन सबके कारण संविधान में प्रदत्त संरक्षणों का अनुपालन नहीं हो पाया, जिससे आदिवासी अधिकारों का संरक्षण कमजोर रहा है।

इस स्थिति में अब भी स्थानीय जनचेतना, न्यायालयों के आदेश और संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता है। इसी कमी को दूर करने के लिए इधर कुछ समय से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों को संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल करने की माँग की जा रही है।

(लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठतम पत्रकारों में से एक और सामाजिक चिंतक हैं। उनकी लेखनी और दिमाग निरंतर समाज के लिए सक्रिय रहते हैं  -एडमिन)

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