नए वर्ष की दहलीज पर उत्तराखंड : चिंतन और आत्ममंथन की आवश्यकता
साल विदा ले चुका है और नए वर्ष 2026 का आगमन हो चुका है। लेकिन उत्तराखंड की परिस्थितियाँ अब भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रही हैं। शासन–प्रशासन के निर्णयों और प्राथमिकताओं का प्रभाव अंततः जनता को ही झेलना पड़ता है। यह स्थिति केवल किसी एक वर्ग या समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे राज्य की चिंता का विषय है।

– वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली –
31 दिसंबर 2025 को दिल्ली के जंतर–मंतर पर पूर्वोत्तर के छात्रों द्वारा एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया गया, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले सैकड़ों छात्र भी शामिल थे। यह प्रदर्शन देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की हत्या के विरोध और न्याय की मांग को लेकर था। यह घटना राज्य की छवि के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रही।
इससे पहले मसूरी और कुमाऊँ क्षेत्र में कश्मीर से शॉल बेचने आए व्यापारियों के साथ मारपीट की घटनाएँ सामने आईं। ऐसी घटनाएँ सामाजिक सौहार्द के वातावरण को प्रभावित करती हैं। जबकि उत्तराखंड की परंपरा आपसी सम्मान और सहअस्तित्व की रही है। उदाहरणस्वरूप, टिहरी जनपद के चंद्रबदनी क्षेत्र, अंजनीसैंण और हिंडोलाखाल ब्लॉकों के मुस्लिम बहुल गांव इस सौहार्द की मिसाल हैं। टिहरी रियासत काल से मुस्लिम परिवारों का सामाजिक योगदान उल्लेखनीय रहा है।
दुर्भाग्यवश, कुछ अवसरों पर अतिवादी सोच के कारण राज्य को राष्ट्रीय स्तर पर असहज स्थितियों का सामना करना पड़ा, जैसे नाम परिवर्तन से जुड़े प्रसंग, जिन्हें बाद में ऐतिहासिक और सामाजिक तथ्यों के आधार पर स्पष्ट करना पड़ा। यदि उद्देश्य संवाद और समझ का हो, तो अनेक विवाद स्वतः सुलझ सकते हैं, किंतु निरंतर राजनीतिक व्यस्तता ने ऐसे प्रयासों की गुंजाइश सीमित कर दी है।
राज्य के माहौल को लेकर कई गंभीर प्रश्न सामने आए हैं। ऐसा क्यों हुआ कि एक सम्मानित नागरिक और पूर्व मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री को अपनी देशभक्ति पर संदेह फैलाने वाले एआई-निर्मित वीडियो के विरुद्ध थाने में शिकायत करनी पड़ी? क्यों यह स्थिति बनी कि उन्हें सार्वजनिक रूप से यह कहना पड़ा कि वे देशद्रोही कहलाने से बेहतर मृत्यु को स्वीकार करेंगे?
इसी प्रकार, सांसद एवं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को जान से मारने की धमकियाँ मिलना भी चिंता का विषय है। नए वर्ष के स्वागत में 600 से अधिक वन-डे बार लाइसेंस जारी होना, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या लगभग 300 थी, नीति और प्राथमिकताओं पर प्रश्न उठाता है।
न्यायपालिका ने भी समय-समय पर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं—चाहे वह वर्षों से बिना अपील के जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों का मामला हो, या फिर आय से अधिक संपत्ति के आरोपों से जुड़े प्रश्न। नशे के बढ़ते मामलों के कारण विद्यालयों में छात्रों की जांच तक की नौबत आना, सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि, और देहरादून का वायु गुणवत्ता सूचकांक 369 तक पहुँचना—ये सभी संकेत किसी गहन आत्ममंथन की मांग करते हैं।
पर्यावरण के संदर्भ में भी कई प्रसंग सामने आए, जिनमें न्यायालयों को हस्तक्षेप करना पड़ा। औली, जोशीमठ, और अन्य संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों से जुड़े मामलों ने यह स्पष्ट किया कि विकास और पर्यावरण संतुलन के बीच समन्वय अत्यंत आवश्यक है।
प्रशासनिक कार्यप्रणाली की स्थिति यह है कि खुले में शौच मुक्त होने के दावे के बावजूद स्कूलों में शौचालयों की आवश्यकता पर मुख्य सचिव को पुनः निर्देश देने पड़े। जोशीमठ धंसाव के बाद वहन क्षमता (बेयरिंग कैपेसिटी) आकलन की घोषणाएँ हुईं, पर उनके निष्कर्ष आज भी सार्वजनिक नहीं हैं।
सूचना और प्रचार तंत्र की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। अवैध खनन से जुड़े स्टिंग ऑपरेशन ने यह दर्शाया कि जमीनी हकीकत और आधिकारिक दावों में अंतर है।
सुरंग परियोजनाओं—सिलक्यारा और विष्णुगाड़–पीपलकोटी—में हुई दुर्घटनाओं ने श्रमिकों की सुरक्षा और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। वहीं, धराली आपदा में लापता लोगों के संबंध में अब तक ठोस प्रगति न होना भी पीड़ादायक है।
इन सबके बीच आशा की किरण यह है कि वर्ष 2026 में जनसंगठनों और नागरिक समूहों द्वारा अनेक लोकतांत्रिक आंदोलनों की रूपरेखा सामने आ रही है। इसकी शुरुआत 4 जनवरी 2026 को अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने, वीआईपी नाम उजागर करने और साक्ष्यों की निष्पक्ष समीक्षा की मांग से होगी। इसके अतिरिक्त, देहरादून एलिवेटेड रोड, ऋषिकेश में वन भूमि का मामला, बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, और मूल निवासियों के अधिकारों से जुड़े प्रश्नों पर भी जनआंदोलन प्रस्तावित हैं।
इतिहास साक्षी है कि जब जनभावनाओं की अनदेखी होती है, तो उसके राजनीतिक परिणाम भी सामने आते हैं। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौर की घटनाएँ इसका उदाहरण हैं। वर्तमान परिस्थितियों में भी यही संकेत मिल रहे हैं कि जनता सजग है और अपने अधिकारों के लिए संगठित हो रही है।
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वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली
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