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कर्ज के पहाड़ तले उत्तराखंड : 14 साल में चार गुना बढ़ा ऋण

 

ब्याज चुकाने में ही जा रहा बजट का बड़ा हिस्सा

जयसिंह रावत-
उत्तराखंड विधानसभा के भराड़ीसैंण सत्र में सोमवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2026–27 के बजट ने राज्य की वित्तीय स्थिति का एक चिंताजनक पक्ष भी सामने रखा है। बजट दस्तावेजों के अनुसार उत्तराखंड पर कर्ज का बोझ अब एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। वर्ष 2011–12 में जहां राज्य पर कुल ऋण 23,609 करोड़ रुपये था, वहीं वर्ष 2026–27 के बजट अनुमानों में यह बढ़कर लगभग 1,04,245 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यानी पिछले लगभग डेढ़ दशक में राज्य का कर्ज चार गुने से भी अधिक बढ़ गया है।

बजट दस्तावेजों में दिए गए ग्राफ से स्पष्ट है कि वर्ष दर वर्ष राज्य की ऋणग्रस्तता लगातार बढ़ती रही है। वर्ष 2012–13 में यह 25,540 करोड़, 2013–14 में 28,767 करोड़, 2014–15 में 33,480 करोड़ और 2015–16 में 39,069 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी। इसके बाद भी वृद्धि का सिलसिला जारी रहा और 2017–18 में यह 51,831 करोड़ तथा 2019–20 में 65,982 करोड़ रुपये हो गया।

कोविड काल के बाद यह बढ़ोतरी और तेज हुई। वर्ष 2020–21 में राज्य का कर्ज 73,751 करोड़ रुपये, 2021–22 में 77,023 करोड़, 2022–23 में 78,509 करोड़ और 2023–24 में 85,914 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके बाद 2024–25 में यह 94,666 करोड़ तथा 2025–26 में लगभग 99,632 करोड़ रुपये आंका गया है। आगामी वित्तीय वर्ष 2026–27 में इसके 1.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है।


ब्याज भुगतान बना बड़ी चुनौती
राज्य की वित्तीय स्थिति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब बजट का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज चुकाने में ही खर्च हो रहा है। बजट के अनुसार वर्ष 2026–27 में ब्याज भुगतान पर लगभग 7,929 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
तुलनात्मक रूप से देखें तो वर्ष 2024–25 में यह राशि करीब 5,575 करोड़ रुपये थी। यानी दो वर्षों में ही ब्याज भुगतान में लगभग ढाई हजार करोड़ रुपये की वृद्धि हो गई है। इससे स्पष्ट है कि राज्य की आय का बड़ा हिस्सा अब विकास कार्यों की बजाय कर्ज के ब्याज भुगतान में जा रहा है।
आय और व्यय का अंतर
बजट दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2026–27 में राज्य की कुल प्राप्तियां लगभग 1,10,143 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जबकि कुल व्यय लगभग 1,11,703 करोड़ रुपये आंका गया है।
राजस्व प्राप्तियों में राज्य के अपने कर, गैर-कर राजस्व तथा केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान शामिल हैं। वर्ष 2026–27 में राज्य को कर राजस्व के रूप में लगभग 43,327 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है, जबकि गैर-कर राजस्व करीब 24,198 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।
इसके अलावा केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदानों और हिस्सेदारी से भी राज्य को बड़ी राशि प्राप्त होती है। फिर भी राज्य की आय और व्यय के बीच का अंतर बना हुआ है, जिसे पूरा करने के लिए सरकार को लगातार कर्ज लेना पड़ रहा है।
पूंजीगत प्राप्तियों में भी कर्ज की बड़ी भूमिका
बजट के अनुसार वर्ष 2026–27 में पूंजीगत प्राप्तियां लगभग 42,617 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा सार्वजनिक ऋण का है। राज्य सरकार को आंतरिक ऋण के रूप में लगभग 40,250 करोड़ रुपये तथा केंद्र सरकार से ऋण और अग्रिम के रूप में लगभग 2,340 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है।
स्पष्ट है कि राज्य की पूंजीगत प्राप्तियों का अधिकांश हिस्सा भी कर्ज से ही आता है, जिससे ऋण का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
राजकोषीय घाटा और प्राथमिक घाटा
बजट में वर्ष 2026–27 के लिए राजकोषीय घाटा लगभग 12,579 करोड़ रुपये अनुमानित किया गया है, जबकि प्राथमिक घाटा लगभग 4,650 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। हालांकि सरकार का दावा है कि ऋण-सकल राज्य घरेलू उत्पाद का अनुपात एफआरबीएम अधिनियम की निर्धारित सीमा के भीतर है और भविष्य में भी इसके इसी सीमा में रहने की संभावना है।
विकास और वित्तीय संतुलन की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय राज्य होने के कारण उत्तराखंड की आर्थिक संरचना सीमित है। औद्योगिक आधार अपेक्षाकृत छोटा है और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बुनियादी ढांचे के निर्माण की लागत भी अधिक है। ऐसे में सरकार को विकास योजनाओं, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन जैसी आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर खर्च करना पड़ता है।
लेकिन दूसरी ओर राज्य की अपनी आय सीमित होने और खर्च लगातार बढ़ने के कारण सरकार को कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है। यही कारण है कि पिछले डेढ़ दशक में राज्य का कर्ज तेजी से बढ़ा है।
बढ़ते कर्ज पर चिंता
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य की आय के स्रोतों में पर्याप्त वृद्धि नहीं हुई तो भविष्य में कर्ज का बोझ और बढ़ सकता है। इससे विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधन भी सीमित हो सकते हैं।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए यह एक बड़ी नीति-गत चुनौती है कि वह विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन कैसे बनाए।
बजट ने जहां विकास योजनाओं के लिए सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया है, वहीं यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था पर कर्ज का दबाव लगातार बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में राज्य की वित्तीय नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार अपनी आय बढ़ाने और कर्ज पर निर्भरता कम करने के लिए किस तरह के ठोस कदम उठाती है।

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