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राय बहादुर डॉ. पातीराम परमार का गांव आज भी सड़क से वंचित

ग्रामीणों ने चंदा कर खुद शुरू की सड़क कटिंग

राजेश्वरी राणा की रिपोर्ट –
पोखरी। ब्रिटिश काल में ‘राय बहादुर’ की उपाधि से सम्मानित स्वर्गीय डॉ. पातीराम परमार की जन्मस्थली डूंगर (डुगर) गांव आज़ादी के 79 वर्ष बाद भी सड़क सुविधा से वंचित है। लगभग 150 से अधिक परिवारों वाली इस ग्राम सभा के लोग आज भी मूलभूत सुविधा के अभाव में कठिन और नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

वर्षों से सरकार और लोक निर्माण विभाग से गुहार लगाने के बावजूद जब कहीं से कोई ठोस पहल नहीं हुई, तो ग्रामीणों ने आपस में चंदा एकत्र कर स्वयं सड़क की कटिंग शुरू कर दी।

सड़क न होने के कारण ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों का सामान लाने, बाजार जाने और तहसील व अन्य विभागीय कार्यों के लिए पोखरी तहसील मुख्यालय तक पहुंचने हेतु सड़क मार्ग तक करीब दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। वापसी में उन्हें पीठ पर सामान लादकर दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई तय करनी पड़ती है, जो बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए बेहद कष्टकारी है।
छात्रों और मरीजों की सबसे बड़ी परेशानी
डूंगर गांव के छात्र-छात्राओं को इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए अटल उत्कृष्ट राजकीय इंटर कॉलेज रडुवा जाना पड़ता है। इसके लिए उन्हें प्रतिदिन तीन किलोमीटर पैदल चलकर कॉलेज पहुंचना और फिर तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर घर लौटना पड़ता है। यानी रोजाना छह किलोमीटर पैदल सफर उनकी मजबूरी बन चुका है।
स्थिति तब और भयावह हो जाती है, जब बीमार बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं या बच्चों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ता है। आज भी ग्रामीण मरीजों को चारपाई के सहारे तीन किलोमीटर पैदल चलाकर सड़क तक पहुंचाने को विवश हैं।

उम्मीद टूटी तो खुद संभाली कमान
ग्रामीणों का कहना है कि बार-बार मांग के बावजूद जब सरकार और विभागों ने उनकी सुध नहीं ली, तो उन्होंने आपस में चंदा इकट्ठा कर जेसीबी मशीन लगाकर सड़क निर्माण का कार्य शुरू कर दिया। वर्तमान में डूंगर गांव में दो दिशाओं से सड़क कटिंग का कार्य चल रहा है।
एक ओर ग्राम प्रधान दीक्षा बर्तवाल और वन पंचायत सरपंच सत्येंद्र बर्तवाल के नेतृत्व में ग्रामीणों ने पोखरी–हापला मोटर मार्ग के बचवाण गदेरे, दमतोली तोक से गांव को जोड़ने के लिए सड़क कटिंग शुरू की है। इस मार्ग पर लगभग एक किलोमीटर सड़क की कटिंग पूरी हो चुकी है और जल्द ही गांव को सड़क से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।
दूसरी ओर कुछ ग्रामीणों ने पूर्व प्रधान बलवीर सिंह परमार और मयंक नेगी के नेतृत्व में जौरासी–तोणजी मोटर मार्ग के अतरी तोक से सड़क कटिंग शुरू की है। इस दिशा में करीब 400 मीटर सड़क बनाई जा चुकी है, जिसे ऊमा देवी मंदिर तक ले जाया जाएगा।
सड़क नहीं तो वोट नहीं’ का नारा
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क न होने के कारण अब लोग उनकी ग्राम सभा में रिश्तेदारी करने से भी कतराने लगे हैं। इसी पीड़ा और आक्रोश के चलते ग्रामीणों ने सरकार और जनप्रतिनिधियों को चेतावनी दी है कि यदि अब भी सहयोग नहीं मिला, तो वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में ‘सड़क नहीं तो वोट नहीं’ के नारे के साथ चुनाव बहिष्कार किया जाएगा।
ग्रामीणों का दर्द और आक्रोश
ग्राम प्रधान दीक्षा बर्तवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि सड़क कटिंग और निर्माण कार्य में विधायक व अन्य जनप्रतिनिधियों ने सहयोग नहीं किया, तो गांव के लोग न केवल वोट का बहिष्कार करेंगे, बल्कि ऐसे नेताओं का सामाजिक बहिष्कार भी किया जाएगा।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि चुनाव के समय नेता गांव में आकर सड़क का आश्वासन देते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही सभी वादे भुला दिए जाते हैं।
सरकार पर तंज
ग्रामीणों ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा, “हमें रेल से पहले सड़क चाहिए। डबल इंजन की सरकार में भी अगर गांव सड़क से वंचित है, तो यह सरकार और सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी है।”
सड़क कटिंग कार्य के दौरान प्रधान दीक्षा बर्तवाल, वन पंचायत सरपंच सत्येंद्र सिंह बर्तवाल, रणजीत सिंह, इंदु, भूषण नेगी, वीरेंद्र नेगी, प्रदीप भंडारी, हरेंद्र नेगी, संजय बर्तवाल, साक्षी परमार, अनीता देवी, प्रीति देवी, मुन्नी देवी, विजया देवी, मीना देवी, भुवनेश्वरी देवी, बसंती देवी, सुनीता देवी सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।
डूंगर गांव के ग्रामीण आज खुद सड़क काटकर सरकार और सिस्टम को आईना दिखा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी यह मजबूरी अब भी शासन-प्रशासन को झकझोरेगी या गांव को सड़क के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा?
पीएमजीएसवाई विभाग का पक्ष
पीएमजीएसवाई के अधिशासी अभियंता मनमोहन सिंह विजलवान ने बताया कि ग्रामीणों की सहमति के आधार पर चांदनीखाल से डूंगर गांव तक सड़क निर्माण के लिए विभाग द्वारा सर्वे कार्य पहले ही पूरा किया जा चुका है। प्रस्तावित सड़क की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) विभागीय स्तर से गढ़वाल मंडल के मुख्य अभियंता को भेज दी गई है।
मुख्य अभियंता स्तर से स्वीकृति के बाद डीपीआर को तकनीकी परीक्षण के लिए आईआईटी रुड़की भेजा जाएगा। वहां से अनुमोदन मिलने के पश्चात यह डीपीआर भारत सरकार को स्वीकृति हेतु प्रेषित की जाएगी। केंद्र सरकार से मंजूरी मिलने के बाद ही सड़क निर्माण कार्य प्रारंभ किया जा सकेगा।

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