क्षेत्रीय समाचार

पैनखंडावासी नौ वर्ष बाद भी केंद्रीय ओबीसी सूची से बाहर

 

– प्रकाश कपरुवाण की रिपोर्ट –
ज्योतिर्मठ, 23 अक्टूबर । दिसंबर 2016 में उत्तराखंड सरकार ने सीमांत पैनखंडा (ज्योतिर्मठ) के पैनखंडा समुदाय को राज्य की अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) सूची में शामिल किया था। इस फैसले के बाद समुदाय को राज्य सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ तो मिलने लगा, लेकिन केंद्रीय सेवाओं में यह लाभ अब तक लागू नहीं हो सका है।

पैनखंडा संघर्ष समिति के अनुसार, बीते नौ वर्षों से समुदाय के लोग राज्य सरकार और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग से लगातार पत्राचार कर रहे हैं, लेकिन कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई। केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल किए जाने के लिए राज्य सरकार को संस्तुति सहित प्रस्ताव केंद्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को भेजना होता है, जो आज तक नहीं भेजा गया है। इसी कारण समुदाय के लोगों में गहरी नाराज़गी पनपने लगी है।

देश की आज़ादी से पहले स्थापित पैनखंडा परगना भारत-चीन सीमा से सटा हुआ इलाका है। यहाँ के निवासी सत्तर के दशक से ही जनजाति या पिछड़ा वर्ग में शामिल किए जाने की मांग करते आ रहे हैं। उस समय सीमांत इलाकों के कई गाँवों को जनजाति क्षेत्र घोषित किया गया था, पर पैनखंडा इससे वंचित रह गया।

वर्ष 1998-99 में नगरपालिका परिषद जोशीमठ, क्षेत्र पंचायत जोशीमठ और जिला पंचायत चमोली ने अपने-अपने सदनों में प्रस्ताव पारित कर पैनखंडा को जनजाति क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की थी। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर कोई कदम नहीं उठाया, लेकिन राज्य गठन के बाद उत्तराखंड की अंतरिम विधानसभा ने यह संकल्प केंद्र सरकार को भेजा था।

साल 2011 में जब राज्य सरकार ने पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी के कुछ सीमावर्ती इलाकों को ओबीसी सूची में शामिल किया, तो पैनखंडा वासियों ने भी अपने क्षेत्र को पिछड़ा घोषित किए जाने की मुहिम तेज कर दी। इस आंदोलन का नेतृत्व भरत सिंह कुंवर और अधिवक्ता रमेश चंद्र सती ने किया। उन्होंने मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग तक ज्ञापन भेजे और आंदोलन को जनसमर्थन मिला।

इस अभियान को निर्णायक मोड़ तब मिला जब 5 जून 2016 को विश्व पर्यावरण दिवस पर उर्गम में आयोजित एक कार्यक्रम में तत्कालीन विधायक राजेंद्र भंडारी ने मुख्यमंत्री की ओर से पैनखंडा को ओबीसी सूची में शामिल करने की घोषणा की। घोषणा पर अमल न होने से आंदोलन आमरण अनशन तक पहुंचा, जिसके दबाव में सरकार को झुकना पड़ा और 21 दिसंबर 2016 को पैनखंडा समुदाय को राज्य ओबीसी सूची में शामिल करने का शासनादेश जारी हुआ।

राज्य स्तर पर तो समुदाय को आरक्षण का लाभ मिल गया, परंतु केंद्र की ओबीसी सूची में नाम न होने के कारण यह लाभ केंद्रीय सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में नहीं मिल पा रहा है।

अब नौ वर्ष बीतने के बाद पैनखंडा वासियों के धैर्य की सीमा टूटने लगी है। समुदाय में यह भावना तेजी से उभर रही है कि यदि जल्द केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल किए जाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह आंदोलन एक बार फिर बड़े रूप में उभर सकता है।

उत्तराखंड सरकार पर अब यह जिम्मेदारी है कि वह राज्य ओबीसी सूची में शामिल सीमावर्ती क्षेत्रों को केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल कराने की पहल कब तक करती है। इस पर वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा सीमांत पैनखंडा समुदाय की निगाहें टिकी हैं।

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