ईरान युद्ध की आग में झुलसती जल आपूर्ति: मध्य पूर्व में गहराता प्यास का संकट

ईरान में युद्ध शुरू हुए अभी दो सप्ताह ही बीते हैं, लेकिन इस सैन्य संघर्ष ने मध्य पूर्व की सबसे संवेदनशील नस—’जल आपूर्ति’—पर प्रहार करना शुरू कर दिया है। सैन्य अभियानों के दौरान क्षेत्र के दो प्रमुख समुद्री जल विलवणीकरण संयंत्र (Desalination Plants) क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जिसने करोड़ों लोगों के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा दिए हैं।
युद्ध के मैदान में जल-संयंत्र: हालिया हमले
पिछले सप्ताह ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की कि 7 मार्च को फारस की खाड़ी में स्थित केश्म द्वीप (Qeshm Island) के एक विलवणीकरण संयंत्र पर हमले से 30 गाँवों की जल आपूर्ति ठप हो गई। ईरान ने इसके लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि पेंटागन और इजराइल दोनों ने ही इसमें किसी भी संलिप्तता से इनकार किया है।
दूसरी ओर, बहरीन के आंतरिक मंत्रालय ने एक ईरानी ड्रोन को अपने जल संयंत्र को “भौतिक क्षति” पहुँचाने का दोषी ठहराया। हालांकि बहरीन के जल एवं विद्युत प्राधिकरण का दावा है कि वर्तमान में जल आपूर्ति प्रभावित नहीं हुई है, लेकिन इन घटनाओं ने एक खतरनाक मिसाल कायम कर दी है।

मरुस्थल की जीवनरेखा: ‘डीसेलिनेशन’ पर निर्भरता
पिछले कुछ दशकों में फारस की खाड़ी के शुष्क देशों ने अपनी बढ़ती आबादी और शहरों की प्यास बुझाने के लिए पूरी तरह से इन संयंत्रों पर भरोसा कर लिया है।
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कतर और बहरीन: अपनी ताजे पानी की कुल आवश्यकता का 50% से अधिक हिस्सा इन्हीं संयंत्रों से प्राप्त करते हैं।
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सऊदी अरब: अपनी राजधानी रियाद के लिए तटों से सैकड़ों किलोमीटर दूर पाइपलाइनों के जरिए पानी पंप करता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते सूखे और गिरते भूजल स्तर ने इन देशों को ‘टेक्नोलॉजी आधारित पानी’ का गुलाम बना दिया है। राइस यूनिवर्सिटी के पर्यावरण इंजीनियर मेनाशेम एलीमेलेक के अनुसार, “एक बड़े संयंत्र का बंद होना पूरे क्षेत्र में तत्काल हाहाकार मचा सकता है।” उदाहरण के तौर पर, बहरीन का अल दुर संयंत्र प्रतिदिन 10 लाख से अधिक लोगों को पानी देता है, जो देश की कुल जरूरत का एक तिहाई है।
युद्ध अपराध और अंतर्राष्ट्रीय कानून
अंतर्राष्ट्रीय कानून नागरिकों के अस्तित्व के लिए अपरिहार्य बुनियादी ढांचे (पानी, भोजन और ऊर्जा प्रणाली) पर हमले को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के मोहम्मद महमूद कहते हैं, “जल बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना सीधे तौर पर नागरिक आबादी को सजा देने जैसा है। यह पूर्णतः एक युद्ध अपराध (War Crime) है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि केश्म द्वीप और बहरीन की घटनाएँ “अनजाने में हुई क्षति” नहीं, बल्कि जानबूझकर दिया गया एक रणनीतिक संकेत हैं कि अब पानी भी युद्ध का हथियार है।

परोक्ष खतरे: तेल का रिसाव और ऊर्जा संकट
जरूरी नहीं कि संयंत्रों पर सीधी बमबारी ही उन्हें ठप करे। अन्य कारक भी उतने ही घातक हैं:
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तेल रिसाव (Oil Spills): यदि युद्ध के कारण समुद्र में तेल का रिसाव होता है, तो वह विलवणीकरण संयंत्रों के फिल्टर को पूरी तरह जाम कर देगा। 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान इराक द्वारा बहाए गए तेल ने सऊदी की जल आपूर्ति को महीनों तक खतरे में डाल दिया था।
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ऊर्जा निर्भरता: ये संयंत्र बिजली के भूखे होते हैं। अक्सर ये तेल और गैस संयंत्रों के पास ही स्थित होते हैं। यदि ग्रिड फेल हुआ या ईंधन की सप्लाई कटी, तो पानी अपने आप बंद हो जाएगा।
रणनीतिक भंडार: एक कमजोर ढाल
यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों ने रणनीतिक जल भंडार बनाए हैं, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि पूर्ण युद्ध की स्थिति में ये भंडार कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाएंगे। संकट की स्थिति में बोतलबंद पानी या मोबाइल डीसेलिनेशन सिस्टम ट्रकों के जरिए पहुँचाना एक “लॉजिस्टिक दुःस्वप्न” साबित होगा।

अतिरिक्त इनपुट: विलासिता और क्षेत्रीय अविश्वास
मध्य पूर्व के देशों में पानी की खपत दुनिया में सबसे अधिक है। यूएई जैसे देशों में भारी सब्सिडी के कारण गोल्फ कोर्स और विलासिता के लिए पानी का अंधाधुंध उपयोग होता है। डेविड मिशेल के अनुसार, इस सब्सिडी ने ‘जल दक्षता’ (Water Efficiency) में निवेश को हतोत्साहित किया है।
सबसे बड़ी बाधा क्षेत्रीय अविश्वास है। संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों के बावजूद, मध्य पूर्व के देशों ने अपनी जल प्रणालियों को आपस में जोड़ने (Interconnection) में रुचि नहीं दिखाई है। आपसी प्रतिद्वंद्विता के कारण ये देश साझा सुरक्षा के बजाय “आत्मनिर्भरता” (जो अब जोखिम भरी है) को प्राथमिकता दे रहे हैं।
निष्कर्ष: यह युद्ध केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि अस्तित्व का बन गया है। जब “जीवनरेखा” ही निशाने पर हो, तो जीत किसी की भी हो, हार मानवता और उस आम नागरिक की निश्चित है जिसे बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ेगा। न्यू यॉर्क टाइम्स (साभार)
रिपोर्टिंग सहयोग: लीसा फ्रीडमैन और सनम महूज़ी।
