तपता हिमालय और अनिश्चित मौसम की नई चुनौती

–जयसिंह रावत-
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा जारी वार्षिक जलवायु समीक्षा ने एक बार फिर देश के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र पर मंडराते खतरों को उजागर कर दिया है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारत में मौसम का मिजाज अब पहले जैसा नहीं रहा और जलवायु परिवर्तन के संकेत अब केवल भविष्यवाणियां नहीं बल्कि वर्तमान की हकीकत बन चुके हैं। बीते कुछ वर्षों की तरह पिछला साल भी दर्ज इतिहास के सबसे गर्म वर्षों की सूची में शामिल रहा, जिसने न केवल इंसानी जीवन को प्रभावित किया बल्कि देश की कृषि और जल सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
औसत तापमान में निरंतर होती वृद्धि
मौसम विभाग की समीक्षा के अनुसार भारत का औसत वार्षिक तापमान सामान्य से काफी ऊपर दर्ज किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि अब केवल गर्मी के महीनों में ही लू नहीं चल रही, बल्कि सर्दियों के तापमान में भी असामान्य बढ़ोतरी देखी जा रही है। रिपोर्ट बताती है कि न्यूनतम तापमान के औसत में वृद्धि होना एक चिंताजनक संकेत है, क्योंकि रातें ठंडी न होने के कारण धरती को अपनी गर्मी बाहर निकालने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। शहरीकरण और कंक्रीट के बढ़ते जंगलों ने ‘अर्बन हीट आइलैंड’ जैसी समस्याओं को जन्म दिया है, जिससे शहरों का तापमान ग्रामीण इलाकों की तुलना में कहीं अधिक बना रहता है।
मानसून की बदलती प्रकृति और वर्षा का असमान वितरण
भारत की अर्थव्यवस्था का आधार माना जाने वाला मानसून अब अपनी पारंपरिक लय खोता दिख रहा है। मौसम विभाग की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक कुल वर्षा के आंकड़े भले ही सामान्य के करीब नजर आएं, लेकिन इसके वितरण में भारी विसंगतियां पाई गई हैं। कुछ राज्यों में जहां चंद दिनों के भीतर ही पूरे सीजन की बारिश हो गई और बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए, वहीं कई इलाकों में मानसून के दौरान भी सूखे की स्थिति बनी रही। लघु अवधि की तीव्र वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे न केवल मिट्टी का कटाव बढ़ा है बल्कि खेती-किसानी के लिए जल प्रबंधन भी कठिन हो गया है।
संकट के मुहाने पर खड़ा हिमालय
इस पूरी रिपोर्ट में सबसे अधिक चिंता का विषय हिमालयी क्षेत्र की स्थिति को लेकर है। हिमालय, जिसे दुनिया का तीसरा ध्रुव कहा जाता है, जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील साबित हो रहा है। रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने की दर देश के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक है। ऊँचाई वाले क्षेत्रों में बढ़ती गर्मी के कारण ग्लेशियर तेजी से पीछे खिसक रहे हैं। बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव आया है, जिससे पहाड़ों की पारिस्थितिकी पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो रही है। हिमालयी राज्यों में बेमौसम बर्फबारी और अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाओं ने स्थानीय जनजीवन और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचाया है।
ग्लेशियरों का पिघलना और नदियों का भविष्य
हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना केवल पहाड़ों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की विशाल नदियों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। मौसम विभाग के अनुसार तापमान वृद्धि के कारण बनने वाली ‘ग्लेशियर झीलें’ निचले इलाकों के लिए एक बड़ा खतरा बन गई हैं। इन झीलों के फटने से आने वाली तबाही के उदाहरण हाल के वर्षों में कई बार देखे गए हैं। इसके अलावा, सर्दियों में कम बर्फबारी और गर्मियों में अत्यधिक गर्मी के कारण नदियों के जलस्तर में अनिश्चितता बढ़ गई है, जो भविष्य में करोड़ों लोगों के लिए पेयजल और सिंचाई का संकट पैदा कर सकती है।
चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति
रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा मौसम की मारक क्षमता पर केंद्रित है। अब चक्रवातों की तीव्रता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी, दोनों ही क्षेत्रों में समुद्री सतह का तापमान बढ़ने से उठने वाले तूफान अब अधिक विनाशकारी साबित हो रहे हैं। इसके साथ ही, देश के विभिन्न हिस्सों में आकाशीय बिजली गिरने और ओलावृष्टि की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई है। ये घटनाएं न केवल जान-माल की हानि कर रही हैं, बल्कि देश की जीडीपी पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं।
नीतियों को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढालना होगा
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की यह रिपोर्ट एक स्पष्ट चेतावनी है कि हमें अपनी विकास नीतियों को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढालना होगा। हिमालयी क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण कार्य पर लगाम लगाने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। रिपोर्ट के निष्कर्ष यह सुझाव देते हैं कि केवल डेटा का संकलन पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें एक ऐसी चेतावनी प्रणाली और बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है जो भविष्य की इन चुनौतियों का सामना कर सके। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो प्रकृति का यह बदलता स्वरूप आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अपूरणीय क्षति बन सकता है । (लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं -एडमिन)
