जलवायु परिवर्तन की नई पहेली: एरोसोल और जलवाष्प का घातक गठजोड़
The Indo-Gangetic Plain (IGP) region is considered a global hotspot of aerosol loading, with high spatio-temporal variability in aerosols and water vapor content, making accurate quantification of their climatic response quite challenging and uncertain. To refine climate projections and assess the implications of atmospheric composition changes on regional climate dynamics in and around IGP, it is important to analyse the relationship between aerosol loading and WVRE.


-ज्योति रावत
इंडो-गैंगेटिक प्लेन (IGP) पर हुए एक नए शोध ने जलवायु परिवर्तन के पीछे छिपे उन कारकों को उजागर किया है, जो अब तक अनुमानों से परे थे। वैज्ञानिकों ने पाया है कि भारतीय मानसून और क्षेत्रीय मौसम को समझने के लिए केवल प्रदूषण (एरोसोल) ही नहीं, बल्कि जलवाष्प (Water Vapour) की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
क्या है मुख्य खोज?
आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES), नैनीताल और भारतीय ताराभौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस संयुक्त अध्ययन में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है: वायुमंडल को गर्म करने में जलवाष्प का प्रभाव एरोसोल (प्रदूषण के कणों) से कहीं अधिक है।
एरोसोल और जलवाष्प का आपसी संबंध
वायुमंडल में मौजूद धूल, धुएं और प्रदूषण के बारीक कणों को ‘एरोसोल’ कहा जाता है। ये और जलवाष्प मिलकर सूरज की रोशनी को सोखते और बिखेरते हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान और मौसम चक्र प्रभावित होता है। शोध के अनुसार:
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साफ हवा में अधिक गर्मी: जब हवा साफ होती है (एरोसोल कम होते हैं), तब जलवाष्प का विकिरण प्रभाव (Radiative Effect) सतह और निचले वायुमंडल पर बहुत अधिक शक्तिशाली होता है।
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प्रदूषित हवा का असर: जब वातावरण में एरोसोल की मात्रा अधिक होती है, तो जलवाष्प का प्रभाव वायुमंडल के ऊपरी हिस्से (Top of the Atmosphere) पर अधिक दिखाई देता है।
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तालमेल की जरूरत: शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य के जलवायु पूर्वानुमानों के लिए इन दोनों के ‘आपसी तालमेल’ को समझना अनिवार्य है।
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चित्र 2 : एरोसोल के गुणों और वर्षा योग्य जल वाष्प का जलवायु विज्ञान।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन?
भारत का गंगा का मैदानी क्षेत्र (Indo-Gangetic Plain) दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है। यहाँ एरोसोल और जलवाष्प की मात्रा में भारी उतार-चढ़ाव होता है। इस अध्ययन से हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि:
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भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून कैसे बदल रहा है।
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क्षेत्रीय तापमान में वृद्धि के पीछे असली कारण क्या हैं।
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भविष्य के लिए सटीक जलवायु मॉडल कैसे बनाए जाएं।
शोध की टीम और तकनीक
डॉ. उमेश चंद्र दुमका (ARIES) और डॉ. शांतिकुमार एस. निंगोमबम (IIA) के नेतृत्व में हुए इस शोध में ग्रीस और जापान के अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया। टीम ने गंगा के मैदान में स्थित 6 AERONET (एरोसोल रोबोटिक नेटवर्क) केंद्रों के डेटा का विश्लेषण किया और जटिल SBDART मॉडल का उपयोग करके यह निष्कर्ष निकाला।
यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन केवल कार्बन डाइऑक्साइड या बाहरी प्रदूषण तक सीमित नहीं है; हमारे वायुमंडल की प्राकृतिक नमी (जलवाष्प) और प्रदूषण का मेल एक जटिल संतुलन बनाता है, जो सीधे हमारी खेती, बारिश और जीवन को प्रभावित करता है।
प्रकाशन विवरण: यह शोध प्रसिद्ध Atmospheric Research Journal में प्रकाशित हुआ है।
