ब्लॉगशिक्षा/साहित्य

आदमी के पास वक्त कहां !! क्या सचमुच ऐसा ही है ?

 

–गोविन्द प्रसाद बहुगुणा
स्कूल में अंग्रेज कवि WH Davies की यह कविता Leisure कभी पढी थी-What is this life if, full of care,We have no time to stand and stare
तो उसी तर्ज में लिखी एक इस्राइली कवि यहूदा अमिचाई की यह कविता मुझे बहुत पसंद आई
“आदमी के पास अपनी जिन्दगी में हर काम के लिए वक्त कहाँ”!! –
यहूदा अमिचाई का एक कविता संकलन मुझे मेरे मित्र लीलाधर जगूड़ी ने वर्षों पहले भेंट किया था, उसी में पढ़कर इस कविता का भावानुवाद स्वान्त:सुखाय करने की कोशिश मैने उसी समय की थी, जिसे शेयर करने की इच्छा आज फिर बलवती हो ही गई आखिर ‘निज कवित केहि लाग न‌नीका….

आदमी के पास अपनी जिन्दगी में वक्त कहाँ!
कि उसको हर काम के लिये वक्त मिल जाये
उसके लिये किसी मौसम की इंतजार नही
जिसमें उसके सब काम हो जाये।
ये पादरी भी गलत साबित हुए
जो कहते हैं कि आपके पास हर समय वक्त है ।
2
आदमी को एक ही वक्त में
मोहब्बत और नफरत साथ साथ करनी पड़ती है।
उन्हीं आंखों से हंसना और उन्हीं से रोना पड़ता है।
लडाई के बीच मुहब्बत और मुहब्बत के बीच लडाई लड़नी पडती है ।
और फिर उसी बीच नफरत और उसी बीच माफ़ करना भी होता है ,
फिर याद करना और भूल जाना
मिजान बैठाना और फिर उसी को पलट देना ,
खाना खाना और हजम करना
जिसको करने में कभी इतिहास बीत जाता है
सालों साल गुजर जाते हैं जिसे करने में ।
वाकई आदमी के पास वक्त नहीं है।
जब वह कुछ खोता है, तो पाता भी है
जब उसको कुछ मिलता है
तो वह भूल भी जाता है ,
जब वह भूलने लगता है तो फिर इश्क होने लगता है II
3
उसका जमीर तप तपाकर पुख्ता हो जाता है
उसका जमीर भी पक्का पेशेवर बन जाता है
सिर्फ रूह रह जाती है हमेशा
अनाड़ी और अधपकी
उसकी यही रूह कोशिश करती है
और फिर चूक जाती है।
गड़बड़ी में भी फंस जाती है ,
कुछ समझ नहीं आता
हमेशा मदहोश और ऐशो आराम में अंधी बनी हुई
जिसमें उसके गिले- शिकवे भी शामिल हैं II

पतझड़ के पत्तों की तरह
वह भी एक दिन मिटटी हो जाएगा
सूखकर सिकुडा,अपने दिन पूरे कर चुका
मगर शराफत में प्यारा
जैसे जमी
पर सूखते जाते पत्ते I
सूनी डालें इशारा करती उस तरफ
जहां हर चीज के लिये वक्त फैला है।
( भावानुवाद -गोविन्द प्रसाद बहुगुणा )

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A Man Doesn’t Have Time In His Life

A man doesn’t have time in his life
to have time for everything.
He doesn’t have seasons enough to have
a season for every purpose. Ecclesiastes
Was wrong about that.

A man needs to love and to hate at the same moment,
to laugh and cry with the same eyes,
with the same hands to throw stones and to gather them,
to make love in war and war in love.
And to hate and forgive and remember and forget,
to arrange and confuse, to eat and to digest
what history
takes years and years to do.

A man doesn’t have time.
When he loses he seeks, when he finds
he forgets, when he forgets he loves, when he loves
he begins to forget.

And his soul is seasoned, his soul
is very professional.
Only his body remains forever
an amateur. It tries and it misses,
gets muddled, doesn’t learn a thing,
drunk and blind in its pleasures
and its pains.

He will die as figs die in autumn,
Shriveled and full of himself and sweet,
the leaves growing dry on the ground,
the bare branches pointing to the place
where there’s time for everything.

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