“ये क्या गांधी का लंगोट उठा लाए !!”

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा –
जब राजकुमारी एलिजाबेथ, जो बाद में इंग्लैंड की एलिजाबेथ द्वितीय नाम से महारानी बनी, की शादी नवंबर १९४७ में डेन्मार्क के प्रिंस फिलिप माउंटबेटैंन के साथ संपन्न हुई थी, तो देश विदेश के राजे महाराजाओं को शादी का निमंत्रण भेजा गया । उस समय यहां भारत में लॉर्ड माउंटबेटन ब्रिटिश हुकूमत के आखिरी गवर्नर जनरल के रूप में तैनात थे । महारानी के वह रिश्ते में चाचा लगते थे इसलिए शादी में जाना ही था । वह दुल्हन के लिए बतौर उपहार रेशमी खादी का बना एक शाल या स्कार्फ ले गए थे महारानी को देने के लिए ।
इस अवसर पर जितने भी उपहार रानी को प्राप्त हुए थे, उनकी प्रदर्शनी बंकिंघम पैलेस के एक कक्ष में लगाई गई, जिसको देखने सभी मेहमान आए। सबकी दिलचस्पी और उत्सुकता यह देखने में थी कि भारत के गवर्नर जनरल माउंटबेटन क्या उपहार लाए होंगे । जब उन्होंने वह रेशमी शाल देखा तो शाही परिवार के एक सदस्य के मुख से निकल पड़ा कि अरे! ये क्या गांधी का लंगोट उठा लाए भेंट करने को!! ”
यह प्रसंग मैने कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित एक पुस्तक में पढ़ा था जिसका टाइटल था –
Indian Summer: The Secret History of the End of an Empire. इस किताब के लेखक का नाम
Alex von Tunzelmamann है जो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इतिहास की एक शोध छात्र रही और जर्मन मूल की है तथा एक बहुत प्रसिद्ध टिप्पणीकार और लेखक के रूप में चर्चित हैं . .
GPB
