बजट क्या है ?

-MILIND KHANDEKAR
बजट और अर्थव्यवस्था को लेकर मेरी जितनी भी समझ बनी है उसका निचोड़ यहाँ है. पांच सवालों के जवाब आपको बजट को समझने में मदद करेंगे. हिसाब किताब रविवार की सुबह प्रकाशित होता है, लेकिन इस बार शनिवार को प्रकाशित कर रहा हूँ. अगर हो सका तो सोमवार की सुबह नया अंक देने की कोशिश करूँगा.
बजट क्या है?
हर महीने आपकी सैलरी आती है, फिर आप उसके हिसाब से खर्चे तय करते हैं. सरकार का बजट कुछ वैसा ही है लेकिन सरकार हर महीने हिसाब नहीं लगाती है. एक अप्रैल से वित्त वर्ष शुरू होता है तो सरकार उसके पहले हिसाब लगाती है कि उसे अगले साल कितनी सैलरी मिलेगी यानी कितनी आमदनी होगी? किस किस ज़रिए से होगी और फिर सरकार कहाँ कहाँ खर्च करेगी? केंद्र सरकार हर साल एक फ़रवरी को बजट पेश करती है.
आप कहेंगे कि तो मुझे क्या फर्क पड़ता है?
तो जान लीजिए कि सरकार की आमदनी का सबसे बड़ा ज़रिया हम ही हैं. हम ही सरकार को टैक्स देते हैं. उसके घटने बढ़ने का सीधा असर हमारी जेब पर पड़ता है.
फिर सरकार खर्च कहाँ करती है उस पर बाज़ार की नज़र होती है. सरकार किस सेक्टर में खर्च बढ़ाएगी जैसे रेलवे, सड़क या एयरपोर्ट बनाएगी या सरकार किसी सेक्टर की पॉलिसी बदलेगी तो उससे किस कंपनी को फ़ायदा होगा या नुक़सान. इससे शेयर के दाम घट बढ़ सकते हैं. इसका असर आपके पोर्टफ़ोलियो पर पड़ेगा.
Fiscal Deficit क्या है?
बजट के दौरान एक शब्द बार-बार आता है सरकार का Fiscal Deficit कितना है यानी सरकार का घाटा कितना है? आसान भाषा में समझिए कि सरकार का क्रेडिट कार्ड बिल है Fiscal Deficit. सैलरी कई बार कम पड़ जाती है. आप खर्चा पूरा करने के लिए क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं मतलब उधार लेते हैं. सरकार की आमदनी कम होती है और खर्च ज़्यादा. इसे मोटे तौर पर Fiscal Deficit कहते हैं. इसको पूरा करने के लिए सरकार क़र्ज़ लेती है. फ़र्क़ इतना है कि सरकार का क़र्ज़ लाँग टर्म होता है और वो ब्याज चुकाकर काम चलाती रहती है.
आप कहेंगे कि सरकार के घाटे से मुझे क्या फर्क पड़ता है ? तो बहुत फर्क पड़ेगा आपकी जेब पर. सरकार के ज़्यादा घाटे का मतलब है सरकार बाज़ार से और लोन लेगी. सरकार लोन लेगी तो ब्याज दर बढ़ती है यानी इससे आपकी EMI बढ़ेगी. सरकार के ज़्यादा घाटे से महंगाई भी बढ़ती है. आपके खर्चे बढ़ जाते हैं.
Direct और Indirect Tax क्या है?
सरकार की सैलरी यानी आय का बड़ा हिस्सा आता है टैक्स से . आपने सुना होगा कि डायरेक्ट टैक्स होता है और इन डायरेक्ट टैक्स. इसका फर्क समझिए डायरेक्ट टैक्स वो होता है तो आपकी सैलरी से कटता है यानी इनकम टैक्स. कंपनियों को डायरेक्ट टैक्स उनके प्रॉफिट पर देना होता है यानी कॉरपोरेट टैक्स.
इन डायरेक्ट टैक्स हुआ जो आप खर्च करते हैं. GST गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स जब आप कोई सर्विस या सामान ख़रीदते हैं तो देना पड़ता है. एक्साइज ड्यूटी सामान बनाने वाली फैक्ट्री पर लगता है जैसे पेट्रोल, डीज़ल या शराब पर लगता है. कस्टम ड्यूटी तब लगती है जब आप विदेश से आया कोई सामान ख़रीद रहे हैं जैसे सोना, फोन . यह सारे इन डायरेक्ट टैक्स है. सरकार अब ज़्यादा पैसे डायरेक्ट टैक्स से कमाती है और डायरेक्ट टैक्स में भी सबसे ज़्यादा इनकम टैक्स से जो आप और हम चुकाते हैं
Capital और Revenue Expenditure क्या है ?
आपकी सैलरी से आपके घर का खर्च चलता है जैसे किराया, राशन, गाड़ी का पेट्रोल, बच्चों की फ़ीस, माँ बाप की दवाई लेकिन इन ख़र्चों से कोई संपत्ति नहीं खड़ी होती है. वैसे ही सरकार चलाने का जो खर्च है वो Revenue Expenditure कहलाता है जैसे कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन या मुफ्त राशन, किसान या महिलाओं को कैश जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर . क़र्ज़ का ब्याज भी इसके तहत आता है. यह खर्च जितना कम उतना अच्छा माना जाता है.
दूसरी तरफ़ Capital Expenditure अच्छा माना जाता है. आपने कार ख़रीदी , लैपटॉप ख़रीदा या घर ख़रीदा तो यह Long Term Asset बनेगी जैसे सरकार एयरपोर्ट बनाती है, रेलवे लाइन बिछाती है. स्कूल या यूनिवर्सिटी की बिल्डिंग बनाती है तो यह खर्च अच्छा है. लंबे समय तक फ़ायदा होगा.
एक लाइन में कहें तो कार ख़रीदना Capital Expenditure है जबकि पेट्रोल भरवाने का खर्च Revenue Expenditure . सरकार को भी Revenue Expenditure को क़ाबू में रखना चाहिए . रेवड़ियाँ इसी खर्च में आती हैं. Capital Expenditure को बढ़ाना चाहिए
GDP क्या है?
GDP को मानिए गुल्लक है जिसे पूरे देश ने मिलकर भरा है. इसमें हमारा आप सबका रोजमर्रा का खर्च डाला है. सरकार का खर्च है. फिर वो सारे खर्चे हैं जो किसी Asset को बनाने में सरकार या प्राइवेट कंपनी खर्च करती हैं जैसे एयरपोर्ट, कारख़ाने, मशीनरी. इन तीनों का जोड़ मिलाकर बनता है Gross domestic product. पिछले साल ₹100 थे गुल्लक में अब ₹107 तो ग्रोथ रेट हुई 7%. हर साल गुल्लक में पिछले साल से ज़्यादा पैसे जमा होते है तो वो हुई GDP ग्रोथ.हम कहते हैं कि दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है मतलब हमारी ग्रोथ सबसे ज़्यादा है. अब तो हमारा गुल्लक आने वाले समय में तीसरा सबसे बड़ा होगा. फिर भी सवाल है कि लोग गरीब क्यों हैं?
तो ऐसे समझिए कि जापान का का गुल्लक हमारे बराबर हैं लगभग. जापान में यह गुल्लक सिर्फ 12 करोड़ लोग भरते हैं जबकि भारत में 150 करोड़. उसी साइज के गुल्लक पर हमारे यहाँ 12 गुना ज़्यादा दावेदार हैं. इसलिए Per Capita income यानी प्रति व्यक्ति आय में हमारी रैंकिंग दुनिया में 140 पर पहुँच जाती है. देश पहले से अमीर हो रहा है लेकिन लोग अब भी गरीब हैं.
