यह घटना 29 फरवरी, 1504 की है।

कोलंबस और भविष्यवेत्ता का खेल

अपनी चौथी समुद्री यात्रा के दौरान, क्रिस्टोफर कोलंबस और उनका दल जमैका के तट पर फंस गया था। उनके जहाज खराब हो चुके थे और भोजन की भारी कमी थी। शुरुआत में वहां के मूल निवासियों (अरावक जनजाति) ने उनकी मदद की, लेकिन समय बीतने के साथ आपसी तनाव बढ़ा और निवासियों ने भोजन देना बंद कर दिया।

भूख से मरते अपने दल को बचाने के लिए कोलंबस ने एक चतुर योजना बनाई:

  • खगोलीय ज्ञान: कोलंबस के पास जर्मन खगोलशास्त्री जोहान्स मुलर (रेगियोमोंटानुस) की एक पंचांग (Almanac) थी, जिसमें आगामी ग्रहणों की जानकारी थी।

  • चेतावनी: कोलंबस ने स्थानीय प्रमुखों को बुलाया और दावा किया कि उनका देवता उनसे नाराज है क्योंकि उन्होंने उसके लोगों को भोजन नहीं दिया। उसने घोषणा की कि सजा के तौर पर उस रात चंद्रमा गायब हो जाएगा और क्रोध से लाल हो जाएगा।

  • नतीजा: जैसे ही रात हुई और पूर्ण चंद्र ग्रहण शुरू हुआ, चंद्रमा धीरे-धीरे काला पड़ा और फिर गहरा लाल (Blood Moon) हो गया।

  • प्रतिक्रिया: मूल निवासी बुरी तरह डर गए। वे कोलंबस के पास गिड़गिड़ाते हुए पहुंचे और मदद की गुहार लगाई। कोलंबस ने कुछ देर अपने केबिन में ‘प्रार्थना’ करने का ढोंग किया (जबकि वह वास्तव में रेत की घड़ी से ग्रहण के समाप्त होने का समय माप रहा था)।ऐतिहासिक महत्व

जैसे ही ग्रहण समाप्त हुआ और चंद्रमा वापस चमकने लगा, निवासियों का विश्वास पक्का हो गया कि कोलंबस के पास दैवीय शक्तियां हैं। इसके बाद, जब तक कोलंबस को बचाने के लिए दूसरा जहाज नहीं आया, तब तक उन्हें भोजन और सहायता मिलती रही।