जब ऊँची नाक वाले प्रोफेसर उचक गये थे !!

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा
ऐसी बात नहीं है कि सब बाबू लोग ऐसे ही होते हैं जिनके बारे में आपने अभी तक BHU के एक प्रसंग में सुना था I कई बाबू आइंस्टीन की तरह भी हुए जिन्होंने नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया ।
शुरू में बेरोज़गारी के दौरान आइंस्टीन ने बहुत दिनों तक बाबूगिरी की थी । वह बड़े स्वाभिमानी व्यक्ति थे किसी मित्र से आर्थिक मदद लेना नहीं चाहते थे लेकिन जब फाके की नौबत आने लगी तो उनके एक मित्र ने उनको अपने ही दोस्त के एक संस्थान में क्लर्क की नौकरी दिला दी। वहां नियुक्ति पाने पर आइंस्टीन आफिस का अपना काम झट- पट निपटा देते थे और खाली समय में वह अपने थीसिस के काम में लग जाते थे। उन्हीं दिनों उन्होंने अपनी थीसिस पूरी कर डाली ।
एक दिन पोस्ट ऑफिस में वह अपनी थीसिस का पार्सल स्विस अकादमी को भेज रहे थे, तो वहीं पर एक प्रोफेसर भी अपने पेपर्स उसी स्विस अकादमी को भेज रहे थे। पार्सल हो जाने के बाद वे दोनों बाहर आये, एक छोटी चाय की दूकान में बैठकर दोनों की बातें हुई ।
जब प्रोफेसर साहब को पता चला कि – अरे जिससे मैं बातें कर रहा हूं वह कोई प्रोफेसर नहीं बल्कि एक मामूली बाबू है , उसके अहम् को ऐसा झटका जैसे मानो बिजली का झटका लगा हो , वह एकदम उठकर चले दिए ।
यह प्रसंग सुप्रसिद्ध कहानीकार और जर्मनभाषा के ज्ञाता स्व०मोहन थपलियाल द्वारा अनूदित आइन्सटाइन की बायोग्राफी में मैने पढ़ा था। थपलियाल जी ने यह किताब मुझे एक दिन
लखनऊ में भेंट की थी, जब वे अस्वस्थ चल रहे थे तो मैं उन्हें देखने गया था ।
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