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कब छंटेगा एसआईआर से धुंधलका?

अरुण श्रीवास्तव-

आम जीवन में भी जब कोई चीज़ अर्से तक बनी रहती है तो अजीब सी उलझन होती है कि, आखिर कब हटेगा यह धुंधलका। अब चाहे वह व्यक्तियों, समाजों व देशों की परिस्थितिजन्य (गरीबी, महंगाई बेरोजगारी) समस्या हों या प्रकृति जन्य (लंबे समय तक एक तरह का मौसम) यह सवाल पैदा ही होता है कि कब छंटेगा यह धुंधलका?
इधर कुछ सालों से ऐसा ही कुछ चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर भी हो रहा है। ऐसा नहीं कि ‘ऐसा’ पहली बार हो रहा है। हर चुनावों के बाद हुआ है और होगा भी। इस बार कुछ ज्यादा हुआ और निकट भविष्य में और भी ज्यादा होने की आशंका जताई जा रही है। नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के पहले हुई एसआईआर प्रक्रिया ही पक्षपाती लगती है। क्योंकि यह काम प्रस्तावित विधानसभा चुनाव के ऐन वक्त पर किया जा रहा है। वह भी तब जब इस प्रदेश का अधिकतर क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित है।

ज़ान है तो ज़हान है : बिहार से एसआईआर मामले में यह बात सामने आई “जान बचाएं या वोट बचाएं”, कुछ वोटर ने साफ़ साफ़ कहा कि,हमारा सब कुछ डूब गया ऐसे में वोट तब ही देंगे जब ज़िंदा रहेंगे’। यह वास्तविकता भी है।

बाढ़ में 20 लाख लोग विस्थापित हैं, सैकड़ों गांव का पता नहीं पर एस आई आर होकर रहेगा और तय समय और मानकों पर ही। सर्वोच्च न्यायालय की ‘चिरौरी’ पर भी आयोग को कोई फर्क नहीं पड़ा। घमंड में कि हम संवैधानिक संस्था हैं। वैसे मतलब तो जेडीयू और भाजपा गंठबंधन वाली सरकार को भी नहीं पड़ रहा है।
मोटामोटी बाढ़ से 20 लाख लोग विस्थापित हैं।

कभी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट नहीं गया पर दैनिक समाचार पत्रों की खबरों को तो देख कर ऐसा लगता है कि चूहे बिल्ली का खेल चल रहा है। कभी टिप्पणी (आदेश नहीं) कुछ और सोचने को मजबूर करती है तो कभी और। ताज़े मामले को ही ले लीजिए।
अब तक ज्ञात समाचारों के अनुसार तरह-तरह से की जाती है वोट चोरी : हर बार वोट चोरी का तरीका बदलता है। ईवीएम आने के पहले मतपेटियों को लूट लिया जाता था, मतदान केंद्रों पर कब्ज़ा कर लिया जाता था या मतदाताओं को केंद्र तक पहुंचने ही नहीं दिया जाता था, ईवीएम आने के बाद उसे किया जाने, उसके साथ छेड़छाड़ करने और तकनीकी बाधा डालने जैसे कार्य किए जाने लगे।

और अब चुनाव आयोग को नये नये तरीके ईजाद करने में लगा दिया गया। मसलन खुद को न मिलने वाले वोटों को चिन्हित कर वोटर लिस्ट से हटवाना/जुड़वाना, मतदान की गति धीमी करना, तय सीमा के बाद वोटरों की संख्या में उछाल लाना आदि।

इस बार के महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में तय समय-सीमा के बाद वोट देने वालों की संख्या में शेयर बाजार की तरह उछाल आया। हंगामा मचना स्वाभाविक था और मचा भी। एक प्रमुख दल के नेता ने आरोप लगाया कि, पांच साल में जितने मतदाता अकेले हिमाचल प्रदेश में बने या बढ़े कमोबेश उतने ही पांच महीने में महाराष्ट्र में अधिक हुए। सवाल तो है कि आखिर वोटरों की इतनी फ़ौज आयी कहां से। जबकि पलायन हर ज़िले, हर प्रदेश ही नहीं देश से भी हो रहा है।

इसी तरह एस आई आर के शुरुआती दौर में सुनने को मिला कि 65 लाख मतदाताओं के नाम कटेंगे और कटे भी उतने ही। कटने वालों में सबसे ज्यादा मरने वालों की भी संख्या रही। महाराष्ट्र में चुनाव से ठीक पहले लाखों लोग वयस्क होकर वोटर लिस्ट में शामिल हो गए तो बिहार में एक साल बीतते लाखों लोग मर गए, बिहार छोड़ कर चले गए। एक साल पहले इसलिए कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले संशोधित की गई होगी सूची क्योंकि हर साल सारांश पुनरीक्षण का नियम है। जिसके अनुसार बीएलओ घर-घर जाकर मतदाताओं की तहकीकात करता है ताकि सूची सही हो। ज्ञातव्य है कि इस बार एसआईआर हो रहा है।

आयोग का दावा है कि यह पहली बार नहीं हो रहा है, 2003 में भी हुआ था। एक याचिकाकर्ता योगेन्द्र यादव के अनुसार तब एआर हुआ था न कि, एसआईआर। तब तक बीएलओ का अस्तित्व नहीं था, चुनाव कार्य से जुड़े/जोड़े गए तथा लेखपाल या पटवारी मतदाताओं के पास जाकर जानकारी एकत्र करते थे। चुनाव आयोग के इतिहास में पहली (शायद) बार ऐसा हो रहा है कि मतदाताओं से कहा जा रहा है कि आप साबित करो कि वोटर हो या हो सकते हो और साबित भी तय समय में करो। नाम कटने पर यह भी साबित करो कि तुम जिंदा हो, बाहर चले गए हो या मकान बदल दिया। मकान से झोपड़ी में रह रहे हो तब भी वर्ना मकान नंबर के सामने ज़ीरो लिख देंगे। आयोग के बीएलओ तीन बार जाएंगे फार्म देने बाकी जिम्मेदारी आपकी।

शायद एकमात्र बिहार ही ऐसा राज्य है जिसके निवासी पूरे देश फैले हुए हैं जिनमें से अधिकतर दूसरे राज्यों में भवन निर्माण व खेती किसानी का काम करते हैं। वोटर लिस्ट में संशोधन कराने का समय जुलाई अगस्त है। जो कि धान की बुआई-रोपाई का होता है। ऐसे में मतदाता सब कुछ छोड़ कर संशोधन के लिए आए। आयोग का कहना है कि वह ऑनलाइन भी कर सकता है। खेत से पसीने पसीने आये लैपटॉप उठाये और जुट जाए करेक्शन में।

मामला कोर्ट में आया। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में आधार कार्ड को मानने की सलाह दी। आनाकानी करते हुए आयोग ने मना कर दिया। कोर्ट ने फिर कहा तो हम संवैधानिक संस्था हैं आदेश मानने के लिए बाध्य नहीं। फिर कोर्ट ने एक चूड़ी और कसी कि जिनके नाम काटे गए हैं उन्हें बताएं, ऑनलाइन बताएं और आधार कार्ड को भी आधार मानें। तीसरी सुनवाई में कोर्ट ने जब एक चूड़ी और टाइट कि, तब आयोग ने चोर रास्ता ही अपनाया, वोटर आधार कार्ड दे सकते हैं पर 11 विकल्पों में से एक तो देना ही होगा।

एक कहावत है चोर चोरी से जाता है हेराफेरी से नहीं। अब तक की हुई सुनवाई के दौरान यह भी अखबारों में छपा कि 1.6 बूथ एजेंट है पर दो आपत्तियां ही आईं। बीएलओ आयोग द्वारा रखा गया सरकारी-अर्धसरकारी होता है और अधिकारी स्तर का अतिरिक्त वेतनभोगी होता है। बीएलए राजनीतिक दलों का एजेंट होता है। बीएलए का काम अपने बूथ तक सीमित होता है। पार्टियां चुनाव में होने वाली संभावित धांधली को रोकने के लिए अपना प्रतिनिधि रखतीं हैं। सभी पार्टियां बीएलए ही नहीं रख पातीं। जब ऐन चुनाव के समय भी मुख्य तौर पर सत्ताधारी और मुख्य विपक्षी दलों को छोड़कर अन्य के बीएलए नहीं होते। मतदान केंद्रों के अंदर क्या वोटरों को बाहर पर्ची देने के लिए भी कार्यकर्ताओं का टोटा रहता है ऐसे में उनसे उम्मीद करना की वो हर चीज़ पर निगरानी रखें अव्यावहारिक ही है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं लेकिन लेख में प्रकट विचारों से एडमिन का सहमत होना जरूरी नहीं है – एडमिन)

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