जहाँ कचरे को मिलता है उद्देश्य: पूर्वोत्तर भारत से सीख
High in the hills and valleys of Northeast India, where rivers carve their own stories and forests breathe with ancient rhythm, a quiet revolution is unfolding. Here, change doesn’t arrive with grand announcements. Instead, it moves in the soft clatter of segregated bins, the hum of village-run recycling units, and the determined footsteps of citizens who refuse to let their lands drown in waste. Across the region, from bustling market towns to remote hamlets, communities are rewriting the narrative of waste management with startling resolve. What was once an overwhelming challenge is now becoming a canvas for innovation: plastic transformed, compost pits doubling as livelihood sources, groups pioneering recycling networks, and municipalities redefining what a clean city can truly look like.

-A PIB FEATURE EDITTED BY USHA RAWAT–
पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों और घाटियों में, जहाँ नदियाँ अपनी कहानियाँ खुद गढ़ती हैं और जंगलों में सदियों पुरानी लय सांस लेती है, वहाँ एक शांत लेकिन प्रभावशाली क्रांति आकार ले रही है। यहाँ बदलाव बड़े-बड़े ऐलानों के साथ नहीं आता, बल्कि वह कचरे के अलग-अलग डिब्बों की हल्की खनक, गांवों द्वारा संचालित रीसाइक्लिंग इकाइयों की गूंज और उन नागरिकों के दृढ़ कदमों में दिखाई देता है, जिन्होंने अपने भूभाग को कचरे में डूबने न देने का संकल्प लिया है।
पूरे क्षेत्र में—चहल-पहल वाले बाजार कस्बों से लेकर दूरस्थ गांवों तक—समुदाय कचरा प्रबंधन की कहानी को नए सिरे से लिख रहे हैं। जो कभी एक गंभीर समस्या थी, वह अब नवाचार का मंच बन रही है: प्लास्टिक का रूपांतरण, आजीविका के साधन बनते कम्पोस्ट गड्ढे, रीसाइक्लिंग नेटवर्क की पहल करते समूह और नगर निकाय जो “स्वच्छ शहर” की परिभाषा को नए सिरे से गढ़ रहे हैं।

पूर्वोत्तर में बदलाव की कहानियाँ
दशकों पुराने डंपसाइट्स को पुनर्जीवित करने, नदियों को पुनर्स्थापित करने, त्योहारों को नए रूप में ढालने और नागरिकों को सार्वजनिक स्थलों का संरक्षक बनाने तक—पूर्वोत्तर भारत में एक गहरा बदलाव स्पष्ट दिखता है। यहाँ कचरे को नजरों से ओझल करने के बजाय उसे पुनः उपयोग, पुनर्प्राप्ति और प्रकृति के प्रति सम्मान पर आधारित व्यवस्थाओं में जिम्मेदारी से शामिल किया जा रहा है। क्षेत्र में चल रही अनेक प्रेरक पहलों में से कुछ उदाहरण पूर्वोत्तर की उस क्षमता को दर्शाते हैं, जो चुनौतियों को अवसर और कचरे को सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बना देती है।
नॉर्थ लखीमपुर: असम की शहरी हरित क्रांति का नेतृत्व
असम का नॉर्थ लखीमपुर, स्वच्छ भारत मिशन–शहरी 2.0 के अंतर्गत वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरा है। नगर पालिका ने चंदमारी डंपसाइट से 79,000 मीट्रिक टन पुराना कचरा हटाया, जिससे 16 बीघा भूमि मुक्त हुई। इसके अतिरिक्त 10 बीघा भूमि को अर्बन फॉरेस्ट और अर्बन रिट्रीट ज़ोन में विकसित किया जा रहा है। पास की सुमदिरी नदी के पुनर्जीवन से स्थानीय जैव विविधता को भी नया जीवन मिला है, जिससे पक्षियों, मछलियों और जलीय जीवों की वापसी हुई है।

दैनिक कचरा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए शहर अब प्रतिदिन 36 से 42 टन नगरपालिका कचरे का आधुनिक प्रणालियों के माध्यम से प्रसंस्करण करता है। जापिसाजिया में स्थापित असम का पहला एकीकृत केंद्र—जहाँ मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) और वेस्ट-टू-कम्पोस्ट (WTC) संयंत्र एक साथ कार्य करते हैं—रीसाइक्लिंग, पृथक्करण और कम्पोस्टिंग की प्रक्रिया को एक ही स्थान पर पूरा करता है। 7,000 वर्गफुट में फैली MRF की क्षमता 100 टन प्रतिदिन है, जबकि WTC इकाई प्रतिदिन 25 टन गीले कचरे को जैविक खाद में परिवर्तित कर स्थानीय किसानों को उपलब्ध कराती है। इन प्रयासों ने “स्वच्छ लखीमपुर” को असम में सतत शहरी विकास का आदर्श बना दिया है।
साझा जिम्मेदारी, स्वच्छ सड़कें: मिज़ोरम की मिसाल
आइजोल शहर ने स्वच्छता अभियान को जनभागीदारी के साथ नई दिशा दी है। 5 जून 2025 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर शुरू की गई “अडॉप्ट–ए–डस्टबिन योजना” नगर के समग्र ठोस कचरा प्रबंधन प्लान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।इस योजना के तहत नागरिक, दुकानदार, संस्थान, स्वयंसेवी संगठन, युवा समूह और सामुदायिक संस्थाएँ सार्वजनिक कूड़ेदानों को “गोद” लेकर उनके आसपास की सफाई की जिम्मेदारी निभाते हैं, जब तक कि नगर निगम द्वारा कचरा एकत्र नहीं कर लिया जाता। योजना को जबरदस्त समर्थन मिला है—शहर के 75 स्थानों पर 95 कूड़ेदान अपनाए जा चुके हैं। कई प्रतिभागियों ने केवल सफाई तक सीमित न रहकर साइनबोर्ड लगाए, स्थानों का सौंदर्यीकरण किया और जनजागरूकता भी फैलाई। साझा स्वामित्व की इस भावना ने आइजोल में कचरा प्रबंधन को एक जनांदोलन में बदल दिया है।

अरुणाचल प्रदेश में समुदाय–आधारित कचरा प्रबंधन की सफलता
अरुणाचल प्रदेश के लोअर दिबांग वैली स्थित रोइंग शहर ने बढ़ते कचरा संकट को समुदाय-आधारित सफलता की कहानी में बदल दिया है। वर्ष 2022 में रोइंग नगर परिषद ने स्थानीय स्वयं सहायता समूह ‘ग्रीन रोइंग’ के साथ मिलकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल पर आधारित ठोस कचरा प्रबंधन प्रणाली शुरू की।12 सदस्यीय टीम से शुरू हुई यह पहल प्लास्टिक कचरे वाले डंपिंग स्थलों को चिन्हित कर उन्हें बंद करने से आगे बढ़ी। नुक्कड़ नाटक, जागरूकता अभियान और शैक्षिक गतिविधियों के माध्यम से नागरिकों को कचरा पृथक्करण के लिए प्रेरित किया गया। जल्द ही एक निजी मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी स्थापित की गई, जो प्रति माह लगभग तीन टन कचरे का प्रसंस्करण करती है। पुनर्चक्रण योग्य कचरे की बिक्री से स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को आय प्राप्त हो रही है।रोइंग के बदलाव का प्रतीक है ईज़े पार्क में बना “वेस्ट टू वंडर बटरफ्लाई पार्क”, जिसे 10,000 प्लास्टिक बोतलों सहित पुनर्चक्रित सामग्री से तैयार किया गया है।

जल स्रोतों की रक्षा: त्रिपुरा की पहल
त्रिपुरा के शहरी स्थानीय निकायों ने जलस्रोतों को कचरे से बचाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। सभी नालों पर तार-जाल और मैनुअल सफाई व्यवस्था लगाई गई है, ताकि कचरा जल निकायों में प्रवेश न कर सके। इसके साथ ही वार्ड स्तर पर जनसभाएँ, जागरूकता अभियान और विशेष अभियान चलाए गए, जिनमें नागरिकों को जिम्मेदार कचरा निस्तारण और जल प्रदूषण के दुष्प्रभावों की जानकारी दी गई।नियमित सफाई अभियानों और घर-घर संपर्क कार्यक्रमों से जल निकायों में कचरा फेंकने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है।
परंपरा से परिवर्तन तक: नागालैंड का शून्य–कचरा हॉर्नबिल महोत्सव
नागालैंड का 26वां हॉर्नबिल महोत्सव एक शून्य–कचरा और शून्य–प्लास्टिक राष्ट्रीय मॉडल के रूप में उभरा। सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हुए केले के पत्तों की थालियाँ, बांस की स्ट्रॉ और बैगास कटलरी का उपयोग किया गया, जिससे 10 लाख से अधिक प्लास्टिक वस्तुओं का उपयोग रोका गया और लगभग 50 मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जन कम हुआ।सख्त निगरानी, कचरे के पृथक्करण की व्यवस्था, स्वयंसेवकों की तैनाती और स्थानीय संसाधनों के उपयोग ने यह सिद्ध किया कि सततता कोई समझौता नहीं, बल्कि उत्सव का हिस्सा हो सकती है।

सतत बदलाव की ताकत
पूर्वोत्तर भारत की ये सफलताएँ यह स्पष्ट करती हैं कि टिकाऊ कचरा प्रबंधन केवल ढांचे से नहीं, बल्कि विश्वास, सहभागिता और निरंतरता से बनता है। शहरों ने भूमि और जलस्रोत पुनः प्राप्त किए, समुदायों ने सड़कों और नालियों की जिम्मेदारी संभाली, त्योहार शून्य-कचरा बने और छोटे शहरों ने कचरे को आजीविका व गर्व का स्रोत बनाया।सहयोग और सहभागिता के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत यह संदेश देता है कि स्वच्छता कोई एक बार की उपलब्धि नहीं, बल्कि सामूहिक आदत है—जो मिलकर गढ़ी जाती है और मिलकर निभाई जाती है।
