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सोनम वांगचुक ही क्यों …?

-अरुण श्रीवास्तव-

शायद ही ऐसा कोई हो जो इस नाम से परिचित हो और शायद ही ऐसा कोई जो इनके काम से। गैर राजनीतिक और घर गृहस्थी वाले भी सोनम को जानते होंगे गर उन्होंने उन पर आधारित फिल्म थ्री इडियट फिल्म देखी होगी पर इस शख्स की इतनी ही पहचान नहीं है क्योंकि फिल्में तो बहुतों ने बहुतों पर बनाई गई। हो सकता है कि निकट भविष्य में लेह-लद्दाख फाइल्स शीर्षक फिल्म ही देखने को मिल जाए। सोनम वांगचुक एक जाने-माने भारतीय इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और आविष्कारक हैं। वह स्टूडेंट्स’ एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख नामक एक अनोखे स्कूल की स्थापना के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने ‘आइस स्तूप’ नाम का एक आविष्कार किया, जो सर्दियों में पानी को बर्फ के शंकु के रूप में जमा करने में मदद करता है। यह तकनीक गर्मियों में पानी की कमी की समस्या को हल करने में लेह-लद्दाख जैसे इलाकों में रहने वाले किसानों के लिए बहुत उपयोगी साबित हुई है। वे गांधीवादी सिद्धांतों के लिए भी जाने जाते हैं और पीएम मोदी के प्रशंसक भी रहे। जब मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाया तो उन्होंने और उनके प्रशंसकों ने भी जश्न मनाया था। जबकि इसकी कई उप धाराएं आज भी अस्तित्व में हैं। यही नहीं लेह-लद्दाख को जब केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया तो भी जबकि वहां के निवासियों की ये मांग थी ही नहीं यानी बिना मांगे बिन संघर्ष किए इस क्षेत्र को यह दर्जा दिया गया। लोगों को यह भी मानना है कि ये सब जम्मू-कश्मीर के राजनीतिकों को दलों को सबक सिखाने के लिए किया गया।

देहरादून में सोनम वांगचुक के समर्थन में प्रदर्शन

पता नहीं क्यों सरकारों का पैटर्न कुल ज़मा एक जैसा ही रहता है और खासकर उन आंदोलनकारियों और उनके संगठनों को लेकर तो और भी जब आंदोलनकारी उससे जुड़े संगठनों से न होकर किसी और संगठन से हो वैसे भी सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार से जुड़े संगठन उनके ख़िलाफ़ आंदोलन भी नहीं करते।
एक समय में इंदिरा गांधी को भी हर चीज में विदेशी हाथ दिखाई देता था विपक्ष का हर नेता सीआईए का एजेंट दिखाई देता था। यहां तक कि उन्होंने तो मोरारजी देसाई और जयप्रकाश नारायण पर ही भी कुछ ऐसे ही आरोप लगाए थे जबकि जयप्रकाश नारायण को लोग जवाहरलाल नेहरू का मानस पुत्र मानते थे। कुछ यही हाल मोदी सरकार का भी है। वो और उनके मंत्रियों को हर आंदोलन में विदेशी हाथ दिखाई देता है। गत वर्षों हुए किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन को खालिस्तान समर्थकों का कहा गया तो किसी ने उन्हें मवाली बताया। शाहीन बाग में शिरकत कर रही महिलाओं को भाजपा में आने को उतावली फिल्म अभिनेत्री कंगना ने सौ सौ रुपए लेने की बात कहकर महिलाओं का अपमान किया तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मतदाताओं का आह्वान किया कि वे बटन इतनी ज़ोर से दबाएं कि पता साहीन बाग तक चले।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सोनम वांगचुक पर दो मुख्य आरोप हैं, एक विदेशी फंडिंग का और दूसरा हिंसा भड़काने का।

सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के विरोध में देहरादून में प्रदर्शन। —चित्र -अरुण श्रीवास्तव

हर आंदोलनकारी की ही तरह सोनम ने भी सभी आरोपों से इंकार किया। जबकि पिछले चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में कई वायदे किए थे पर एक भी पूरा नहीं किया। उनकी संस्था स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख का कहना है कि मेरी संस्था पिछले चुनावों में किए गए वायदों को इस चुनावों से पहले पूरा करने की मांग कर रही है। पूर्ण राज्य का दर्जा, लद्दाख को संविधान की छठीं अनुसूची में शामिल करने की मांग न तो अलोकतांत्रिक है और न ही तरीका। सोनम ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए लोकतांत्रिक तरीके अपनाए, धरना प्रदर्शन उपवास किया और लद्दाख से दिल्ली तक की पदयात्रा की। उन्हें दिल्ली पहुंचने से पहले गिरफ्तार कर लिया गया था। जहां तक विदेशी फंडिंग की बात है तो सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार सोनम की संस्था 2010 में पंजीकृत हुई थी। विदेशों से मिलने वाला धन यूं ही नहीं मिल जाता। बैंक की निश्चित शाखा में खाता खोला जाता है। लेन देन की निगरानी बैंक करता है। संस्था को बैंक खाते की नियमित जांच कराकर सम्मिलित करनी होती है। लगभग 15 साल बाद सरकार याद आया कि है तो इसकी जानकारी आज क्यों हुई? यदि जानकारी पहले से थी तो आज क्यों बताया?
रही हिंसा फैलाने की बात तो हिंसा फैलाने के तरीके तो सरकार के नियंत्रण में रहते हैं जैसे क्या सार्वजनिक रूप से हिंसक शब्दों का प्रयोग किया गया था? सोशल मीडिया के जरिए हिंसा फैलायी गई? हर चीज़ की परिभाषाएं पहले से तय है। सरकार इसे सार्वजनिक करें। सोनम ने तो हिंसक घटनाओं के बाद अपना आंदोलन वापस ले लिया था। जिस प्रकार के आरोप वांगचुक पर लगाये गए उस तरह के आरोप तो अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने वालों और उससे जुड़ी अनेक संस्थाओं पर लगातार लगते रहे हैं। विदेशी धन मिलने के आरोप भी है। यदि आरोप सही हैं तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और सज़ा भी दी जाए। हिंसक भाषण तो विवादित ढांचा तोड़ने से लेकर राम मंदिर निर्माण तक में लगाये गए और विदेशी धन मिलने के भी। रही इंटरनेट के दौर के जेनरेशन की बात तो वो पीढ़ी भी तो भारत की नागरिक है और ज्यादातर मतदाता भी। हर पीढ़ी को सवालों के जवाब चाहिए। (ये लेखक के निजी विचार हैं  जिनसे एडमिन का सहमत होना जरूरी नहीं) 

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