21वीं सदी का भविष्य आध्यात्मिकता से जुड़ा: ज्योतिर्मठ में ‘युवा और आध्यात्मिकता’ पर गहन मंथन
ज्योतिर्मठ, 8 जनवरी। 21वीं सदी के संकटों और संभावनाओं के बीच आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता पर जोर देते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि यदि यह सदी आध्यात्मिक नहीं बनी, तो मानवता के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। फ्रांसीसी लेखक आंद्रे मलरॉक्स के कथन— “21वीं सदी या तो आध्यात्मिक होगी, अथवा होगी ही नहीं”—को केंद्र में रखते हुए ज्योतिर्मठ में आयोजित एक कार्यशाला में युवाओं और बुद्धिजीवियों ने गहन विमर्श किया।
जनवरी 2026 के प्रथम सप्ताह में श्रीअरविंद अध्ययन केंद्र, ज्योतिर्मठ की ओर से “युवा और आध्यात्मिकता” विषय पर यह कार्यशाला नगर के प्रतिष्ठित चिकित्सक एवं समाजसेवी डॉ. मोहन सिंह रावत के “रमणीक होम स्टे” (श्री हनुमान शिला, बड़ागांव के निकट) में आयोजित की गई। कार्यशाला का उद्देश्य आधुनिक विकास मॉडल, राजनीतिक टकराव, सामाजिक असमानता और पर्यावरण संकट के बीच आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि की प्रासंगिकता को समझना रहा।
कार्यशाला का संचालन श्रीअरविंद सोसायटी, पुदुचेरी की कोर कमेटी सदस्य श्रीमती कीर्ति अधिकारी ने किया। उन्होंने श्रीअरविंद और श्रीमाँ के जीवन-दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि आध्यात्मिकता केवल ध्यान या साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दैनिक और कार्यजीवन को अधिक संतुलित, सुंदर और आनंदमय बनाने का मार्ग दिखाती है। उन्होंने सरल उदाहरणों और बोध कथाओं के माध्यम से युवाओं को आत्ममंथन की ओर प्रेरित किया।
कार्यक्रम में इंग्लैंड के फॉक्स्टोन की आर्टिस्ट एवं क्यूरेटर डायना डेवर ने चित्रकारी के माध्यम से मनुष्य और प्रकृति के संबंध को रेखांकित किया। नीदरलैंड्स में कार्यरत युवा उद्यमी और वैज्ञानिक डॉ. अभय अधिकारी ने कहा कि आध्यात्मिकता की पहली पाठशाला प्रकृति है, लेकिन आज सबसे अधिक संकट उसी के अस्तित्व पर मंडरा रहा है। वहीं जर्मनी के बॉन शहर की निवासी और जर्मन फेडरल फंड्स में पीएसके की निदेशक मैकटेल ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था में परिवर्तन की धुरी आज भी मनुष्य ही है और उसे विकास का ऐसा मॉडल अपनाना होगा जो पर्यावरण और स्वयं के विनाश का कारण न बने।
“मेरा भविष्य, मेरा प्रयास” थीम पर आधारित इस कार्यशाला में श्रीअरविंद अध्ययन केंद्र, ज्योतिर्मठ के अध्यक्ष अरविंद प्रकाश पंत, डॉ. मोहन सिंह रावत, कोषाध्यक्ष प्रकाश पंवार, संयुक्त सचिव एवं कवयित्री विनीता भट्ट, सचिव ओमप्रकाश डोभाल सहित शिक्षा, चिकित्सा, योग, साहित्य और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े 35 प्रतिभागियों ने सहभागिता की।
कार्यशाला में यह साझा निष्कर्ष उभरकर सामने आया कि उपभोक्तावादी संस्कृति, आत्मकेंद्रित जीवनशैली और प्रकृति से बढ़ती दूरी के इस दौर में आध्यात्मिकता ही मानवता और पर्यावरण—दोनों के भविष्य की सबसे बड़ी आशा है।
