विश्व रेडियो दिवस : रेडियो को एक सार्वजनिक सेवा माध्यम के रूप में सम्मानित करना
मुख्य बिंदु
- विश्व रेडियो दिवस प्रतिवर्ष 13 फरवरी को मनाया जाता है। यह दिन वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना की स्मृति में समर्पित है।
- विश्व रेडियो दिवस 2026 का विषय है — “रेडियो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक उपकरण है, आवाज नहीं।”
- भारत में पहले सामुदायिक रेडियो स्टेशन का उद्घाटन 1 फरवरी 2004 को भारत रत्न श्री लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा किया गया था।
- उत्तर प्रदेश के अमरोहा निवासी राम सिंह बौद्ध, जिन्हें “भारत का रेडियो मैन” कहा जाता है, को वर्ष 2025 में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा 1,257 रेडियो के विश्व के सबसे बड़े संग्रह के लिए मान्यता प्रदान की गई।
- A PIB FEATURE-
रेडियो का अपना एक अनोखा आकर्षण रहा है। यह अंतरंग होते हुए भी व्यापक और सरल होते हुए भी अत्यंत शक्तिशाली हैं। यह बिना किसी आडंबर के हमारे दैनिक जीवन में सहज रूप से घुलमिल जाता है। यह बहुत कम अपेक्षा करता है, बस थोड़ा-सा साथ और बदले में जानकारी, संवेदना तथा अपनत्व का एहसास देता है।
स्क्रीन युग के आगमन से बहुत पहले रेडियो ही वह भरोसेमंद आवाज थी, जो दूर-दराज के इलाकों, विविध भाषाओं और अनगिनत जिंदगियों को एक अदृश्य धागे में पिरोता था। सामूहिक श्रवण के माध्यम से यह लोगों को न केवल जोड़ता था, बल्कि उन्हें एक साझा अनुभव का हिस्सा भी बनाता था। इतिहास के अनेक निर्णायक क्षण रेडियो की घोषणाओं के माध्यम से हमारी सामूहिक स्मृति में अंकित हैं। भला कोई 14–15 अगस्त 1947 की उस ऐतिहासिक रात को कैसे भूल सकता है, जब रेडियो तरंगों पर भारत की स्वतंत्रता की घोषणा गूंज उठी थी। उस एक प्रसारण ने केवल समाचार नहीं सुनाया, बल्कि उसने एक विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र को स्वतंत्रता की एक साझा ध्वनि में एकजुट कर दिया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
विश्व रेडियो दिवस (डब्ल्यूआरडी) की घोषणा संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने वर्ष 2011 में अपने 36वें आम सम्मेलन के दौरान की थी। इसके पश्चात् संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2012 में अपने 67वें सत्र में इसे औपचारिक रूप से अंगीकार किया, जिससे यह एक आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता प्राप्त हुआ। यह दिवस प्रतिवर्ष 13 फरवरी को मनाया जाता है, जो वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना की स्मृति का प्रतीक है। द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद आरंभ हुए इस रेडियो प्रसारण ने वैश्विक संचार, संवाद और सूचना साझाकरण के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रारंभिक प्रतिबद्धता को दर्शाया।

विश्व रेडियो दिवस 2026 की थीम
विश्व रेडियो दिवस 2026 की विषय-वस्तु “रेडियो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक उपकरण है, आवाज नहीं” है, जो प्रसारण जगत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है।
यह इस बात को उजागर करता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किस प्रकार सामग्री सृजन, अभिलेखीकरण, अनुवाद, श्रोता सहभागिता और सुलभता को सशक्त बना सकता है, जिससे रेडियो अधिक प्रभावी, कुशल व समावेशी बन सके। साथ ही, यह विषय स्पष्ट करता है कि प्रौद्योगिकी को एक सहायक साधन के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि रेडियो की पहचान बन चुकी मानवीय आवाज, संपादकीय विवेक और विश्वसनीयता का विकल्प मानना चाहिए। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नैतिक और उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करते हुए यह विषय पुनः स्थापित करता है कि नवाचार का उद्देश्य डिजिटल युग में रेडियो के मूल मूल्यों यानी कि विश्वास, प्रामाणिकता एवं सामुदायिक जुड़ाव को और अधिक सुदृढ़ करना होना चाहिए।
रायपुर में 2026 में विश्व रेडियो दिवस सम्मेलन का आयोजन होगा।
विश्व रेडियो दिवस 2026 के उपलक्ष्य में छत्तीसगढ़ में रायपुर का ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) केंद्र, यूनेस्को के सहयोग से 13 फरवरी, 2026 को सुबह 10:00 बजे से होटल बैबिलॉन कैपिटल, रायपुर में विश्व रेडियो दिवस सम्मेलन का आयोजन कर रहा है। इस सम्मेलन का मुख्य विषय “रेडियो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” है और इसमें इस बात पर विचार-विमर्श किया जाएगा कि रेडियो प्रसारण के मूल में मानवीय आवाज को संरक्षित रखते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किस प्रकार सामग्री निर्माण, श्रोता सहभागिता और पहुंच को मजबूत कर सकता है।

ऑल इंडिया रेडियो: भारत का लोक सेवा प्रसारक
ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर), जिसे लोकप्रिय रूप से आकाशवाणी के नाम से जाना जाता है, भारत के राष्ट्रीय प्रसारक प्रसार भारती का रेडियो विभाग है और स्थापना से ही “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” (जनता के कल्याण एवं सुख के लिए) के आदर्श वाक्य के साथ राष्ट्र की सेवा कर रहा है। 1936 में स्थापित और स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक स्वामित्व में लाया गया एआईआर, प्रसारित भाषाओं की संख्या तथा श्रोताओं की विविधता के मामले में विश्व के सबसे बड़े प्रसारण संगठनों में से एक बन गया है।
आकाशवाणी (एआईआर) की होम सर्विस देशभर में फैले 591 प्रसारण केंद्रों के माध्यम से संचालित होती है, जो भारत के लगभग 92% भौगोलिक क्षेत्र और 99.19% जनसंख्या को आच्छादित करती है। स्थलीय प्रसारण के जरिए यह 23 भाषाओं और 182 बोलियों में कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, जो भारत की व्यापक सामाजिक-आर्थिक व सांस्कृतिक विविधता का सजीव प्रतिबिंब है। मीडियम वेव (एमडब्ल्यू), शॉर्ट वेव (एसडब्ल्यू), एफएम तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से आकाशवाणी महानगरों के साथ-साथ दूरदराज, ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों तक प्रभावी रूप से पहुंच बनाती है।
इसके कार्यक्रमों में समाचार, समसामयिक विषय, कृषि परामर्श, शैक्षिक सामग्री, स्वास्थ्य जागरूकता, युवा कार्यक्रम, शास्त्रीय एवं लोक संगीत तथा विविध सांस्कृतिक प्रस्तुतियां शामिल हैं। आपात स्थितियों व प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी आकाशवाणी ने समयबद्ध चेतावनियां और प्रमाणित जानकारी उपलब्ध कराकर अपनी विश्वसनीयता तथा जनसेवा की प्रतिबद्धता को निरंतर सिद्ध किया है।
- मीडिया परिदृश्य में हो रहे बदलावों के साथ, ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) समावेशिता, विश्वसनीयता और राष्ट्रीय एकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखते हुए निरंतर रूपांतरित व विस्तारित हो रहा है, जो विश्व रेडियो दिवस की चिरस्थायी भावना को दर्शाता है। कोविड-19 महामारी के दौरान यह स्पष्ट रूप से देखा गया, जब ग्रामीण बिहार, झारखंड तथा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में स्कूल बंद थे और डिजिटल पहुंच सीमित थी, तब विधयर्थियों ने अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) के शैक्षिक प्रसारणों पर भरोसा किया। जिन क्षेत्रों में स्मार्टफोन और स्थिर इंटरनेट की कमी थी, वहां रेडियो ने चुपचाप शिक्षा की निरंतरता सुनिश्चित की। इसी तरह, ओडिशा और तमिलनाडु के आपदा-ग्रस्त तटीय क्षेत्रों में, मछुआरे समुद्र में जाने से पहले नियमित रूप से एआईआर के मौसम बुलेटिन पर निर्भर रहते हैं। फानी (2019) जैसे भीषण चक्रवातों के दौरान, समय पर रेडियो अलर्ट ने कई लोगों को सुरक्षित रूप से तट पर लौटने में सक्षम बनाया, जिससे मोबाइल नेटवर्क के विफल होने पर एक विश्वसनीय आपातकालीन संचार उपकरण के रूप में रेडियो की भूमिका की पुष्टि हुई।
| निजी एफएम रेडियो – पहुँच का विस्तार और स्थानीय सामग्री का सशक्तिकरण |
| निजी एफएम रेडियो शहरी और क्षेत्रीय भारत में स्थानीय मनोरंजन और सूचना प्रदान करते हुए सार्वजनिक प्रसारण का पूरक है। अगस्त 2024 में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 234 पहले से अछूते शहरों और कस्बों में 730 नए एफएम चैनलों के विस्तार को ₹784.87 करोड़ के आरक्षित मूल्य के साथ स्वीकृति दी, जो क्षेत्रीय सामग्री के विस्तार और नए रोजगार अवसरों के सृजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह विस्तार निजी एफएम रेडियो की भूमिका को और सुदृढ़ करता है, जो शहरी और क्षेत्रीय भारत में स्थानीय मनोरंजन, समाचार और जानकारी उपलब्ध कराते हुए सार्वजनिक प्रसारण को मजबूती देता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अनुसार, एफएम फेज-III नीति के अंतर्गत वर्तमान में 119 शहरों में 391 निजी एफएम चैनल संचालित हो रहे हैं। |
भारत में सामुदायिक रेडियो: स्थानीय आवाजों के लिए जीवन रेखा
सामुदायिक रेडियो स्टेशन (सीआरएस) कम शक्ति वाले, गैर-व्यावसायिक स्टेशन हैं और इन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा उनकी विशिष्ट संचार आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्थापित एवं संचालित किया जाता है। सामुदायिक रेडियो (सीआरएस) भारत में रेडियो प्रसारण का तीसरा स्तर है, जो सार्वजनिक सेवा और वाणिज्यिक रेडियो से अलग है। भारत में सामुदायिक रेडियो की यात्रा वर्ष 2002 में शुरू हुई, जब भारत सरकार ने आईआईटी/आईआईएम सहित सुस्थापित शैक्षणिक संस्थानों को सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थापित करने के लिए लाइसेंस प्रदान करने की नीति को मंजूरी दी। पहले सामुदायिक रेडियो स्टेशन का उद्घाटन 1 फरवरी, 2004 को भारत रत्न श्री लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा किया गया था। 2005 में अन्ना विश्वविद्यालय द्वारा अन्ना सामुदायिक रेडियो (90.4 मेगाहर्ट्ज) के शुभारंभ के साथ एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई। सामुदायिक रेडियो स्थानीय आवाजों के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है, जो स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, कृषि और सामाजिक विकास जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है। स्थानीय भाषाओं व बोलियों में प्रसारण करके, यह व्यापक पहुंच और तत्काल सामुदायिक जुड़ाव सुनिश्चित करता है। भारत जैसे सांस्कृतिक और भाषाई रूप से विविध देश में, स्थानीय कलाकारों को अवसर प्रदान करने के साथ-साथ लोक परंपराओं, स्थानीय संगीत तथा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में भी सीआरएस महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में, इस क्षेत्र में लगातार वृद्धि हुई है, और भारत में वर्तमान में 528 सामुदायिक रेडियो स्टेशन हैं, जो जमीनी स्तर पर संचार एवं सामुदायिक सशक्तिकरण के एक प्रभावी साधन के रूप में सामुदायिक रेडियो की भूमिका को रेखांकित करते हैं।
| भारतीय सेना की सामुदायिक रेडियो पहल |
| • सुदूर और सीमावर्ती क्षेत्रों में रेडियो के रणनीतिक महत्व को दर्शाते हुए भारतीय सेना ने उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ में (जून 2025 में) स्थानीय आवाजों को बुलंद करने और शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आपदा तैयारियों से संबंधित जानकारी प्रसारित करने के लिए “इबेक्स ताराना 88.4 एफएम” का शुभारंभ किया।
• जनवरी 2026 में, सेना ने नागरिक अधिकारियों और स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर के राजौरी में “रेडियो संगम 88.8 एफएम” का शुभारंभ किया। यह नियंत्रण रेखा के साथ स्थित पहला सामुदायिक रेडियो स्टेशन है, जिसका उद्देश्य सत्यापित जानकारी को बढ़ावा देना और सीमा पार दुष्प्रचार का मुकाबला करना है। |
जमीनी आवाजें — रोजमर्रा के भारत में रेडियो
आपात स्थितियों में भी रेडियो की अहम भूमिका होती है। जब प्राकृतिक आपदाओं या संकटों के कारण बिजली, इंटरनेट सेवाएं या अन्य संचार नेटवर्क बाधित हो जाते हैं, तो रेडियो अक्सर विश्वसनीय और समय पर जानकारी का सबसे भरोसेमंद स्रोत बना रहता है। आज भी, यह जन सुरक्षा और जागरूकता के लिए जीवन रेखा बना हुआ है। रेडियो की ताकत न केवल इसकी व्यापक पहुंच में है, बल्कि इसकी प्रासंगिकता में भी है।
निम्नलिखित उदाहरण दर्शाते हैं कि भारत के सामाजिक, विकासात्मक और आपातकालीन संचार ढांचे में रेडियो किस प्रकार गहराई से समाहित है।
- सामुदायिक भागीदारी रेडियो के जमीनी स्तर पर प्रभाव को और मजबूत करती है। बुंदेलखंड में, महिलाओं के नेतृत्व वाली सामुदायिक रेडियो पहलों ने लड़कियों की शिक्षा, कृषि और कल्याणकारी योजनाओं पर चर्चा के लिए मंच प्रदान किए हैं, जिससे पहली बार प्रसारण करने वालों को स्थानीय बदलाव लाने वालों के रूप में सशक्त बनाया गया है। कच्छ में, सामुदायिक रेडियो बोलियों और मौखिक परंपराओं को संरक्षित करता है, जिससे सांस्कृतिक विरासत की रक्षा होती है।
- गुजरात के कच्छ में, सामुदायिक रेडियो स्टेशन कच्छी बोली में लोकगीत, मौखिक इतिहास और कहानी सुनाने के सत्र प्रसारित करते हैं। जैसे-जैसे स्थानीय बोलियां लुप्त होती जा रही हैं, रेडियो एक सांस्कृतिक संग्रह तथा घर से दूर रहने वाले प्रवासियों के लिए एक भावनात्मक सेतु का काम करता है।
- दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैदियों द्वारा संचालित रेडियो पहल कानूनी जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य, संगीत और कविता पर कार्यक्रम प्रस्तुत करती हैं, जिससे रचनात्मक सहभागिता के माध्यम से अभिव्यक्ति, आत्मविश्वास तथा पुनर्वास को बढ़ावा मिलता है।
- उत्तराखंड की पहाड़ियों में, जहां पर इंटरनेट कनेक्टिविटी अक्सर अविश्वसनीय होती है, सामुदायिक रेडियो भूस्खलन की चेतावनी, कृषि संबंधी सलाह, रोजगार की जानकारी और लोक संगीत प्रसारित करता है, जिससे दूरस्थ तथा बुजुर्ग आबादी के लिए यह सुलभ एवं भरोसेमंद बना रहता है।
- दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में, एफएम रेडियो दैनिक शहरी जीवन का अभिन्न अंग बना हुआ है, जहाँ टैक्सी तथा ऑटो चालक यातायात अपडेट, क्रिकेट कमेंट्री, संगीत व इंटरैक्टिव शो सुनने के लिए रेडियो सुनते हैं – यह इस बात को रेखांकित करता है कि अत्यधिक डिजिटलीकृत शहर में भी रेडियो कितना प्रासंगिक है।
मन की बात — डिजिटल युग में रेडियो की शक्ति को सुदृढ़ करना
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भारतीय रेडियो संग्राहक के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड
राम सिंह बौद्ध: भारत के रेडियो मैन
उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गजराउला निवासी राम सिंह बौद्ध, जिन्हें अक्सर “भारत का रेडियो मैन” कहा जाता है, ने अपने निजी शौक को राष्ट्रीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण योगदान में बदल दिया है। 2025 में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा मान्यता प्राप्त बौद्ध के नाम दुनिया में रेडियो का सबसे बड़ा संग्रह है, जिसमें दशकों के तकनीकी विकास को समेटे हुए 1,257 अलग-अलग रेडियो सेट शामिल हैं। उनका संग्रह रेडियो की कहानी बयां करता है, जिसमें बीसवीं सदी के शुरुआती दौर के भारी-भरकम लकड़ी के रिसीवर से लेकर कॉम्पैक्ट ट्रांजिस्टर सेट तक शामिल हैं, जिन्होंने लाखों भारतीय घरों में समाचार और मनोरंजन पहुंचाया।
| Ram Singh Bouddh, the Radio Man of India |

बौद्ध की यात्रा इतिहास और सार्वजनिक संचार के प्रति उनके गहरे लगाव से प्रेरित है। रेडियो की निरंतर प्रासंगिकता, विशेष रूप से ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रमों से प्रेरित होकर, उन्होंने पूरे भारत से रेडियो इकट्ठा करना शुरू किया। जो शौक के रूप में शुरू हुआ, वह धीरे-धीरे एक लुप्त होती विरासत को संरक्षित करने का मिशन बन गया। आर्थिक तंगी और सामाजिक संशय के बावजूद, उन्होंने असाधारण दृढ़ता के साथ अपना प्रयास जारी रखा।
आज उनका संग्रह सिद्धार्थ इंटर कॉलेज में स्थित एक संग्रहालय में रखा गया है, जिसका प्रबंधन उनका परिवार करता है। यह स्थान एक जीवंत संग्रह के रूप में कार्य करता है, जिससे विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आगंतुकों को जनमत और राष्ट्रीय चेतना को आकार देने में रेडियो की भूमिका को समझने में मदद मिलती है। बौद्ध की उपलब्धि रेडियो की शाश्वत प्रासंगिकता और भारत की संचार विरासत को संरक्षित करने वाले व्यक्तिगत प्रयासों के प्रति एक श्रद्धांजलि है।
71 वर्ष की आयु में भी, सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी राम सिंह बौद्ध अपने जुनून के सफर पर आश्चर्यचकित होते हैं। राम सिंह बौद्ध की कहानी सिर्फ रेडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इतिहास के प्रति प्रेम और एक व्यक्ति की पूरे राष्ट्र की आवाज़ को संरक्षित करने की क्षमता का प्रमाण है।
निष्कर्ष
विश्व रेडियो दिवस एक विश्वसनीय, सुलभ और समावेशी माध्यम के रूप में रेडियो की निरंतर प्रासंगिकता को उजागर करता है। तीव्र डिजिटलीकरण के बावजूद, रेडियो विविध और वंचित आबादी तक पहुंचने, साक्षरता, भाषा तथा कनेक्टिविटी की बाधाओं को दूर करने और सार्वजनिक सूचना, शिक्षा व आपदा संचार में सहयोग प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत में, सार्वजनिक सेवा एवं सामुदायिक रेडियो स्थानीय आवाजों को बुलंद करके और विकास एवं सामाजिक एकता में योगदान देकर सहभागी संचार को सशक्त बनाते हैं। यूनेस्को द्वारा बल दिया गया है कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति, विश्वसनीय सूचना और समावेशी संवाद के मंच के रूप में रेडियो को संरक्षित रखने तथा तेजी से बदलते मीडिया परिदृश्य में इसकी स्थायी भूमिका सुनिश्चित करने के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन और नवाचार आवश्यक हैं।
