भारत में युवाओं को तेजी से घेर रहा है स्ट्रोक का खतरा
राष्ट्रीय स्ट्रोक रजिस्ट्री के आंकड़े बताते हैं इलाज में देरी और कमजोर स्वास्थ्य तंत्र की कहानी
-ज्योति रावत-
भारत में स्ट्रोक अब केवल बुज़ुर्गों की बीमारी नहीं रह गई है। राष्ट्रीय स्ट्रोक रजिस्ट्री के ताज़ा विश्लेषण से पता चलता है कि देश में स्ट्रोक के हर सात मरीजों में से एक की उम्र 45 वर्ष से कम है। यह निष्कर्ष न केवल चिंताजनक है, बल्कि भारत की बदलती जीवनशैली, कमजोर रोकथाम और समय पर इलाज की कमी की ओर भी साफ़ इशारा करता है।
यह अध्ययन वर्ष 2020 से 2022 के बीच देश के 30 प्रमुख अस्पतालों में दर्ज 34,792 स्ट्रोक मामलों पर आधारित है। इसे इंटरनेशनल जर्नल ऑफ स्ट्रोक में प्रकाशित किया गया है और इसका नेतृत्व आईसीएमआर के नेशनल सेंटर फॉर डिजीज इन्फॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च, बेंगलुरु ने किया है।
देर से अस्पताल पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती
अध्ययन का सबसे गंभीर पक्ष यह है कि बड़ी संख्या में मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं। स्ट्रोक के इलाज में शुरुआती कुछ घंटे बेहद अहम होते हैं, लेकिन भारत में केवल पांच में से एक मरीज ही लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे के भीतर अस्पताल पहुंच पाता है। इसके विपरीत लगभग 38 प्रतिशत मरीज 24 घंटे बाद इलाज के लिए पहुंचते हैं।
इलाज में यह देरी मरीजों के जीवन और भविष्य दोनों पर भारी पड़ती है। अध्ययन के अनुसार तीन महीने के भीतर आधे से अधिक मरीजों की या तो मौत हो जाती है या वे स्थायी विकलांगता का शिकार हो जाते हैं।
तीन महीने बाद भयावह तस्वीर
अस्पताल में भर्ती के दौरान मृत्यु दर लगभग 14 प्रतिशत दर्ज की गई, लेकिन तीन महीने के भीतर यह आंकड़ा बढ़कर करीब 28 प्रतिशत तक पहुंच गया। इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में मरीज अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी नहीं बच पाए।
कुल मिलाकर लगभग 30 प्रतिशत मरीज गंभीर विकलांगता के साथ जीवन जीने को मजबूर हो गए। महिलाओं में यह खतरा पुरुषों की तुलना में अधिक पाया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि पुनर्वास और अस्पताल के बाद की देखभाल में खामियां मौजूद हैं।
उच्च रक्तचाप बना सबसे बड़ा खतरा
अध्ययन में स्ट्रोक के पीछे सबसे बड़ा कारण उच्च रक्तचाप को बताया गया है। लगभग तीन-चौथाई मरीज इस समस्या से ग्रस्त पाए गए। इसके अलावा धुआं रहित तंबाकू, मधुमेह, धूम्रपान और शराब सेवन भी प्रमुख जोखिम कारकों के रूप में सामने आए।
शोध में यह भी पाया गया कि महिलाओं में उच्च रक्तचाप और मधुमेह की दर अधिक थी, जबकि पुरुषों में तंबाकू और शराब का सेवन ज्यादा देखा गया। यह अंतर भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों के लिए अहम संकेत देता है।
इलाज की आधुनिक सुविधाएं अब भी पहुंच से दूर
स्ट्रोक के सबसे सामान्य प्रकार इस्केमिक स्ट्रोक के इलाज के लिए समय पर दवा या सर्जिकल प्रक्रिया बेहद जरूरी होती है, लेकिन भारत में इसकी पहुंच बेहद सीमित है। अध्ययन के अनुसार केवल 4.6 प्रतिशत मरीजों को ही थ्रोम्बोलाइसिस जैसी जीवनरक्षक दवा मिल सकी, जबकि मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टॉमी जैसी उन्नत प्रक्रिया मात्र 0.7 प्रतिशत मामलों में ही हो पाई।
इसके पीछे मुख्य कारण देर से अस्पताल पहुंचना, जांच में विलंब और कई अस्पतालों में दवाओं व सुविधाओं की कमी है।
ग्रामीण भारत में स्थिति और गंभीर
डेटा यह भी बताता है कि 72 प्रतिशत से अधिक मरीज ग्रामीण इलाकों से आए थे। यह इस बात का प्रमाण है कि गांवों में स्ट्रोक के लक्षणों की पहचान, एम्बुलेंस सेवाएं और विशेषज्ञ इलाज तक पहुंच अब भी बेहद कमजोर है। यही वजह है कि स्ट्रोक जैसे आपात रोग में ग्रामीण मरीज सबसे ज्यादा नुकसान उठाते हैं।
विशेषज्ञों की चेतावनी
एम्स दिल्ली की न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख मंजरी त्रिपाठी के अनुसार, स्ट्रोक के मामले में हर मिनट बेहद कीमती होता है। समय पर अस्पताल पहुंचने, तुरंत ब्रेन इमेजिंग और योग्य मरीजों को बिना देरी दवा देने से जान और दिमाग दोनों को बचाया जा सकता है। उनका कहना है कि लोगों में स्ट्रोक के लक्षण पहचानने की जागरूकता बढ़ाना अब टालने योग्य विषय नहीं रह गया है।
रोकथाम और व्यवस्था सुधार ही समाधान
अध्ययन के लेखक मानते हैं कि यदि उच्च रक्तचाप और मधुमेह पर प्रभावी नियंत्रण, तंबाकू सेवन में कमी, तेज़ रेफरल सिस्टम और ग्रामीण इलाकों में स्ट्रोक के लिए विशेष सुविधाएं नहीं बढ़ाई गईं, तो आने वाले वर्षों में स्ट्रोक युवाओं को और तेजी से अपनी चपेट में लेता जाएगा।
राष्ट्रीय स्ट्रोक रजिस्ट्री से जुड़े प्रमुख आंकड़े

