आपदा/दुर्घटना

धराली आपदा पर बोले विशेषज्ञ, यह अप्रत्याशित नहीं थी, दिलाई इतिहास की यादें

देहरादून, 22 अगस्त। दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर (DLRC) एवं SPECS के संयुक्त तत्वावधान में आज “धाराली फ्लैश फ्लड – टाइमलाइन में एक और आपदा” विषय पर एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। यह व्याख्यान दि देहरादून डायलॉग (TDD) सीरीज़ के अंतर्गत हुआ, जिसका उद्देश्य विज्ञान, समाज, नीतियों और विकास से जुड़े अहम मुद्दों पर संवाद स्थापित कर उनके निष्कर्ष नीति-निर्माताओं तक पहुँचाना है।

कार्यक्रम का शुभारंभ DLRC के श्री चन्द्रशेखर तिवारी ने स्वागत भाषण से किया। उन्होंने डॉ. दिनेश सती को सामयिक और महत्त्वपूर्ण विषय पर प्रस्तुति देने के लिए धन्यवाद दिया। तत्पश्चात् श्री हरि राज सिंह ने डॉ. सती का परिचय कराया।

डॉ. सती, जिन्हें फील्ड जियोलॉजी में 43 वर्षों का अनुभव है, ने अपने व्याख्यान में कहा कि धाराली फ्लैश फ्लड दुखद अवश्य है, किंतु यह अप्रत्याशित नहीं थी। उन्होंने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में लगभग हर वर्ष मानसून के दौरान इस प्रकार की आपदाएँ घटित होती हैं।

उन्होंने उपग्रह आंकड़ों और वर्षा आधारित आँकड़ों से हैज़र्ड मॉडलिंग की प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला और धाराली क्षेत्र की पिछली आपदाओं का टाइमलाइन प्रस्तुत किया, जिसमें 1835, 1978, 2010, 2012, 2013, 2015 तथा 2018 की घटनाओं का उल्लेख किया गया। डॉ. सती ने कहा कि खीर गंगा बेसिन की भौगोलिक संरचना और अस्थिर सामग्रियाँ (morains, colluvium आदि) इस तरह की घटनाओं को जन्म देती हैं, जिनकी पहचान प्राथमिक स्तर पर उपग्रह आंकड़ों से ही की जा सकती है।

उन्होंने चिंता व्यक्त की कि असुरक्षित क्षेत्रों में हो रहा अनियंत्रित भवन निर्माण और होटल व्यवसाय आपदा जोखिम को बढ़ा रहे हैं। आपदा प्रबंधन की संस्थाएँ USDMA एवं USAC अग्रिम चेतावनी देने के बजाय अक्सर केवल आपदा के बाद ही सक्रिय दिखाई देती हैं। डॉ. सती ने ज़ोर देकर कहा कि राहत और पुनर्वास के साथ-साथ रोकथाम एवं पूर्व-योजना पर कार्य करना अब अत्यंत आवश्यक है।

आगे का मार्ग (Way Forward)

धाराली जैसी आपदाएँ अप्रत्याशित नहीं, इनकी पूर्व पहचान और तैयारी संभव।

सीमित संसाधनों एवं जनसंख्या दबाव के चलते लोग संवेदनशील क्षेत्रों में बस रहे हैं।

ग्लोबल क्लाइमेट चेंज से जोखिम और बढ़ गए हैं।

हिमालयी बेसिन की अस्थिर भूमि-आकृतियों को उपग्रह आंकड़ों से चिन्हित किया जा सकता है।

वर्षा आँकड़ों पर आधारित मॉडलिंग से विकास कार्यों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

कार्यक्रम में डॉ. वाई. पी. सिंह और डॉ. बृज मोहन शर्मा ने डॉ. सती का सम्मान किया और उनके वैज्ञानिक विश्लेषण की सराहना की। व्याख्यान में सनराइज अकादमी, उत्तरांचल विश्वविद्यालय, डीबीएस कॉलेज के विद्यार्थियों सहित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, संयुक्त नागरिक संगठन, सिविल डिफेंस आदि संस्थानों के शोधार्थियों ने भाग लिया। कुल 123 प्रतिभागियों ने इस संवादात्मक सत्र में सहभागिता की।

इस अवसर पर बलेंदु जोशी, विभा पुरी दास, आर. के. मुखर्जी, जयराज, सुशील त्यागी, रानू बिष्ट, राजीव ओबेरॉय, डॉ. डी. पी. डोभाल, डॉ. दीपक भट्ट, कुसुम रावत, अतुल शर्मा, देवेंद्र बुडाकोटी, कर्नल अमित अग्रवाल, डॉ. अनिल जागी, भूमेंश भारती, नीरज उनियाल एवं चन्द्र स्वामी सहित अनेक नागरिक समाज के सदस्य उपस्थित रहे।

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