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हमारी सैन्य अवधारणा में आत्मनिर्भरता का अभाव

भारत की सशस्त्र सेनाएँ ऐसे संघर्षों में लगातार संलग्न रहती हैं, जिनकी प्रकृति हमारे भौगोलिक हालात और प्रतिद्वंद्वियों से विशिष्ट रूप से प्रभावित है। लेकिन हमारी सैन्य अवधारणाएँ, सिद्धांत और शब्दावली में आज भी आत्मनिर्भरता का अभाव दिखाई देता है।

 

विनय शंकर
(पूर्व महानिदेशक, तोपखाना)

इस वर्ष अप्रैल में हुए पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद चले ऑपरेशन सिन्डूर के दौरान टीवी चैनलों और डिजिटल मीडिया पर चर्चा में लगातार ‘काइनेटिक’ शब्द सुनाई दिया। उपसेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल राहुल सिंह ने भी टीवी कार्यक्रम में यही शब्द इस्तेमाल किया। विशेषज्ञ अब ‘वेक्टर/एस’ और ‘काइनेटिक’ को जोड़कर किसी भी सैन्य कार्रवाई का वर्णन करने लगे हैं।

युद्ध और सैन्य शब्दावली लंबे समय तक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थिर रही। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में ही सोवियत संघ और अमेरिका में बदलाव का अहसास हुआ। सोवियत मार्शल निकोलाई ओगर्खोव ने ‘सैन्य-तकनीकी क्रांति’ (Military Technological Revolution) का विचार रखा। अमेरिका ने इसे आगे बढ़ाया और ‘सैन्य मामलों की क्रांति’ (Revolution in Military Affairs – RMA) सामने आई।

तकनीकी बदलाव के संकेत

इस परिवर्तन के मुख्य आधार थे:

उपग्रह तकनीक (अमेरिका का जीपीएस और सोवियत संघ का ग्लोनास),

माइक्रोचिप्स,

कंप्यूटर और

सॉफ़्टवेयर।

युद्ध की योजना में ‘सेंसर और शूटर’ की अवधारणा उभरी। जॉन बॉयड के OODA लूप (देखो, समझो, निर्णय लो और कार्रवाई करो) सिद्धांत ने खाड़ी युद्ध (1990 के दशक) में नई प्रासंगिकता पाई। इसके बाद कोसोवो, इराक और अफगानिस्तान के युद्धों ने इसे और पुष्ट किया। अब ‘नेटवर्क-सक्षम युद्ध’, ‘सटीक हमले’, ‘साइबर युद्ध’, और ‘सूचना संचालन’ जैसे विचार पश्चिमी सैन्य सोच के केंद्र में हैं।

भारत ने इन विचारों और शब्दावलियों को लगभग पूरी तरह से उधार लिया। हमारी आधिकारिक सैन्य चर्चा, रणनीतिक दस्तावेज़, भाषण और नीतिगत लेख पश्चिमी शब्दावली से भरे हैं। जबकि हमारे संघर्ष, भूगोल और शत्रु पूरी तरह भिन्न हैं।

कोल्ड स्टार्ट सिद्धांत की कहानी

ऑपरेशन सिन्डूर के संदर्भ में भारत के ‘कोल्ड स्टार्ट सिद्धांत’ को याद करना आवश्यक है। यह सिद्धांत भारतीय थिंक टैंकों में विकसित हुआ, लेकिन शुरुआती दिनों में इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। बाद में यह गोपनीय दस्तावेज़ बन गया और अंततः भुला दिया गया। इसका मकसद केवल पश्चिम को यह विश्वास दिलाना था कि भारत पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को रोकने की क्षमता रखता है। वास्तव में यदि पाकिस्तान परमाणु हथियार विकसित न भी करता, तो भी कोल्ड स्टार्ट सिद्धांत शायद अस्तित्व में नहीं आता।

चीन का अलग रास्ता

पिछले 75 वर्षों में चीन ने बिल्कुल अलग दिशा पकड़ी। कभी गरीबी और पिछड़ेपन से जूझ रहा चीन आज आत्मनिर्भर सैन्य शक्ति है। उसने न केवल अपनी पारंपरिक क्षमता को मजबूत किया बल्कि अपनी रणनीतियाँ और युद्ध अवधारणाएँ भी विकसित कीं। ‘असैसिन्स मैस’, ‘ईटिंग द स्मॉल बिफोर द बिग’, ‘सैलामी स्लाइसिंग’, ‘वीक इंसाइसलमेंट’ जैसे सैन्य सिद्धांत चीन की अपनी देन हैं।

भारतीय रक्षा में नई सोच

भारत ने हाल के वर्षों में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। स्टार्टअप्स, आईआईटी, इंजीनियरिंग संस्थान और निजी उद्योग इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह बदलाव केवल हथियार निर्माण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें रणनीतिक सोच और सैन्य सिद्धांतों में भी आत्मनिर्भर बनना होगा।

महाभारत काल में महर्षि चाणक्य ने रणनीति और कूटनीति की जो नींव रखी, वह आज भी प्रासंगिक है। आधुनिक भारत को उसी परंपरा को आगे बढ़ाना होगा। जैसे डॉ. होमी भाभा ने परमाणु विज्ञान में दुनिया को नई दिशा दी, वैसे ही भारत को सैन्य विचारों में भी वैश्विक नेतृत्व करना चाहिए।

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