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द्वितीय विश्व युद्ध: मलाया अभियान, युद्धबंदी और आईएनए–आज़ाद हिंद फ़ौज

— देवेंद्र कुमार बुडाकोटी एवं स्वागता सिन्हा रॉय

मलेशिया के पेराक राज्य स्थित ताइपिंग के कॉमनवेल्थ युद्ध स्मारक की यात्रा के दौरान हमारे विचार उन भारतीय सैनिकों की ओर गए, जो द्वितीय विश्व युद्ध के मलाया अभियान के समय जापानी सेनाओं द्वारा मारे गए, घायल हुए या युद्धबंदी बनाए गए थे। इन भारतीय युद्धबंदियों में से अनेक बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में गठित आईएनए—आज़ाद हिंद फ़ौज—का हिस्सा बने।

ताइपिंग वॉर कब्रिस्तान द्वितीय विश्व युद्ध के मलाया अभियान के दौरान शहीद हुए मित्र राष्ट्रों के सैन्य कर्मियों का स्मारक और अंतिम विश्राम स्थल है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने ब्रिटिश मलाया—जिसमें वर्तमान मलेशिया और सिंगापुर शामिल थे—की रक्षा के समन्वय हेतु ‘मलाया कमांड’ की स्थापना की थी। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ के साथ ही इस कमांड को और सुदृढ़ किया गया।

मित्र राष्ट्रों की सेनाओं में ब्रिटिश भारतीय सेना का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। भारतीय सैनिक पैदल सेना, तोपखाना, इंजीनियरिंग तथा सहायक इकाइयों में सेवाएँ दे रहे थे। इन सैनिकों में बड़ी संख्या वर्तमान उत्तराखंड क्षेत्र से थी। इनमें रॉयल गढ़वाल राइफल्स (वर्तमान गढ़वाल राइफल्स) की दूसरी और पाँचवीं बटालियन तथा कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन (तत्कालीन 4/19 हैदराबाद रेजिमेंट) शामिल थीं।

दिसंबर 1941 में गढ़वाल राइफल्स की दूसरी बटालियन और कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन सहित कई भारतीय रेजिमेंटों को सक्रिय युद्ध में झोंक दिया गया। अपर्याप्त तैयारी और गंभीर रसद संबंधी कमियों के बावजूद इन इकाइयों ने साहस और दृढ़ संकल्प के साथ युद्ध किया। अनेक सैनिक मारे गए या घायल हुए, जबकि बड़ी संख्या में सैनिक युद्धबंदी बना लिए गए। जनवरी 1942 में गढ़वाल राइफल्स की नवगठित पाँचवीं बटालियन सहित अतिरिक्त इकाइयों की तैनाती की गई, किंतु अन्य भारतीय सेना बटालियनों की भाँति इन्हें भी भारी क्षति उठानी पड़ी और जीवित बचे सैनिक युद्धबंदी बना लिए गए।

इन्हीं भारतीय युद्धबंदियों में से—और बाद में मलाया में बसे भारतीय प्रवासियों के स्वयंसेवकों के सहयोग से—नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आईएनए अर्थात आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन हुआ।

मलाया अभियान में शहीद हुए अनेक सैनिकों को सिंगापुर के चांगी स्थित कॉमनवेल्थ युद्ध स्मारकों में तथा कुछ को मलेशिया के ताइपिंग वॉर कब्रिस्तान में स्मरण किया गया है। ताइपिंग कब्रिस्तान दो भागों में विभाजित है—ईसाइयों के लिए ‘क्रॉस ऑफ़ सैक्रिफ़ाइस’ तथा गैर-ईसाइयों के लिए ‘स्टोन ऑफ़ रिमेम्ब्रेंस’। यहाँ 500 से अधिक अज्ञात सैनिकों को रेजिमेंटल प्रतीकों वाले सफ़ेद ग्रेनाइट शिलालेखों के माध्यम से स्मरण किया गया है।

हमारी यात्रा के दौरान गढ़वाल राइफल्स के प्रतीक वाले चार सफ़ेद ग्रेनाइट शिलालेख एक पंक्ति में दिखाई दिए, जिन पर सरल शब्दों में अंकित था—
“भारतीय सेना का एक सैनिक, 1939–1945, रॉयल गढ़वाल राइफल्स, जून 1943।”

कब्रिस्तान की शांति, स्वच्छता और सुकून युद्ध और बलिदान की करुणा को और गहरा कर देते हैं। ये स्मारक शिलाएँ उत्तराखंड के सामाजिक इतिहास पर गंभीर चिंतन को प्रेरित करती हैं—जहाँ के पुरुषों ने दोनों विश्व युद्धों में लड़ने के लिए दुनिया के दूर-दराज़ हिस्सों की यात्रा की, उस समय जब घर पर अधिकांश लोग—विशेषकर महिलाएँ—अपने गाँवों से बाहर भी शायद ही गई थीं। आज, दुनिया देखने की आकांक्षा सार्वभौमिक हो चुकी है।

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लेखक परिचय : देवेंद्र कुमार बुडाकोटी समाजशास्त्री हैं, जबकि डॉ. स्वागता सिन्हा रॉय मलेशिया स्थित एक विश्वविद्यालय—यूटीएआर—में अध्यापन कार्यरत हैं।

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