शिक्षा/साहित्य

पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा के एकीकरण पर छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू

श्रीनगर (गढ़वाल), 16 फरवरी । हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास स्थित शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र में एमएमटीटीसी के तत्वावधान में “पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा का एकीकरण” विषय पर छह दिवसीय क्षमता निर्माण प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में 95 से अधिक शिक्षक एवं शोधार्थी प्रतिभाग कर रहे हैं।

उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली के प्रो. आर.एल. नारायण सिन्हा यूजीसी पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित रहे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वैश्विक ज्ञान-विमर्श की आधारशिला है। ऐसे पाठ्यक्रम भारतीय शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. एन.एस. पंवार ने भारतीय संस्कृति की उस समृद्ध परंपरा पर प्रकाश डाला, जिसने विश्व के ज्ञान-विज्ञान को गहराई से प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में भारतीय दृष्टिकोण का समावेश समय की आवश्यकता है।

चौरास परिसर निदेशक प्रो. आर.एस. नेगी ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता पर विचार व्यक्त किए। परिसर निदेशक प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रतिभागियों को शुभकामनाएं दीं।

प्रो. अनिल नौटियाल ने कहा कि भारतीय शिक्षा और संस्कृति का वैश्विक प्रभाव सदियों से स्थापित रहा है, जिसे पुनः पाठ्यक्रमीय संरचना में समुचित स्थान दिया जाना चाहिए। कार्यक्रम समन्वयक डॉ. अमरजीत सिंह ने प्रशिक्षण की रूपरेखा एवं उद्देश्यों की जानकारी दी।

एमएमटीटीसी के सह-निदेशक डॉ. राहुल कुंवर सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया तथा मंचासीन अतिथियों को स्मृति-चिह्न एवं अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। अंत में डॉ. सोमेश थपलियाल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह एवं एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो. डी.एस. नेगी के मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. पुनीत वालिया और शोधार्थी सागर पुरी ने संयुक्त रूप से किया।

प्रथम दिवस: पांच सत्रों में गहन विमर्श

कार्यक्रम के प्रथम दिवस पांच शैक्षणिक सत्र आयोजित किए गए। श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय की प्रो. कल्पना पंत तथा अमेटी विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर एवं यूजीसी प्रशिक्षक डॉ. कुसाग्र ने भारतीय ज्ञान प्रणाली की वैचारिक आधारभूमि पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किए।

प्रो. कल्पना पंत ने भारतीय दर्शन की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा वेद, उपनिषद, विभिन्न दर्शन-शास्त्रों और लोकानुभव से निर्मित एक समन्वित बौद्धिक परंपरा है। इसमें ज्ञान को केवल तर्क या इंद्रिय अनुभव तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि आत्मानुभूति, नैतिकता और लोकमंगल से जोड़ा गया है। उन्होंने न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत को भारतीय ज्ञान प्रणाली की आधारशिला बताते हुए कहा कि ये परंपराएं सत्य की बहुआयामी खोज और समन्वित दृष्टिकोण को स्वीकार करती हैं।

डॉ. कुसाग्र ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को एक समग्र ज्ञान-संरचना के रूप में व्याख्यायित करते हुए कहा कि यह केवल दार्शनिक विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, समाज, शासन, स्वास्थ्य और जीवन-व्यवहार से जुड़ी एक जीवंत एवं व्यवहारिक परंपरा है। उन्होंने कहा कि समकालीन पाठ्यक्रम में इसे वैज्ञानिक दृष्टि और आलोचनात्मक चिंतन के साथ समुचित स्थान दिया जाना चाहिए।

 

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