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कहीं संजय नेगी जैसा हस्र न हो जाए यशपाल राणा का

दिनेश शास्त्री-

आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस में पिछले दिनों घर वापसी का दौर चला था। चुनाव आने तक संभव है, इसमें तेजी आए लेकिन फिलहाल कांग्रेस के अपने ही घरेलू कारणों से इस पर ब्रेक सा लगा हुआ है। ताजा मामला कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी के देहरादून दौरे के समय सामने आया जब रुड़की के पहले मेयर यशपाल राणा की पार्टी में वापसी की बात चल रही थी। वैसे पार्टी में उनके एकाध पैरोकार तो हैं लेकिन वे अपने इरादे में सफल नहीं हो पाए। इस कारण आशंका जताई जा रही है कि कहीं रामनगर के संजय नेगी जैसा ही हस्र यशपाल राणा का भी न हो जाए।
आपको याद होगा संजय नेगी कांग्रेस में शामिल होना चाहते थे लेकिन पार्टी के एक बड़े वर्ग ने उनका रास्ता रोक दिया। कमोबेश यही हाल रूड़की में यशपाल राणा का होता दिख रहा है। कांग्रेस के एक पूर्व अध्यक्ष के करीबी यशपाल राणा पार्टी में घर वापसी को बेताब हैं। इसके लिए उनके लिए फील्डिंग सजाई गई और जल्द ही पार्टी में शामिल करने का भरोसा भी मिल गया था, लेकिन ऐन वक्त पर बिल्ली रास्ता काट गई और यशपाल राणा की उम्मीदें परवान चढ़ने से पहले ही धूल धूसरित हो गई। कांग्रेस की राजनीति के जानकार बताते हैं कि राणा की घरवापसी में पहले से पार्टी टिकट के दावेदार उनकी राह का रोड़ा बनते दिख रहे हैं। रुड़की से वर्तमान विधायक और प्रदेश सरकार में मंत्री प्रदीप बत्रा को टक्कर देने के लिए पूर्व मेयर गौरव गोयल इसी उम्मीद में कांग्रेस में आए थे कि विधानसभा चुनाव में उन्हें टिकट मिलेगा। इसी कारण बाकायदा दिल्ली में आयोजित समारोह में उन्हें कांग्रेस में शामिल किया गया था। तब उनके साथ पांच और लोगों ने भी कांग्रेस का दामन थामा था। जाहिर है सभी टिकट की प्रत्याशा में कांग्रेसी बने हैं। इस बीच पूर्व मेयर यशपाल राणा को कांग्रेस में शामिल करने की कोशिशें तेज हुई तो पर्दे के पीछे वही संजय नेगी जैसा पेंच यहां भी फंस गया। कांग्रेस में पहले से मौजूद लोग यशपाल राणा की घर वापसी को रोकने में इस कदर जुटे कि उन्होंने राणा की घरवापसी के संभावित नफा – नुकसान का गणित इस कदर समझाया कि वे दरवाजे पर ही ठिठक कर रह गए। हालांकि राणा ने उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं लेकिन शुरुआती रोड़े ने उनके समर्थकों को मायूस तो किया ही है। राजनीतिक क्षेत्रों में चल रही चर्चा पर भरोसा किया जाए तो यशपाल राणा की घर वापसी के लिए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह सर्वाधिक जोर लगा रहे थे।
बताते चलें कि प्रदीप बत्रा की केवल विधायक रहते कुछ कमजोरियां गिनाई जा रही थी। एंटी इनकंबेंसी का खतरा भी बताया जा रहा था लेकिन अब जबकि वह कैबिनेट मंत्री बन गए हैं तो हालात थोड़ा बहुत अनुकूल माने जा सकते हैं। फिर भी उनके लिए खतरा पूरी तरह टला नहीं है। इसी कारण कांग्रेस में टिकट के दावेदारों की संख्या में इजाफा दिख रहा है और यह घरवापसी की चाह इसी का नतीजा है।
थोड़ा अतीत में झांके तो बीते मेयर चुनाव में कांग्रेस से पूजा गुप्ता, भाजपा से अनीता देवी अग्रवाल पत्नी ललित मोहन अग्रवाल (वर्तमान मेयर) व कांग्रेस से बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में रूड़की नगर निगम के प्रथम मेयर यशपाल राणा ने अपनी धर्मपत्नी श्रेष्ठा राणा को चुनाव मैदान में उतारा था। उस चुनाव में यशपाल राणा की पत्नी दूसरे स्थान पर रही थी और उनकी हार भी मामूली अंतर से ही हुई थी। इस लिहाज से यशपाल राणा खुद को दमदार टिकटार्थी मान कर चल रहे थे लेकिन उनके विरोधियों ने अचानक चलती गाड़ी पर ब्रेक लगा दिया।
दूसरी ओर मेयर चुनाव में भाजपा से अनिता देवी अग्रवाल को टिकट दिलाने से लेकर पूरे चुनाव अभियान की कमान पार्टी विधायक एवं वर्तमान कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा ने ही संभाले रखी थी। इसके बावजूद कई मामलों में सरकार की नाकामी गिना कर सत्ता विरोधी रुझान का हवाला देकर कांग्रेस जनमत अपने पक्ष में मान कर चल रही है। ऐसे में कांग्रेस टिकट के दावेदार बढ़ रहे हैं। खासकर गोयल खेमा फिलहाल टिकट के प्रति आश्वस्त है और वे किसी भी कीमत पर प्रतिद्वंद्वी को टिकने न देने के लिए स्वाभाविक रूप से प्रयासरत हैं। देखना यह है कि यशपाल राणा कुछ कर दिखायेंगे या फिर उनका अंजाम भी संजय नेगी की तरह ही होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और इस न्यूज़ पोर्टल के सलाहकार मंडल के भी वरिष्ठ सदस्य हैं -एडमिन)

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