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राज्यसभा द्विवार्षिक चुनाव : और आसान होंगी मोदी सरकार की रहें

 

मोदी सरकार के लिए ‘ऊपरी सदन’ अब बाधा नहीं, समर्थन की राह पर

जयसिंह रावत –
लोकसभा में स्पष्ट बहुमत के बावजूद बीते एक दशक में मोदी सरकार को कई अहम विधेयकों के दौरान राज्यसभा में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ऊपरी सदन को विपक्ष लंबे समय तक सरकार की ‘चेक पोस्ट’ के रूप में इस्तेमाल करता रहा। लेकिन मार्च 16 को होने वाले राज्यसभा चुनावों के बाद यह तस्वीर तेजी से बदलती दिख रही है। उपलब्ध आंकड़े और राजनीतिक गणित इस ओर इशारा कर रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की संख्या राज्यसभा में निर्णायक रूप से बढ़ने जा रही है।
37 राज्यसभा सीटों पर होने वाले चुनावों में भाजपा के कम से कम आधी सीटें जीतने की संभावना जताई जा रही है। यह केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के लिए विधायी दृष्टि से बेहद अहम मोड़ साबित हो सकता है।

किन राज्यों से बढ़ेगी NDA की ताकत

जिन 10 राज्यों में ये सीटें खाली हो रही हैं, उनमें से अधिकांश में भाजपा या NDA की सरकार है या फिर उसका प्रभावशाली गठबंधन मौजूद है। महाराष्ट्र (7), ओडिशा (4), तेलंगाना (2), तमिलनाडु (6), छत्तीसगढ़ (2), पश्चिम बंगाल (5), असम (3), हरियाणा (2), हिमाचल प्रदेश (1) और बिहार (5) — इन राज्यों की विधानसभा संरचना साफ तौर पर भाजपा के पक्ष में झुकी हुई है।
महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना-एनसीपी (अजित पवार) गठबंधन के छह सीटें जीतने की संभावना है। असम में भाजपा सभी तीनों सीटें अपने नाम कर सकती है। हरियाणा, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस की सीमित संख्या भाजपा को बढ़त देती है। बिहार में भले ही जदयू की स्थिति कमजोर हो, लेकिन भाजपा वहां भी अपनी उपस्थिति बनाए रखने में सफल रहेगी।

विपक्ष की सीमाएँ और बिखराव

इन चुनावों में कांग्रेस को चार सीटें मिलने की संभावना है, लेकिन यह संख्या राज्यसभा में उसके प्रभाव को बढ़ाने के लिए नाकाफी है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस चार सीटें जीत सकती है, जबकि भाजपा को एक सीट मिलने की संभावना है। तमिलनाडु में डीएमके चार सीटें जीत सकती है, AIADMK एक सीट पर मजबूत है, जबकि एक सीट पर कड़ा मुकाबला हो सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्यसभा में विपक्ष का बिखराव जारी है। INDIA गठबंधन लोकसभा चुनाव में भले ही भाजपा को कड़ी चुनौती देता दिखा हो, लेकिन राज्यसभा के अंकगणित में यह एकजुटता कमजोर पड़ती नजर आती है।

मोदी सरकार के लिए क्यों अहम है राज्यसभा में बढ़त

राज्यसभा में NDA की संख्या बढ़ने का सीधा अर्थ है — सरकार के एजेंडे को अब पहले जैसी रुकावटों का सामना नहीं करना पड़ेगा। भूमि अधिग्रहण, श्रम सुधार, शिक्षा, चुनावी सुधार, न्यायिक प्रक्रियाओं से जुड़े विधेयक, और संघीय ढांचे को प्रभावित करने वाले कई कानून, जिन पर पहले विपक्ष ने रोक लगाई थी, अब अपेक्षाकृत आसानी से पारित हो सकेंगे।
तीसरे कार्यकाल में मोदी सरकार पहले ही यह संकेत दे चुकी है कि वह “बड़े और निर्णायक सुधारों” की ओर बढ़ना चाहती है। राज्यसभा में बहुमत या उसके करीब पहुंचना इस दिशा में सबसे बड़ी संस्थागत बाधा को खत्म कर देगा।

संविधान संशोधन की राह भी आसान?

हालांकि संविधान संशोधन के लिए अभी भी दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होगी, लेकिन राज्यसभा में मजबूत उपस्थिति से NDA को यह मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक बढ़त जरूर मिलेगी कि वह बड़े विमर्श और एजेंडा को आगे बढ़ा सके। समान नागरिक संहिता, ‘वन नेशन–वन इलेक्शन’ जैसे मुद्दों पर अब बहस केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि विधायी रूप से भी आगे बढ़ सकती है।

राज्यसभा का चरित्र और बदलती भूमिका

परंपरागत रूप से राज्यसभा को “विचारशील सदन” माना जाता रहा है, जहां जल्दबाजी में लिए गए फैसलों पर पुनर्विचार होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह सदन राजनीतिक टकराव का मंच भी बन गया। NDA की बढ़ती संख्या से यह सवाल भी उठेगा कि क्या राज्यसभा अपनी स्वतंत्र और संतुलनकारी भूमिका बनाए रख पाएगी, या वह भी लोकसभा की तरह सरकार-समर्थक सदन बनती चली जाएगी।

मोदी सरकार के लिए अहम् पड़ाव

मार्च 16 के राज्यसभा चुनाव केवल सीटों की संख्या का खेल नहीं हैं। यह मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की दिशा, गति और स्वरूप तय करने वाला अहम पड़ाव है। NDA की बढ़ती ताकत से सरकार पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली स्थिति में होगी। सवाल यह नहीं कि भाजपा अपने एजेंडे के अनुरूप विधेयक पारित करा पाएगी या नहीं, बल्कि यह है कि विपक्ष और लोकतांत्रिक संस्थाएं इस बदले हुए शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका कैसे निभाती हैं।

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