धर्म/संस्कृति/ चारधाम यात्रा

प्रतिस्पर्धात्मक और तनावपूर्ण जीवन में कर्म सिद्धांत की प्रासंगिकता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

मुरादाबाद, 28 मार्च। भारतीय दार्शनिक परिषद के तत्वावधान में तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के जैन अध्ययन केंद्र तथा भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र (आईकेएस) के संयुक्त सहयोग से “जैन कर्म सिद्धांत की समकालीन प्रासंगिकता” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देशभर से जैनोलॉजी के प्रख्यात विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भाग लेकर कर्म सिद्धांत के दार्शनिक, सामाजिक और वैज्ञानिक आयामों पर व्यापक चर्चा की।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के डॉ. फूलचंद प्रेमी जैन ने जैन दर्शन को जीवन प्रबंधन की एक प्रभावी एवं वैज्ञानिक प्रणाली बताया। उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र जैसे मूल सिद्धांत व्यक्ति को संतुलित, अनुशासित और जिम्मेदार जीवन जीने की दिशा प्रदान करते हैं। उन्होंने वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक और तनावपूर्ण जीवन में कर्म सिद्धांत की प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि यह व्यक्ति को अपने विचार, वाणी और कर्म के प्रति सजग बनाता है तथा अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद जैसे सिद्धांत सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करते हैं।


संगोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. फूलचंद प्रेमी जैन, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. रामनाथ झा, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की सदस्य डॉ. इंदु जैन, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. राजमल जैन, एलवीएसएसयू नई दिल्ली के प्रो. अनेकांत जैन तथा टीएमयू के कुलपति प्रो. वीके जैन द्वारा मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ किया गया।
विशिष्ट अतिथि प्रो. रामनाथ झा ने कर्म सिद्धांत को सामाजिक समरसता का आधार बताते हुए कहा कि यह केवल व्यक्तिगत आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में संतुलन, सहयोग और सद्भाव स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने वर्तमान समय में बढ़ती असहिष्णुता और नैतिक मूल्यों के ह्रास के बीच इस सिद्धांत की उपयोगिता पर जोर दिया।
डॉ. इंदु जैन ने अपने संबोधन में कहा कि आधुनिक और जटिल जीवन में कर्म सिद्धांत व्यक्ति को अपने प्रत्येक कर्म के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने जीवन में शुद्धता, पारदर्शिता और नैतिकता अपनाने का आह्वान किया, जिससे वे न केवल व्यक्तिगत सफलता प्राप्त कर सकें, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन भी ला सकें।
इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. राजमल जैन ने कर्म सिद्धांत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ‘कॉस्मिक लॉ’ से जोड़ते हुए कहा कि जैसे ब्रह्मांड में प्रत्येक क्रिया का परिणाम निश्चित होता है, उसी प्रकार मानव जीवन में भी हर कर्म का प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कर्म को ऊर्जा और कंपन के रूप में समझाते हुए इसके दूरगामी प्रभावों पर प्रकाश डाला।
प्रो. अनेकांत जैन ने जैन दर्शन में कर्म की दार्शनिक एवं वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए घातिया और अघातिया कर्मों का विस्तार से उल्लेख किया। वहीं टीएमयू के कुलपति प्रो. वीके जैन ने कहा कि प्रत्येक कर्म का सीधा संबंध उसके परिणाम से होता है, इसलिए जीवन में नैतिकता और जिम्मेदारी को आधार बनाना आवश्यक है।
द्वितीय सत्र में मगध विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. नलिन के. शास्त्री सहित डॉ. श्रेयांस जैन, डॉ. मेधावी जैन और अन्य विद्वानों ने कर्म सिद्धांत के आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यावहारिक पहलुओं पर विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर “Karma Theory in Jain Tradition”, “Indian Knowledge System: एक बहुविषयक दृष्टिकोण” तथा “जैन धर्म और सतत विकास लक्ष्य (SDGs): आधुनिक विश्व के लिए प्राचीन ज्ञान” शीर्षक से तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत और स्मृति चिह्न भेंट किए गए।
कार्यक्रम का संचालन आईकेएस सेंटर की समन्वयक डॉ. अलका अग्रवाल ने किया, जबकि जैन स्टडीज़ के निदेशक प्रो. विपिन जैन ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी और जैनोलॉजी के विद्वानों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

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