हिंसा तू न गई मेरे मन से…

–अरुण श्रीवास्तव देहरादून
कभी प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का लेख पढ़ा था ‘ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से’। इसे पढ़ने के बाद ऐसा लग रहा है कि ईर्ष्या का स्थान अब हिंसा ने ले लिया। आखिर इतनी हिंसा आती कहां से है? लोगों के मन में कौन भरता है इसे? इसके पीछे का कारण क्या है? क्योंकि नफ़रत के बिना हिंसा हो ही नहीं सकती? चाहे वो व्यक्तिगत हो या निजी।
माना कि ईर्ष्या और हिंसा, दोनों ही मानवीय संवेदनाओं और व्यवहार के जटिल पहलू हैं, लेकिन इनके स्वरूप और अभिव्यक्ति में गहरा अंतर है।
आमतौर पर किसी के मन में किसी व्यक्ति, समाज या समुदाय (इसमें देश को भी शामिल कर सकते हैं जैसे पाकिस्तान या चीन) के प्रति ईर्ष्या तब उत्पन्न होती है जब उसको लगता है कि उसके पास वह नहीं है जो दूसरों के पास है, या उसे अपनी किसी मूल्यवान वस्तु के खोने का डर होता है। पर हिंसा के पीछे ईर्ष्या, क्रोध या घृणा जैसे भाव होते हैं। तो क्या आये दिन होने वाली हिंसा का कारण भी घृणा है?
अब पश्चिम बंगाल को ही देखें तो लगता है जैसे हम कबिलाई समाज में रह रहे हों।
हिंसा का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव सभ्यता का। आदिम युग में कबीले आपस में लड़ते सामंती व्यवस्था में
राजघराने। वर्तमान में हम न तो कबीलाई समाज में रह रहे हैं और न राजतंत्र में। हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहते हैं और खुद को मदर ऑफ डेमोक्रेसी होने का दावा करते हैं। पर हकीकत कुछ और ही है। आज़ पूरे समाज़ में नफ़रत भरी हुई है। ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल का है। लोकतंत्र में लगभग सभी दल चुनाव को उत्सव कहते हैं पर चुनाव खत्म होते ही कलई खुल जाती है।
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक और चुनावी हिंसा की जड़ें काफी गहरी हैं। आज की हिंसक घटनाओं के लिए टीएमसी भी जिम्मेदार है। वामपंथियों को सत्ता से बाहर करने के लिए उसने बीजेपी और नक्सलियों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन लिया। अटल सरकार में टीएमसी की ममता बनर्जी दो बार मंत्रिमंडल में रहते हुए रेलवे मंत्री रहीं।
आजाद भारत में छठें-सातवें दशक में नक्सलवादी आंदोलन और कांग्रेस-वामपंथी दलों के बीच संघर्ष ने राज्य में हिंसा की शुरुआत की। इस दौर में राजनीतिक हत्याएं आम हो गईं थीं। वाममोर्चा
34 वर्षों के शासन के दौरान ‘कैडर आधारित’ नियंत्रण बढ़ा। इस दौर में श्रृंगूर व नंदीग्राम जैसी घटनाएं हुईं। राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए अर्से से हिंसा का सहारा लिया जाता रहा। कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े जन-संगठनों एसएफआई, डीवाईएफआई और सीआईटीयू के कार्यकर्ताओं को ‘डंडा वाहिनी’ के रूप में बदनाम बदनाम किया।
साढ़े तीन दशक बाद जब तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई तो उम्मीद बंधी कि हिंसा थमेगी, लेकिन राजनीतिक समीकरण बदलने के साथ ही संघर्ष भी जारी रहा। कार्यकर्ताओं की मार-पिटाई, हत्या पार्टी दफ्तरों पर कब्ज़ा करना चलन में आ गया जो 2026 में चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद से शुरू हो गया। ये सब तब हुआ जब सबसे ज्यादा संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती थी।
यह सच है कि टीएमसी के शासनकाल में हुए पंचायत चुनावों में भारी हिंसा हुई, हालांकि उसके पहले भी हुई थी। कई सीटों पर विरोधियों को नामांकन तक नहीं करने दिया गया। वो अपने-अपने घरों से से भी नहीं निकल पाए। इस बार के विधानसभा चुनाव के दौरान संभावित हिंसा का भूत खड़ा किया गया। मतदान के पहले तक तो हिंसा नहीं हुई, हिंसा हुई मतगणना समाप्त होने के, बीजेपी के जीतने के बाद और थमीं तो शपथग्रहण के आस पास। यानी लंबे समय तक सड़कों पर तांडव होता रहा। टीएमसी के कार्यालयों में तोड़-फोड़ होती रही। राह चलते टीएमसी की महिला नेता की घेराबंदी कर “जय श्री राम” के नारे लगाए जाते रहे। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम यानी पुरुषों में उत्तम कहा गया। गौर करने वाली बात ये भी है कि, जय श्रीराम ने नारे का रामानंद सागर की धारावाहिक रामायण से लिया। इसके पहले जय सियाराम या राम राम अभिवादन के रूप में कहने का चलन था। आज जय श्रीराम का उद्घोष सामने खड़ी भीड़ को डराने के लिए किया जा रहा है। एक समय में जब दुश्मनों की सेनाएं आमने-सामने हुआ करतीं तो एक तरफ से हर हर महादेव का उद्घोष होता था तो दूसरी ओर से अल्लाह हो अकबर की हुंकार भरी जाती थी। जय भवानी डकैत लोग कहते थे।
विरोधी दल के एक कार्यकर्ता को ऊपर से नीचे फेंक दिया गया। यह सब पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी में उनके सामने हुआ और वो मूकदर्शक बने रहे।
टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा के साथ अभद्रता विमान के अंदर की गई। ध्यान देने वाली बात ये है कि इन सबके
सनद रहे कि, कॉमेडियन कुणाल कामरा ने हवाई यात्रा कर रहे अर्णव गोस्वामी से कुछ सवाल किए,अर्णव के अनुसार वो अप्रिय थे। इतने पर संबंधित एयरलाइंस ने कुछ महीनों के लिए उन पर यात्रा प्रतिबंध लगा दिया था। मोइत्रा मामले में क्या हुआ पता नहीं। बहरहाल, उपद्रवियों ने बंगाल में लेनिन की मूर्ति/मूर्तियां तोड़ी, शायद जवाहरलाल नेहरू की भी। मूर्तियां तो त्रिपुरा में सत्ता परिवर्तन के लेनिन की भी तोड़ी गई और बंगाल के तर्ज़ पर हिंसा भी हुई। यह भी सनद रहे कि इसी तरह के कृत्य अफगानिस्तान में तालिबानियों ने भी किया था और सभी दलों सहित निंदा बीजेपी ने भी की थी क्योंकि मूर्तियां बुद्ध की थीं लेनिन और नेहरू की नहीं।
बात मुद्दे यानी की वो भी चुनावी हिंसा की, सत्ता बदलने के बाद हिंसा वहीं क्यों हुई जहां बीजेपी जीती। दो दशक से सत्ता में रही कांग्रेस हारी तो इतना खून नहीं बहा जितना माकपा के हारने के बाद और अंतिम दिनों में। अब यह सर्वविदित है कि, माकपा को सत्ता से बेदखल करने में टीएमसी को भाजपा व नक्सलाइटों का खुला समर्थन मिला। यानी ममता ने बीजेपी को आमंत्रित किया था। इन दिनों बंगाल के जैसे हालात हैं उससे लगता है कि, अब यह “भद्र लोक” नहीं है। सत्ता परिवर्तन तो हाल ही में केरलम, पुडुचेरी और तमिलनाडु सहित दो राज्यों में हुए लेकिन इतनी हिंसा कहीं नहीं हुई।
तो क्या अब भी कहने की स्थिति में हैं कि, सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा।
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8218070103.
