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बदलते युद्ध परिदृश्य के अनुकूल रक्षा बजट को ढालने का समय

 


-उषा रावत-
दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां युद्ध की परिभाषा तेजी से बदल रही है। अब सीमाओं पर आमने-सामने खड़ी विशाल सेनाओं की भिड़ंत ही युद्ध नहीं रही। तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर हमले, ड्रोन और अंतरिक्ष आधारित निगरानी प्रणालियां आधुनिक युद्ध के नए औजार बन चुके हैं। हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम—चाहे पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव हो, रूस-यूक्रेन संघर्ष हो या एशिया में सामरिक प्रतिस्पर्धा—इस परिवर्तन की स्पष्ट झलक देते हैं। ऐसे समय में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत की रक्षा नीतियां और बजट संरचना इस बदलती वास्तविकता के अनुरूप हैं?
भारत दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियों में शामिल है और उसके पास विशाल मानव संसाधन आधारित सेना है। लेकिन रक्षा बजट के उपयोग का ढांचा अभी भी पारंपरिक सोच से प्रभावित दिखाई देता है। वर्तमान व्यवस्था में रक्षा व्यय का बड़ा हिस्सा वेतन, भत्तों और पेंशन पर खर्च होता है, जबकि आधुनिक हथियारों, अनुसंधान और तकनीकी उन्नयन के लिए अपेक्षाकृत कम संसाधन उपलब्ध हो पाते हैं। यही वह बिंदु है जहां हमें गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता है।
बीते दशकों में भारत ने जिन युद्धों का सामना किया—चाहे 1971 का निर्णायक युद्ध हो या 1999 का कारगिल संघर्ष—वे मुख्यतः पारंपरिक सैन्य ताकत पर आधारित थे। उस समय बड़ी संख्या में सैनिकों और भारी हथियारों की भूमिका निर्णायक थी। लेकिन आज युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। अब युद्ध केवल भौतिक सीमाओं तक सीमित नहीं है; यह साइबर स्पेस, अंतरिक्ष और सूचना के क्षेत्र तक फैल चुका है। दुश्मन को कमजोर करने के लिए अब केवल सैन्य टकराव ही जरूरी नहीं, बल्कि उसकी संचार व्यवस्था, ऊर्जा तंत्र और वित्तीय ढांचे को भी निशाना बनाया जा सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह दिखा दिया है कि ड्रोन और सटीक मिसाइलें किस तरह पारंपरिक टैंकों और भारी हथियारों को चुनौती दे सकती हैं। इसी तरह पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव ने यह स्पष्ट किया है कि छोटे-छोटे तकनीकी हथियार भी बड़े सामरिक प्रभाव पैदा कर सकते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत अपनी सैन्य तैयारियों में इन बदलावों को पर्याप्त महत्व दे रहा है?
भारत के सामने एक विशेष चुनौती यह भी है कि उसे एक साथ कई मोर्चों पर तैयार रहना पड़ता है। एक ओर लंबी स्थलीय सीमाएं हैं, जहां पारंपरिक सैन्य तैनाती जरूरी है, वहीं दूसरी ओर समुद्री और हवाई सुरक्षा के नए आयाम भी तेजी से उभर रहे हैं। इसके अलावा साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इन सभी चुनौतियों का सामना केवल सैनिकों की संख्या बढ़ाकर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए उच्च तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण और स्मार्ट रणनीति की जरूरत है।
विकसित देशों के रक्षा ढांचे पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि वे अपने बजट का बड़ा हिस्सा अनुसंधान एवं विकास, उन्नत तकनीक और आधुनिक हथियार प्रणालियों पर खर्च कर रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हाइपरसोनिक हथियार, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश लगातार बढ़ रहा है। इसके मुकाबले भारत अभी भी मानव संसाधन आधारित सैन्य ढांचे पर अधिक निर्भर है, जो भविष्य की चुनौतियों के लिहाज से पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
यह भी एक सच्चाई है कि भारत में सेना को केवल सुरक्षा बल के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक संस्था के रूप में भी देखा जाता है। यह रोजगार प्रदान करती है और सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा का माध्यम भी है। लेकिन यदि रक्षा व्यवस्था पर अत्यधिक सामाजिक दायित्व डाल दिए जाएं, तो इससे उसकी मूल भूमिका—देश की सुरक्षा—प्रभावित हो सकती है। इसलिए संतुलन बनाना जरूरी है, जहां सेना अपनी प्राथमिक भूमिका पर केंद्रित रहे और सामाजिक दायित्वों के लिए अलग नीतिगत समाधान खोजे जाएं।
हाल के वर्षों में सरकार ने कुछ सुधारात्मक कदम उठाए हैं, जिनका उद्देश्य रक्षा खर्च को अधिक प्रभावी बनाना है। हालांकि इन कदमों को लेकर बहस और असहमति भी सामने आई है, जो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वाभाविक है। लेकिन यह समझना होगा कि बदलते समय के साथ सैन्य ढांचे में सुधार अनिवार्य है।
आगे की राह स्पष्ट है। भारत को अपने रक्षा बजट के उपयोग में संरचनात्मक बदलाव करने होंगे। अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाना, स्वदेशी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहन देना, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना और आधुनिक तकनीकों को तेजी से अपनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। इसके साथ ही, सैन्य प्रशिक्षण और रणनीति को भी तकनीक-आधारित बनाना होगा।
अंततः, यह केवल बजट का सवाल नहीं है, बल्कि दृष्टिकोण का भी है। यदि हम भविष्य के युद्धों के लिए तैयार रहना चाहते हैं, तो हमें अतीत की सोच से बाहर निकलकर नई रणनीति अपनानी होगी। भारत को यह तय करना होगा कि वह पारंपरिक सैन्य मॉडल पर टिके रहना चाहता है या फिर तकनीक-प्रधान आधुनिक युद्ध प्रणाली की ओर तेजी से बढ़ना चाहता है।
क्योंकि आने वाले समय में वही देश सुरक्षित रहेगा, जो युद्ध को केवल ताकत से नहीं, बल्कि तकनीक और रणनीति से जीतने की क्षमता रखेगा।

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