पर्यावरणब्लॉग

केदारनाथ में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अब तक शुरू नहीं, NGT को दिए हलफनामे के बावजूद देरी

 

देहरादून/केदारनाथ। केदारनाथ धाम में तीर्थयात्रियों की रिकॉर्ड बढ़ोतरी के बीच 600 केएलडी (किलोलीटर प्रतिदिन) क्षमता वाला सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) इस यात्रा सीजन में भी चालू नहीं हो पाया है, जबकि रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन ने फरवरी में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को दिए अपने हलफनामे में प्लांट को पूरी तरह तैयार बताया था। वर्तमान स्थिति यह है कि जहां प्रतिदिन 30 हजार से अधिक श्रद्धालु धाम पहुंच रहे हैं, वहीं यह प्लांट लगभग 20 हजार लोगों के हिसाब से डिजाइन किया गया है, जिससे क्षमता और वास्तविक दबाव के बीच गंभीर अंतर सामने आ रहा है।

प्रशासन ने अपने हलफनामे में कहा था कि प्लांट का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और परीक्षण के बाद इसे यात्रा शुरू होने से पहले चालू कर दिया जाएगा। लेकिन यात्रा शुरू होने के करीब 10 दिन बाद भी यह प्लांट गैर-क्रियाशील बना हुआ है। इससे प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर स्पष्ट हो गया है। यात्रा के पहले सप्ताह में ही दो लाख से अधिक श्रद्धालु केदारनाथ पहुंच चुके थे, जो इस क्षेत्र की सीमित अवसंरचना पर भारी दबाव का संकेत देता है।

स्थिति केवल एक प्लांट के शुरू न होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र में कचरा और सीवेज प्रबंधन की गंभीर समस्या को उजागर करती है। स्थलीय निरीक्षण में पाया गया कि यात्रा मार्ग और आसपास के इलाकों में कूड़ा प्रबंधन बेहद कमजोर है। पहाड़ियों पर फेंका जा रहा कचरा अंततः मंदाकिनी नदी में पहुंच रहा है, जिससे नदी प्रदूषण का खतरा बढ़ रहा है। अवैध कैंपिंग और अस्थायी टेंटों की बढ़ती संख्या भी इस समस्या को और गंभीर बना रही है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यात्रा के पहले सप्ताह में लगभग 1000 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा एकत्र कर संपीड़ित किया गया। हालांकि, यह मात्रा वास्तविक कचरा उत्पादन की तुलना में काफी कम मानी जा रही है। पिछले वर्ष भी केदारनाथ में उत्पन्न कुल कचरे का केवल लगभग 40 प्रतिशत ही वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित हो सका था। यह तथ्य कचरा प्रबंधन प्रणाली की सीमाओं को उजागर करता है।

अधिकारियों का कहना है कि STP को चालू करना उनकी प्राथमिकता में है और जल संस्थान से हैंडओवर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसके साथ ही डिपॉजिट रिफंड सिस्टम (DRS) लागू किया गया है, ताकि प्लास्टिक कचरे को नियंत्रित किया जा सके। कचरे के संकलन के लिए कॉम्पैक्टर भी लगाए गए हैं। हालांकि, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का यह भी कहना है कि सभी तीर्थयात्री धाम में रुकते नहीं हैं, इसलिए STP केवल स्थायी ढांचों से जुड़े सीवेज को ही ट्रीट करता है। इसके बावजूद अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि भविष्य में बढ़ती भीड़ को देखते हुए प्लांट की क्षमता बढ़ाना आवश्यक होगा।

यह पूरा परिदृश्य यह दर्शाता है कि समस्या केवल STP तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चारधाम यात्रा प्रबंधन की व्यापक खामियों की ओर इशारा करता है। केदारनाथ जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में तीर्थयात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके अनुरूप बुनियादी ढांचे का विस्तार नहीं हो पाया है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) का क्रियान्वयन भी कमजोर रहा है और “इको-सेंसिटिव ज़ोन” की अवधारणा के अनुरूप यात्रा को नियंत्रित करने के ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं।

विशेषज्ञ लंबे समय से केदारनाथ की “कैरिंग कैपेसिटी” तय करने की मांग कर रहे हैं। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने इस संबंध में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है, लेकिन अभी तक तीर्थयात्रियों की संख्या सीमित करने पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया है। ऐसे में बिना वैज्ञानिक सीमा तय किए लगातार बढ़ती भीड़ पर्यावरणीय असंतुलन और आपदा जोखिम को बढ़ा रही है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति की गंभीरता और स्पष्ट हो जाती है। वर्ष 2023 में केदारनाथ में लगभग 16.5 लाख श्रद्धालु पहुंचे थे, जबकि 2022 में यह संख्या 15 लाख से अधिक थी। इस वर्ष भी रिकॉर्ड तोड़ संख्या की संभावना जताई जा रही है। वहीं पूरे चारधाम यात्रा मार्ग पर हर साल लगभग 40 से 50 लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं, जो इस क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरणीय क्षमता पर भारी दबाव डालते हैं।

स्थानीय प्रशासन के लिए यह स्थिति एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। सीमित संसाधनों के बीच लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को संभालना, कचरा प्रबंधन, जल-निकासी, स्वास्थ्य सुविधाएं और आपदा प्रबंधन जैसी सेवाओं को सुचारु रखना आसान नहीं है। यही कारण है कि अब विशेषज्ञ “संख्या आधारित तीर्थयात्रा” की बजाय “सतत और नियंत्रित तीर्थ प्रबंधन” की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।

निष्कर्ष रूप में, केदारनाथ में STP का चालू न होना केवल एक प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि एक बड़े पर्यावरणीय और प्रबंधन संकट का संकेत है। यदि समय रहते बुनियादी ढांचे को मजबूत नहीं किया गया, तीर्थयात्रियों की संख्या को वैज्ञानिक आधार पर नियंत्रित नहीं किया गया और कचरा प्रबंधन को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो भविष्य में यह क्षेत्र गंभीर पर्यावरणीय संकट और संभावित आपदाओं की चपेट

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