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वैज्ञानिकों ने सूंघने की शक्ति (Smell) के उस ‘मानचित्र’ का अनावरण किया जिसकी लंबे समय से तलाश थी

A map of the thousand types of smell receptors in the olfactory tissue of a mouse nose, labeled by a color gradient. The bottom inset shows the precise spatial positions of a tagged subset of receptors.

दो नए अध्ययनों से पता चला है कि नाक में गंध-ग्राही (odor receptors) बेतरतीब ढंग से वितरित नहीं होते, बल्कि एक सटीक स्थानिक पैटर्न में व्यवस्थित होते हैं।

दशकों से वैज्ञानिक इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कर रहे थे कि हमारी नाक के भीतर लाखों गंध-संवेदी तंत्रिका कोशिकाएं (neurons) खुद को कैसे व्यवस्थित करती हैं। अब, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में एक अभूतपूर्व अध्ययन ने अंततः उस छिपे हुए ‘मानचित्र’ को खोज निकाला है जो हमारे सूंघने की इंद्रिय को नियंत्रित करता है। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका सेल (Cell) में प्रकाशित हुआ है।

अव्यवस्था में छिपी व्यवस्था

मानव और स्तनधारी जीवों की नाक में हज़ारों अलग-अलग प्रकार के गंध-ग्राही (smell receptors) होते हैं। अब तक माना जाता था कि ये रिसेप्टर्स नाक की परत (olfactory epithelium) पर बेतरतीब ढंग से बिखरे होते हैं। हालाँकि, प्रोफेसर संदीप रॉबर्ट दत्ता और उनकी टीम ने चूहों में 50 लाख से अधिक तंत्रिका कोशिकाओं का विश्लेषण करके यह साबित कर दिया कि यह तंत्र पूरी तरह से व्यवस्थित है।

शोध में पाया गया कि ये कोशिकाएं नाक में ऊपर से नीचे की ओर सटीक ‘क्षैतिज धारियों’ (horizontal stripes) में बंटी होती हैं। प्रत्येक धारी में विशिष्ट प्रकार के रिसेप्टर्स का समूह होता है। यह व्यवस्था वैसी ही है जैसे किसी पुस्तकालय में किताबें विषयों के आधार पर अलग-अलग अलमारियों में रखी होती हैं।

मस्तिष्क और नाक का समन्वय

अध्ययन की सबसे बड़ी खोज यह है कि नाक के भीतर बनी ये धारियां सीधे मस्तिष्क के ‘ऑल्फैक्ट्री बल्ब’ (olfactory bulb) के मानचित्र से मेल खाती हैं। इसका मतलब है कि जब हम किसी चीज़ को सूंघते हैं, तो वह सूचना एक निश्चित और पूर्वानुमानित रास्ते से होकर मस्तिष्क तक पहुँचती है। यह खोज सूंघने की शक्ति को देखने (vision) और सुनने (hearing) जैसी अन्य इंद्रियों के समान ला खड़ा करती है, जिनके बारे में हमें पहले से पता था कि वे मस्तिष्क में एक व्यवस्थित मानचित्र के जरिए काम करती हैं।

रेटिनोइक एसिड: जैविक मार्गदर्शक

वैज्ञानिकों ने उस तंत्र का भी पता लगाया है जो इन कोशिकाओं को उनकी सही जगह बताता है। उन्होंने पाया कि ‘रेटिनोइक एसिड’ (विटामिन-ए से प्राप्त एक अणु) नाक में एक विशेष ढाल या ‘ग्रेडिएंट’ बनाता है। नाक के ऊपरी हिस्से में इसकी सांद्रता अधिक होती है और नीचे की ओर कम। यही अणु एक जैविक ‘जीपीएस’ की तरह काम करता है, जो हर तंत्रिका कोशिका को यह निर्देश देता है कि उसे अपनी स्थिति के अनुसार कौन सा रिसेप्टर विकसित करना है।

भविष्य की चिकित्सा के लिए महत्व

यह खोज केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है। यह उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जो ‘एनोस्मिया’ (सूंघने की शक्ति का जाना) से जूझ रहे हैं, जो अक्सर कोविड-19 या अन्य तंत्रिका संबंधी बीमारियों के कारण होता है। इस बुनियादी मानचित्र को समझने के बाद, अब वैज्ञानिक ऐसी थेरेपी विकसित करने की दिशा में काम कर सकते हैं जो क्षतिग्रस्त तंत्रिका कोशिकाओं को सही स्थान पर पुनर्जीवित कर सके।

प्रोफेसर दत्ता के अनुसार, “यह हमारे सूंघने के तंत्र के उस रहस्य का जवाब है जिसे हम पिछले 30 वर्षों से ढूंढ रहे थे।” यह अध्ययन न केवल जीव विज्ञान की एक बड़ी कमी को पूरा करता है, बल्कि यह भी बताता है कि प्रकृति कितनी जटिलता और सटीकता के साथ हमारे शरीर का निर्माण करती है।

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