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माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई मापने वाली ऐतिहासिक वेधशाला अब खंडहर हाल में

 

-उषा रावत
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के सिरोंज स्थित “भूरी टोरी” नामक ऐतिहासिक वेधशाला, जिसने कभी दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई मापने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, आज उपेक्षा और टूट-फूट का शिकार होकर खंडहर में बदल चुकी है।

एक अंग्रेजी समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, सिरोंज के कल्याणपुर क्षेत्र की एक पहाड़ी पर स्थित यह स्थल 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश सर्वेक्षकों के लिए वैज्ञानिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। यहां से ब्रिटिश सर्वे ऑफ इंडिया ने “ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे” अभियान संचालित किया था। इसी विशाल सर्वेक्षण अभियान के माध्यम से भारतीय उपमहाद्वीप का वैज्ञानिक मानचित्रण किया गया और बाद में माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई का निर्धारण संभव हो सका।

रिपोर्ट में बताया गया है कि तत्कालीन सर्वेयर जनरल कर्नल जॉर्ज एवरेस्ट ने वर्ष 1840 में कल्याणपुर के इस त्रिकोणमितीय स्टेशन को “ओरिजिन ऑफ कैलकुलेशन” घोषित किया था। यह परियोजना भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, म्यांमार और श्रीलंका तक फैले विशाल भूभाग के मानचित्रण का आधार बनी।

उस समय उपग्रह और आधुनिक जीपीएस तकनीक उपलब्ध नहीं थी। सर्वेक्षक जंगलों, रेगिस्तानों और पर्वतीय क्षेत्रों में त्रिकोणमिति और कोणीय मापन के आधार पर दूरियां नापते थे। विलियम लैम्बटन द्वारा शुरू की गई इस परियोजना को बाद में जॉर्ज एवरेस्ट, एंड्रयू स्कॉट वॉ और जेम्स वॉकर ने आगे बढ़ाया। भारतीय गणितज्ञ राधानाथ सिकदर ने 1850 के दशक में इसी सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई की गणना की थी।

समाचार के अनुसार, कभी वैज्ञानिक गतिविधियों से गुलजार रहने वाला यह परिसर अब बदहाल स्थिति में है। वेधशाला के पत्थर उखाड़ लिए गए हैं, दीवारें क्षतिग्रस्त हैं और पेंडुलम सहित कई उपकरण चोरी हो चुके हैं। खुले आसमान के नीचे बनी काली पत्थर की संरचनाएं अब टूट चुकी हैं।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, निर्माण के दौरान यहां लगभग 700 मजदूर, चार हाथी, 42 ऊंट और 30 घोड़े कार्यरत थे। यह स्थल वैज्ञानिक दृष्टि से इतना महत्वपूर्ण था कि यहां से प्राप्त निर्देशांक दशकों तक दक्षिण एशिया के नक्शों, सैन्य मानचित्रों और प्रशासनिक सीमाओं का आधार बने रहे।

स्थानीय इतिहास प्रेमी शोएब गाजी ने इसे “छिपा हुआ नायक” बताते हुए कहा कि यह स्थान वैज्ञानिक विरासत का अनमोल प्रतीक है, लेकिन संरक्षण के अभाव में तेजी से नष्ट हो रहा है। उनका कहना है कि कल्याणपुर को इसलिए चुना गया था क्योंकि यह ग्रेट आर्क मापन और प्रधान मध्यान्ह रेखा के बीच रणनीतिक रूप से उपयुक्त स्थिति में था।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि सिरोंज भोपाल से सड़क मार्ग द्वारा लगभग दो घंटे की दूरी पर स्थित है, लेकिन इसके बावजूद यह स्थल पर्यटन और संरक्षण योजनाओं से लगभग बाहर है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि यह क्षेत्र ग्राम पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आता है।

ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे को आधुनिक भूगोल और मानचित्रण विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में माना जाता है। प्रारंभ में माउंट एवरेस्ट को “पीक-15” कहा जाता था। बाद में सर्वेयर जनरल जॉर्ज एवरेस्ट के सम्मान में इसका नाम “माउंट एवरेस्ट” रखा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक वेधशाला का संरक्षण किया जाए तो यह भारत की वैज्ञानिक विरासत और प्राचीन सर्वेक्षण तकनीकों को समझने का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकती है।

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