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सूर्य के कोरोना का रहस्य सुलझाने की दिशा में बड़ी सफलता, भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा नया तरीका

In a recent study by Aryabhatta Research Institute of Observational Sciences, (ARIES) Nainital, an autonomous institute of the Department of Science and Technology (DST), and Indian Institute of Technology (IIT) Delhi, advanced three-dimensional MHD simulations combined with forward modeling were used to investigate this question. The researchers Ms. Ambika Saxena, PhD student at ARIES and Prof. Vaibhav Pant from the Department of Physics, IIT, Delhi, performed simulations of an open-field coronal region containing density inhomogeneities across its transverse cross-section. Transverse waves were driven at the lower boundary and allowed to propagate upward along the structured magnetic field. Using forward modeling, they then computed how the plasma emission would appear in a commonly observed coronal spectral line, Fe XIII 10749 Å.

 

चित्र  : त्रिज्या ऊंचाई के साथ वर्णक्रमीय विषमता का विकास। पैनल (1) और (2) सिम्युलेटेड कोरोना में दो अलग-अलग ऊंचाइयों पर लिए गए स्नैपशॉट दिखाते हैं। ये मानचित्र दर्शाते हैं कि विभिन्न गतियों से गतिमान प्लाज्मा प्रेक्षित संकेत में कैसे योगदान देता है। ये पैटर्न प्रसारित तरंग द्वारा उत्पन्न जटिल गतियों को दर्शाते हैं।

By- Jyoti Rawat

सूर्य के बाहरी वायुमंडल यानी सौर कोरोना के अत्यधिक गर्म होने का रहस्य दशकों से वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी पहेलियों में से एक रहा है। अब भारतीय वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन ने इस रहस्य को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। वैज्ञानिकों ने सूर्य के कोरोना में छिपी अशांत गतिविधियों का पता लगाने का एक नया तरीका विकसित किया है, जिससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि सूर्य की सतह की तुलना में उसका बाहरी वायुमंडल लाखों डिग्री अधिक गर्म क्यों होता है।

सूर्य का कोरोना चुंबकीय संरचनाओं से भरा हुआ एक अत्यंत गतिशील क्षेत्र है। यहां लगातार विभिन्न प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती रहती हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं अनुप्रस्थ चुंबकीय जलगतिकीय (Magnetohydrodynamic-MHD) तरंगें, जिन्हें अल्फ़वेनिक या किंक तरंगें भी कहा जाता है। ये तरंगें चुंबकीय संरचनाओं के साथ आगे बढ़ते हुए कोरोना की संरचनाओं को अगल-बगल हिलाती रहती हैं।

वैज्ञानिक लंबे समय से जानते हैं कि ये तरंगें स्पेक्ट्रोस्कोपी में लाल और नीले डॉप्लर शिफ्ट उत्पन्न करती हैं, जो यह दर्शाते हैं कि प्लाज्मा कभी प्रेक्षक की ओर और कभी उससे दूर गति कर रहा है। लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं था कि क्या यही तरंगें कोरोनल स्पेक्ट्रल रेखाओं के आकार को भी प्रभावित करती हैं और उनमें दिखाई देने वाली रहस्यमयी विषमताओं का कारण बन सकती हैं।

सौर कोरोना और उसके संक्रमण क्षेत्र के पूर्व प्रेक्षणों में स्पेक्ट्रल रेखाओं में व्यापक रूप से नीली विषमताएं देखी गई थीं। इन्हें आमतौर पर ऊपर उठते प्लाज्मा प्रवाह, जेट या द्रव्यमान गति का संकेत माना जाता रहा है। दूसरी ओर, अनुप्रस्थ तरंगों को लगभग असंपीड्य समझा जाता था, इसलिए यह माना जाता था कि वे स्पेक्ट्रल रेखाओं में बड़े बदलाव उत्पन्न नहीं करतीं। यही कारण था कि इन तरंगों की भूमिका पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया।

इसी प्रश्न की गहराई से जांच करने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के वैज्ञानिकों ने उन्नत त्रि-आयामी MHD सिमुलेशन और फॉरवर्ड मॉडलिंग तकनीकों का उपयोग किया।

एआरआईएस की पीएचडी शोधार्थी सुश्री अंबिका सक्सेना और आईआईटी दिल्ली के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर वैभव पंत ने एक खुले कोरोनल क्षेत्र का सिमुलेशन तैयार किया, जिसमें घनत्व की असमानताओं वाली चुंबकीय संरचनाओं का अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने निचली सीमा से अनुप्रस्थ तरंगें उत्पन्न कर उन्हें चुंबकीय क्षेत्र के साथ ऊपर की ओर प्रसारित होने दिया। इसके बाद फॉरवर्ड मॉडलिंग के जरिए यह विश्लेषण किया गया कि प्लाज्मा उत्सर्जन सामान्यतः देखी जाने वाली कोरोनल स्पेक्ट्रल लाइन Fe XIII 10749 Å में किस प्रकार दिखाई देगा।

चरण मिश्रण से पैदा हुई सूक्ष्म अशांति

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अध्ययन, जो The Astrophysical Journal में प्रकाशित हुआ है, से पता चला कि जब अनुप्रस्थ तरंगें किसी संरचित चुंबकीय प्लूम के भीतर फैलती हैं, तो प्लाज्मा एक समान गति से नहीं चलता। प्लूम के भीतर घनत्व में मौजूद छोटे-छोटे अंतर तरंगों के साथ मिलकर “फेज मिक्सिंग” यानी चरण मिश्रण की प्रक्रिया उत्पन्न करते हैं।

समय के साथ यह प्रक्रिया सूक्ष्म स्तर पर अशांति विकसित करती है, जिससे चुंबकीय संरचनाओं के भीतर वेग और घनत्व की जटिल संरचनाएं बनती हैं। यही अशांति आगे चलकर स्पेक्ट्रल रेखाओं के स्वरूप को बदलने लगती है।

सौर कोरोना प्रकाशीय रूप से अत्यंत विरल होता है। इसका अर्थ है कि विभिन्न क्षेत्रों से आने वाला उत्सर्जन दृष्टि रेखा के साथ एक-दूसरे पर चढ़ जाता है। जब अलग-अलग वेग से गतिमान क्षेत्रों का संयुक्त उत्सर्जन देखा जाता है, तो परिणामी स्पेक्ट्रल रेखा पूर्णतः सममित नहीं रह जाती। इसके बजाय उसमें लाल और नीले रंग की वैकल्पिक विषमताएं विकसित हो जाती हैं, जो समय और ऊंचाई के साथ बदलती रहती हैं

स्पेक्ट्रल विषमताओं का नया रहस्योद्घाटन

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वैज्ञानिकों के अनुसार ये विषमताएं अनुप्रस्थ तरंगों, घनत्व असमानताओं और तरंग-प्रेरित अशांति के संयुक्त प्रभाव से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं। सिमुलेशन में दिखाई देने वाली विषमताएं स्पेक्ट्रल रेखा की शिखर तीव्रता के लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच गईं, जबकि द्वितीयक गति 30 से 40 किलोमीटर प्रति सेकंड तक दर्ज की गई।

अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि लाल और नीले रंग का यह वैकल्पिक पैटर्न स्वयं तरंग की गति के साथ बाहर की ओर फैलता है। इससे संकेत मिलता है कि केवल अनुप्रस्थ MHD तरंगों का संचरण ही व्यवस्थित स्पेक्ट्रल विषमताएं उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त हो सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में उच्च स्थानिक और वर्णक्रमीय रिज़ॉल्यूशन वाली वेधशालाओं, विशेष रूप से Daniel K. Inouye Solar Telescope (DKIST), की सहायता से इन घटनाओं का प्रत्यक्ष अवलोकन संभव हो सकेगा। इससे सौर कोरोना में तरंग-चालित गतिशीलता को समझने के लिए एक बिल्कुल नया निदान उपकरण विकसित हो सकता है।

यह अध्ययन न केवल सौर कोरोना के रहस्य को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि इससे अंतरिक्ष मौसम, सौर तूफानों और सूर्य-पृथ्वी संबंधों को समझने में भी नई संभावनाएं खुल सकती हैं।

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अध्ययन से संबंधित शोध पत्र Astrophysical Journal Publication पर उपलब्ध है।

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