हिमालयी धामों पर प्लास्टिक कचरे का बोझ

With the commencement of the pilgrimage to Kedarnath,one of the four sacred Dhams of the Central Himalayas, piles of plastic waste have already begun accumulating in this high-altitude Himalayan region. The Kedarnath Nagar Palika reported collecting 1 metric ton of plastic waste within just the first week of the pilgrimage. Alarmingly, this waste is from Kedarnath town alone, whereas the highest consumption of plastic for water and foodstuffs actually occurs along the 18 km trek that begins from Gaurikund. The pilgrimage season is scheduled to continue for another 23 weeks until November. One can only imagine the massive scale of the waste dumps that will accumulate by then.

–जयसिंह रावत–
मध्य हिमालय के चार धामों में से एक केदारनाथ की यात्रा के शुरू होते ही इस उच्च हिमालयी क्षेत्र में प्लास्टिक कचरे के अम्बार लगने लगे हैं। केदारनाथ नगर पालिका ने एक सप्ताह की यात्रा में ही 1 टन प्लाटिक कचरा जमा करने की बात कही है। यह कचरा भी केवल केदारपुरी का है, जबकि गौरीकुण्ड से शुरू होने वाले 18 किमी लम्बी पैदल मार्ग पानी और अन्य खाद्य पदार्थों के लिये प्लास्टिक का सर्वाधिक उपयोग होता है। यात्रा भी अभी अगले 23 सप्ताह, नवम्बर तक चलनी है। तब तक इस कचरे के कितने अम्बार लगेंगे, उसकी कल्पना की जा सकती है। इस कचरे की चपेट में केदारनाथ अकेला नहीं है। हर साल यात्रियों की संख्या बढ़ते जाने से हिमालय के इन चारों ही धामों में इस प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती जा रही है। यही नहीं फूलों की घाटी और दयारा बुग्याल जैसे अति संवेदनशील पर्यटन और ट्रैंिकंग स्थलों का इको सिस्टम भी कचरे से बोझिाल हो रहा है।
केदारनाथ नगर पालिका का 7 दिनों का यह प्लास्टिक संकलन केवल एक रैखिक (लाइनियर) अनुमान है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक है। मई और जून जैसे चरम महीनों में श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है, जिससे कचरे का उत्पादन भी असामान्य रूप से बढ़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2025 के यात्रा सीजन में केदारनाथ क्षेत्र में कुल 21.4 मीट्रिक टन ठोस कचरा उत्पन्न हुआ था, जिसमें से लगभग 60 प्रतिशत, यानी 12.7 टन कचरा बिना प्रोसेस किए खुले में डंप कर दिया गया। यह आंकड़ा अपने आप में यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि मौजूदा कचरा प्रबंधन व्यवस्था इस बढ़ते दबाव को संभालने के लिये अपर्याप्त है।
छह माह के यात्रा सीजन में बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे धामों में प्रतिदिन टनों के हिसाब से कचरा उत्पन्न हो रहा है। बद्रीनाथ में यह मात्रा प्रतिदिन 2.5 से 3 टन तक अनुमानित है, जबकि गंगोत्री में इसका 2 टन तक और यमुनोत्री में अपेक्षाकृत कम, लेकिन फिर भी लगभग 1 टन प्रतिदिन अनुमान किया गया है। जब इन सभी धामों को एक साथ देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरा हिमालयी क्षेत्र एक व्यापक अपशिष्ट संकट की चपेट में आ चुका है। इस संकट का प्रभाव केवल कचरे के ढेर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिमालय की मूल पारिस्थितिकी को भीतर से प्रभावित कर रहा है। देहरादून स्थित वाडिया हिमालयी भूगर्व विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार, केदारनाथ क्षेत्र एक अत्यंत संवेदनशील “प्रोग्लेशियल” भू-परिदृश्य है, जहाँ चट्टानें और मिट्टी अभी स्थिर नहीं हुई हैं। ऐसे क्षेत्र में जब प्लास्टिक कचरा प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को अवरुद्ध करता है, तो पानी का दबाव बढ़ता है और भूस्खलन की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। प्लास्टिक की परतें मिट्टी के भीतर जल प्रवाह को बाधित करती हैं, जिससे उपसतही कटाव (सब सरफेस इरोजन) तेज होता है और ढलानों की स्थिरता कमजोर पड़ती है। इसके अतिरिक्त, प्लास्टिक के अपघटन से निकलने वाले रासायनिक तत्व मिट्टी की संरचना को प्रभावित करते हैं। यह प्रक्रिया धीमी जरूर है, लेकिन इसका प्रभाव दीर्घकालिक और व्यापक होता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे केवल “कचरा समस्या” नहीं, बल्कि “भू-पर्यावरणीय अस्थिरता” का कारक मानते हैं।
गढ़वाल गढ़वाल विश्व विद्यालय के शोध इस संकट को जैविक दृष्टिकोण से और अधिक गंभीर बताते हैं। विश्वविद्यालय के अध्ययनों के अनुसार, चारधाम यात्रा के दौरान उत्पन्न होने वाले कचरे का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा सिंगल-यूज प्लास्टिक और मल्टी-लेयर्ड पैकेजिंग का होता है। यह प्लास्टिक धीरे-धीरे टूटकर माइक्रोप्लास्टिक्स में बदल जाता है, जो हिमालयी जल स्रोतों में पहुँचकर जल गुणवत्ता को प्रभावित करता है। ये सूक्ष्म कण न केवल जलजीवों के लिए हानिकारक हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकते हैं, क्योंकि अंततः यही जल गंगा के माध्यम से मैदानों तक पहुँचता है। इसी प्रकार जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा के एक अध्ययन के अनुसार, फूलों की घाटी और हेमकुंड साहिब के 19 किमी लंबे ट्रैक पर 4 महीने के सीजन में लगभग 29 मीट्रिक टन कचरा पैदा होता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि इस कचरे का 96.3 प्रतिशत हिस्सा अजैविक है, जिसमें कांच की बोतलें और प्लास्टिक प्रमुख हैं।
फूलों की घाटी जैसी विश्व प्रसिद्ध घाटी अपनी दुर्लभ वनस्पतियों और मौसमी पुष्पों के लिए विख्यात है, लेकिन प्लास्टिक कचरे का बढ़ता दबाव यहाँ की पारिस्थितिकी के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। इसकी बगल में विश्व के सर्वाधिक ऊंचाई वाले गुरुद्वारे, हेमकुड साहिब के पैदल यात्रा पथ की स्थिति और भी खराब है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्लास्टिक मिट्टी की वायु संचरण क्षमता को बाधित करता है, जिससे बीज अंकुरण प्रभावित होता है और पौधों की वृद्धि रुक जाती है। इसके अलावा, प्लास्टिक कचरा स्थानीय तापमान को भी प्रभावित करता है, जिससे सूक्ष्म जलवायु में बदलाव आता है और फूलों के खिलने का प्राकृतिक चक्र प्रभावित होता है। प्लास्टिक कचरे का वन्यजीवों पर सीधा प्रभाव और भी चिंताजनक है। भालू, कस्तूरी मृग और अन्य जीव कचरे में भोजन खोजने लगते हैं और अनजाने में प्लास्टिक निगल लेते हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उनकी प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ बदलने लगती हैं। इस पूरे संकट का एक और गंभीर आयाम ग्लेशियरों पर पड़ने वाला प्रभाव है। अध्ययनों में पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक्स अब हिमालयी ग्लेशियरों, झीलों और नदियों में व्यापक रूप से मौजूद हैं। ये कण बर्फ की सतह की परावर्तन क्षमता (ंएल्बीडो) को कम करते हैं, जिससे बर्फ तेजी से पिघलती है। इसका सीधा असर जल प्रवाह, नदी तंत्र और अंततः पूरे गंगा-यमुना बेसिन पर पड़ता है।
हालाँकि सरकार द्वारा “ग्रीन पिलग्रिमेज” जैसे प्रयास किए जा रहे हैं और कचरे को श्रेणियों में विभाजित कर वैज्ञानिक निस्तारण की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन वर्तमान आंकड़े यह दर्शाते हैं कि ये प्रयास अभी अपर्याप्त हैं। समस्या की जड़ में केवल प्रबंधन की कमी नहीं, बल्कि एक व्यापक दृष्टिकोण का अभाव है, जिसमें पर्यावरणीय सीमाओं को प्राथमिकता दी जाए। इस स्थिति की गंभीरता को समझते हुए आवश्यक है कि नीति निर्माण में वैज्ञानिक संस्थानों की सिफारिशों को केंद्रीय स्थान दिया जाए। कैरीइंग कैपैसिटी के आधार पर यात्रियों की संख्या सीमित करना, सिंगल-यूज प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लागू करना और कचरा वापस लाने की अनिवार्य व्यवस्था जैसे कदम अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं।
