सामूहिक श्रम के सहारे सांस ले रही पहाड़ की परंपरागत धान की रोपाई
पोखरी, 1 जून (राणा)। आधुनिक कृषि उपकरणों, सिंचाई सुविधाओं और पर्याप्त सरकारी संसाधनों के अभाव में पहाड़ की खेती आज भी परंपरागत तरीकों पर निर्भर है। कठिन परिश्रम के बावजूद कृषि से अपेक्षित आय न मिलने के कारण युवाओं का रुझान खेती से लगातार घट रहा है। इसके बावजूद ग्रामीण अपने पूर्वजों की कृषि परंपराओं को जीवित रखते हुए धान की रोपाई में जुटे हुए हैं।
विकासखंड पोखरी की विरसण सेरा ग्राम पंचायत के चेमड़ा गांव में इन दिनों धान की रोपाई का कार्य पूरे जोर-शोर से चल रहा है। गांव के समीप बहने वाले एक छोटे गदेरे का सीमित जलस्रोत ही यहां की कृषि का मुख्य आधार है। पानी की कमी के चलते ग्रामीण बारी-बारी से रातभर अपने खेतों में सिंचाई करते हैं। खेतों में पर्याप्त पानी भरने के बाद बैलों से जुताई कर उन्हें रोपाई के लिए तैयार किया जाता है।
ग्रामीण काश्तकार सत्येंद्र सिंह नेगी और विक्रम सिंह नेगी बताते हैं कि धान की खेती की शुरुआत ‘बिजवाण’ तैयार करने से होती है। इसके लिए चयनित खेतों में पहले धान का बीज बोया जाता है। पौधे तैयार होने पर महिलाएं उन्हें सावधानीपूर्वक उखाड़कर रोपाई के लिए तैयार करती हैं। इसके बाद गांव की महिलाएं घंटों तक पानी से भरे खेतों में खड़े होकर धान की रोपाई का कार्य करती हैं।
चेमड़ा गांव में आज भी सामूहिक श्रम और आपसी सहयोग की पुरानी परंपरा जीवंत है। ग्रामीण एक-दूसरे के खेतों में मिलकर हल लगाते हैं और रोपाई का कार्य संपन्न कराते हैं। यही सामूहिकता और सहयोग की भावना पहाड़ की खेती को जीवित रखने का सबसे बड़ा आधार बनी हुई है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि क्षेत्र में सिंचाई नहरों का निर्माण किया जाए, आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराए जाएं तथा किसानों को समय पर तकनीकी मार्गदर्शन मिले, तो पहाड़ की खेती अधिक उत्पादक और लाभकारी बन सकती है। उनका मानना है कि उचित सुविधाएं मिलने पर खेती न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी, बल्कि युवाओं का कृषि के प्रति घटता रुझान भी फिर से बढ़ सकता है।
