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बंगाल में राजनीतिक प्रतिमान परिवर्तन…..

– देवेन्द्र कुमार बुडाकोटी

मई 2026 में पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने को राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। कभी बंगाल की राजनीति पर दशकों तक प्रभावी रहे वामपंथी दल आज अस्तित्व तो बनाए हुए हैं, किंतु उनका जनाधार काफी सीमित हो चुका है। वहीं लंबे समय तक राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी सत्ता से बाहर हो गई है। इस परिवर्तन की तीव्रता का अनुमान अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक भी नहीं लगा सके थे। यह इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि बंगाल को लंबे समय से कला, साहित्य, विज्ञान, शिक्षा और बौद्धिक चेतना के केंद्र तथा ‘भद्रलोक’ संस्कृति की भूमि माना जाता रहा है।

गोपाल कृष्ण गोखले का प्रसिद्ध कथन—“आज बंगाल जो सोचता है, भारत कल वही सोचता है”—उस समय दिया गया था जब बंगाल भारतीय पुनर्जागरण, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय जागरण का अग्रदूत था। आज यह प्रश्न फिर प्रासंगिक हो उठा है कि क्या बंगाल अब भी देश की राजनीतिक और वैचारिक दिशा निर्धारित करने की क्षमता रखता है? इसका उत्तर खोजने के लिए बंगाल के राजनीतिक और बौद्धिक विकास की ऐतिहासिक यात्रा को समझना आवश्यक है।

ब्रिटिश शासन के दौरान कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में 1911 तक ब्रिटिश भारत की राजधानी रहा। प्रशासनिक, शैक्षिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में बंगाल में आधुनिक शिक्षा का सबसे पहले विस्तार हुआ। कानून, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, साहित्य और सामाजिक विज्ञान जैसे क्षेत्रों में पश्चिमी शिक्षा के प्रसार ने एक नए शिक्षित मध्यम वर्ग का निर्माण किया।

उन्नीसवीं शताब्दी का बंगाल पुनर्जागरण भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक और सामाजिक घटनाओं में गिना जाता है। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और स्वामी विवेकानंद जैसे महान व्यक्तित्वों ने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई, महिला शिक्षा को प्रोत्साहित किया, तर्कशील चिंतन को बढ़ावा दिया और आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद की वैचारिक नींव मजबूत की। परिणामस्वरूप बंगाल औपनिवेशिक भारत के बौद्धिक और राजनीतिक नेतृत्व का केंद्र बन गया।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में बंगाल स्वतंत्रता आंदोलन, श्रमिक संघर्षों और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का भी प्रमुख केंद्र रहा। स्वतंत्रता के बाद लगभग तीन दशकों तक कांग्रेस ने राज्य की राजनीति पर प्रभुत्व बनाए रखा, किंतु बढ़ते सामाजिक असंतोष, किसान आंदोलनों और श्रमिक संघर्षों ने धीरे-धीरे वामपंथी राजनीति के लिए जमीन तैयार की।

1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया और लगातार 34 वर्षों तक शासन करता रहा। इस दौरान पश्चिम बंगाल देश में मार्क्सवादी राजनीति का सबसे मजबूत गढ़ बन गया। ट्रेड यूनियनों, किसान संगठनों और विश्वविद्यालयों में वामपंथी विचारधारा का व्यापक प्रभाव दिखाई देता था। उस समय अनेक राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना था कि बंगाल में वामपंथ का प्रभुत्व लगभग स्थायी हो चुका है। किंतु 34 वर्षों के लंबे शासन के बाद उसका पतन भारतीय राजनीति की सबसे अप्रत्याशित घटनाओं में शामिल हुआ।

2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस का सत्ता में आना राज्य की राजनीति में दूसरा बड़ा परिवर्तन था। टीएमसी ने कांग्रेस और वाम दलों दोनों के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ते हुए स्वयं को बंगाली अस्मिता, क्षेत्रीय गौरव और लोककल्याणकारी राजनीति के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित किया।

इसके बाद 2014 के पश्चात भाजपा ने राज्य में तेजी से अपना राजनीतिक विस्तार किया। परंपरागत रूप से सीमित उपस्थिति रखने वाली भाजपा ने शहरी मध्यवर्ग, हिंदू मतदाताओं, अनुसूचित जातियों, आदिवासी समुदायों तथा टीएमसी और वामपंथ से निराश युवाओं के बीच अपना आधार मजबूत किया। राष्ट्रवाद, नागरिकता, सीमा सुरक्षा, धार्मिक पहचान, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) जैसे मुद्दे राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गए।

भाजपा ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और स्वामी विवेकानंद जैसी ऐतिहासिक विभूतियों को केंद्र में रखकर बंगाल की सांस्कृतिक विरासत की नई व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसके साथ ही पारंपरिक भद्रलोक वर्ग से जुड़ी वाम-उदारवादी बौद्धिक परंपराओं को भी चुनौती मिली।

हालाँकि, बंगाल का राजनीतिक इतिहास केवल अभिजात बुद्धिजीवियों तक सीमित नहीं रहा। नील विद्रोह, तेभागा आंदोलन, किसान संघर्ष, श्रमिक आंदोलनों और नक्सलबाड़ी विद्रोह जैसे जनआंदोलनों ने यह सिद्ध किया कि बंगाल की राजनीति का निर्माण हमेशा व्यापक जनभागीदारी से हुआ है। यही कारण है कि राज्य में वैचारिक बहसें और राजनीतिक चेतना आज भी अन्य राज्यों की तुलना में अधिक सक्रिय दिखाई देती हैं।

आज यह बहस स्वाभाविक है कि क्या गोखले का कथन इक्कीसवीं सदी के भारत में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना एक शताब्दी पहले था। इसका उत्तर भले ही मतभेदों का विषय हो, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि बंगाल आज भी भारत के सबसे राजनीतिक रूप से जागरूक, वैचारिक रूप से सक्रिय और सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली राज्यों में शामिल है।

यदि मई 2026 का राजनीतिक परिवर्तन वास्तव में एक नए दौर की शुरुआत सिद्ध होता है, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि एक व्यापक राजनीतिक प्रतिमान परिवर्तन (Paradigm Shift) माना जाएगा। पुनर्जागरण और वामपंथी राजनीति के केंद्र से राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय पहचान और नए सामाजिक-राजनीतिक विमर्शों तक बंगाल की यह यात्रा भारतीय लोकतंत्र में हो रहे व्यापक परिवर्तनों का संकेत देती है।

ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या बंगाल एक बार फिर भारत की भावी राजनीति और समाज की दिशा का अग्रदूत बन रहा है, या यह परिवर्तन केवल राज्य की विशिष्ट राजनीतिक परिस्थितियों तक सीमित रहेगा? आने वाले वर्षों में इसका उत्तर भारतीय राजनीति की दिशा भी निर्धारित कर सकता है।

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लेखक परिचय :

देवेन्द्र कुमार बुडाकोटी समाजशास्त्री तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र हैं। उनके शोध कार्यों का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर अमर्त्य सेन की पुस्तकों में भी किया गया है।

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