क्षेत्रीय समाचार

थैली वाले दूध की बढ़ती पैठ से पहाड़ के दुग्ध व्यवसाय पर संकट

 

दिग्पाल गुसाईं की रिपोर्ट
गौचर, 1 जुलाई। मैदानी क्षेत्रों से प्लास्टिक की थैलियों में पैक होकर आने वाले विभिन्न कंपनियों के दूध ने पहाड़ के पारंपरिक दुग्ध व्यवसाय को गंभीर चुनौती दे दी है। स्थानीय दुग्ध उत्पादकों का कहना है कि बाजार में पैकेटबंद दूध की बढ़ती मांग के कारण उनका शुद्ध दूध उचित मूल्य पर नहीं बिक पा रहा है, जिससे उनकी आर्थिकी लगातार कमजोर होती जा रही है।
पहाड़ में खेती और पशुपालन सदियों से लोगों की आजीविका का प्रमुख आधार रहे हैं। राज्य गठन के समय भी स्थानीय कृषि और पशुपालन को बढ़ावा देने की अपेक्षा की गई थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि एक ओर जंगली जानवरों, बंदरों और जंगली सूअरों के कारण खेती संकट में है, वहीं दूसरी ओर पैकेटबंद दूध की बढ़ती बिक्री ने दुग्ध व्यवसाय को भी नुकसान पहुंचाया है।
स्थानीय पशुपालकों का कहना है कि पशु चारा और पशु आहार की कीमतों में पिछले कुछ वर्षों में 300 से 400 रुपये प्रति कुंतल तक की वृद्धि हुई है। इसके बावजूद वे अपना शुद्ध दूध 60 रुपये प्रति लीटर से अधिक कीमत पर नहीं बेच पा रहे हैं, जबकि बाजार में विभिन्न कंपनियों का पैकेटबंद दूध 70 से 72 रुपये प्रति लीटर तक बिक रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कई कंपनियां आधा किलो के नाम पर बिकने वाले पैकेटों में निर्धारित मात्रा से कम दूध उपलब्ध कराती हैं। उनका कहना है कि इन उत्पादों की गुणवत्ता और वजन की नियमित जांच होनी चाहिए ताकि उपभोक्ताओं को सही मात्रा और गुणवत्ता का दूध मिल सके।
वर्तमान में पारस, मदर डेयरी, आनंदा, पतंजलि, परम, मधुसूदन, अमूल और आंचल सहित कई ब्रांडों का दूध गांव-गांव तक पहुंच चुका है। फुल क्रीम, काऊ और डबल टोंड दूध के अलावा दही और मट्ठा भी बड़े पैमाने पर बिक रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पैकेटबंद दूध की बढ़ती खपत के कारण कई युवाओं द्वारा शुरू की गई डेयरियां घाटे में जाकर बंद हो चुकी हैं।
हालांकि सरकार दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अनुदान पर दुधारू पशु उपलब्ध करा रही है, लेकिन उत्पादित दूध के लिए पर्याप्त बाजार उपलब्ध न होने से पशुपालकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
नौटी की मीना देवी, बैंसोड़ के कमल रावत, झिरकोटी की विजया देवी, बंदरखंड की उर्मिला धरियाल तथा ईशमिता गुसाईं सहित कई दुग्ध उत्पादकों का कहना है कि पैकेटबंद दूध के कारण उनके दूध के खरीदार कम होते जा रहे हैं और उन्हें मजबूरन कम कीमत पर दूध बेचना पड़ रहा है। उनका कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते स्थानीय दुग्ध व्यवसाय के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो यह पारंपरिक आजीविका पूरी तरह संकट में पड़ सकती है।
स्थानीय उत्पादन के बावजूद बाजार पर पैकेटबंद दूध का कब्जा
चमोली जिले के गौचर क्षेत्र में रानीगढ़ पट्टी, नागपुर पट्टी, कमेड़ा, नगरासू, शिवानंदी सहित दर्जनों गांवों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में दूध बाजारों तक पहुंचता है। इसके बावजूद इन क्षेत्रों में बाहर से आने वाले पैकेटबंद दूध की आपूर्ति भी लगातार बढ़ रही है।
स्थानीय बाजारों में इस बात को लेकर चर्चा रहती है कि जब क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में ताजा दूध उपलब्ध है, तब भी बाहरी कंपनियों का दूध इतनी बड़ी मात्रा में क्यों खप रहा है। कुछ लोग पैकेटबंद दूध की गुणवत्ता और शुद्धता पर भी सवाल उठाते हैं तथा इसकी नियमित जांच की मांग करते हैं। उनका कहना है कि खाद्य सुरक्षा विभाग को समय-समय पर पैकेटबंद दूध के वजन और गुणवत्ता की जांच कर उपभोक्ताओं तथा स्थानीय दुग्ध उत्पादकों के हितों की रक्षा करनी चाहिए।

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