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कॉकरोच पार्टी या अवसरों की राजनीति: क्या भारतीय सिर्फ सुरक्षा के लिए देश छोड़ते हैं?

-देवेंद्र कुमार बुढाकोटी-

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दिपके ने हाल ही में कहा कि यदि उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई तो वे अमेरिका लौटने के लिए विवश होंगे। इस बयान ने कुछ समय के लिए सुर्खियां जरूर बटोरीं, लेकिन इसके साथ एक बड़ा और अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने आया—आख़िर भारतीय यह निर्णय किन आधारों पर लेते हैं कि उन्हें कहाँ रहना है? क्या केवल व्यक्तिगत सुरक्षा ही इसका प्रमुख कारण है, या बेहतर अवसरों और उच्च जीवन-स्तर का आकर्षण अधिक प्रभावशाली होता है?

करोड़ों भारतीयों के लिए इसका उत्तर स्पष्ट है। सुरक्षा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन विदेश जाने का सबसे बड़ा कारण प्रायः यह नहीं होता। बेहतर शिक्षा, आकर्षक रोजगार, अधिक आय, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएँ, सामाजिक सुरक्षा, स्वच्छ शहर तथा पारदर्शी और पूर्वानुमेय प्रशासनिक व्यवस्था लोगों को विदेशों की ओर आकर्षित करती हैं। मातृभूमि के प्रति प्रेम बना रहता है, लेकिन बेहतर भविष्य की आकांक्षा अक्सर उस पर भारी पड़ जाती है।

आज प्रवासन भारतीय मध्यम वर्ग की महत्वाकांक्षाओं का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। अनेक परिवारों के लिए अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजना केवल शैक्षणिक निवेश नहीं, बल्कि स्थायी रूप से वहीं बसने की दिशा में पहला कदम होता है। माता-पिता अपनी जीवनभर की बचत इस उम्मीद में खर्च करते हैं कि उनके बच्चे विदेश में बेहतर रोजगार प्राप्त करेंगे, स्थायी निवास हासिल करेंगे और अंततः वहाँ की नागरिकता भी प्राप्त कर लेंगे। विवाह संबंधों पर भी इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। कई मामलों में जाति, समुदाय और यहाँ तक कि राष्ट्रीयता भी सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की संभावना के सामने गौण हो जाती है।

भारतीय प्रवासन की कहानी केवल आज के छात्र वीज़ा तक सीमित नहीं है। औपनिवेशिक काल में हजारों भारतीयों को गिरमिटिया श्रमिकों के रूप में मॉरीशस, फिजी, मलेशिया, गुयाना और सूरीनाम जैसे देशों के गन्ना, चाय, रबर तथा कॉफी के बागानों में काम करने के लिए भेजा गया था। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी भाषा, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा। यही विरासत आज दुनिया भर में फैले सशक्त भारतीय प्रवासी समुदाय की आधारशिला बनी।

समय के साथ प्रवासन का स्वरूप भी बदलता गया। पहले व्यापारी और छोटे उद्यमी विदेश गए, फिर विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य क्षेत्रों के पेशेवरों ने विदेशों का रुख किया। सूचना प्रौद्योगिकी के युग में इंजीनियर, वैज्ञानिक, चिकित्सक और आईटी विशेषज्ञ आधुनिक भारतीय प्रवासन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। आज भारत विश्व के सबसे बड़े कुशल मानव संसाधन निर्यातकों में शामिल है और भारतीय मूल के लोग दुनिया के अनेक देशों में प्रभावशाली पदों पर कार्यरत हैं।

प्रवासन ने भारतीय समाज में भी व्यापक परिवर्तन किए हैं। बहुसांस्कृतिक वातावरण में रहने से विभिन्न समुदायों और संस्कृतियों के बीच विवाहों को अधिक स्वीकार्यता मिली है। विदेशों में बसे भारतीयों के बीच जाति, धर्म और क्षेत्रीय पहचान की पारंपरिक सीमाएँ काफी हद तक कमजोर हुई हैं। ऐसे परिवर्तन अब धीरे-धीरे शहरी भारत में भी दिखाई देने लगे हैं। परिवारों की संरचना बदल रही है और उसके साथ-साथ रीति-रिवाज, भाषाएँ, सामाजिक संबंध तथा पारिवारिक नेटवर्क भी परिवर्तित हो रहे हैं। यह बदलाव भारत के उस सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर सकता है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत हमेशा परिवार और समुदाय रहे हैं।

इसके बावजूद एक असहज प्रश्न बना हुआ है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) जैसे विश्वस्तरीय संस्थानों से प्रतिभाशाली छात्र निकलने के बाद भी भारत अपने सबसे मेधावी युवाओं को विदेश जाने से क्यों नहीं रोक पा रहा है? इसका कारण केवल विकसित देशों का आकर्षण नहीं, बल्कि देश के भीतर पर्याप्त अवसरों का अभाव भी है। यदि भारत अपनी प्रतिभा को देश में बनाए रखना चाहता है तो उसे बेहतर शोध सुविधाएँ, योग्यता-आधारित करियर उन्नति, पारदर्शी प्रशासन, नवाचार के अनुकूल वातावरण और वैश्विक स्तर की कार्य परिस्थितियाँ उपलब्ध करानी होंगी।

विदेश जाने की इच्छा को देशभक्ति की कमी नहीं माना जाना चाहिए। प्रवासी भारतीय आज भी भारतीय त्योहार मनाते हैं, अपने परिवारों से जुड़े रहते हैं, भारत में निवेश करते हैं और हर वर्ष अरबों डॉलर की धनराशि रेमिटेंस के रूप में देश भेजते हैं। उनका भावनात्मक संबंध भारत से उतना ही गहरा बना रहता है, भले ही उनका पेशेवर जीवन विदेशों में स्थापित हो।

इसलिए वास्तविक चुनौती किसी एक व्यक्ति को विशेष सुरक्षा उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि सुशासन के माध्यम से प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा और विश्वास सुनिश्चित करने की है। आवश्यकता ऐसे भारत के निर्माण की है, जहाँ प्रतिभाशाली नागरिक अवसर, सम्मान और आशा के कारण स्वयं यहीं रहना पसंद करें। आखिर राज्य और समाज से इससे अधिक अपेक्षा भी क्या की जा सकती है?

— लेखक समाजशास्त्री हैं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र हैं तथा उनके शोध का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन की पुस्तकों में किया गया है।

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