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पेटेंट बदल देगा ऊंटों की सूरत-सीरत

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज के डॉ. मुकुल सैन प्रतिभा के धनी, नवाचार के प्रति उनका नज़रिया बेमिसाल, 2024 से लेकर 2026 तक 12 आईपीआर ग्रांटेड, इनमें से 10 आईपीआर भारतीय हैं, कनाडा से 01 कॉपीराइट भी उनकी उपलब्धियों में शुमार, डॉ. सैन की झोली में आधा दर्जन इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस है, देश-विदेश में 28 शोध पत्रों के संग-संग अब तक दो किताबें भी हो चुकी हैं प्रकाशित 

-प्रो. श्याम सुंदर भाटिया-
तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज के डॉ. मुकुल सैन ने नवाचार में ऊंची छलांग लगाई है। डॉ. सैन ने घुमन्तू ऊंट पालकों के लिए जीवनदायिनी सरीखा डिजाइन पेटेंट यूके से प्राप्त किया है। उल्लेखनीय है, इन दिनों राजस्थान में न केवल ऊंटों का जीवन संकट में है, बल्कि घुमन्तू पालकों की रोजी-रोटी पर भी दांव लगा है। यूं तो ऊंटों की संख्या राजस्थान में सर्वाधिक है। एक आंकड़ें के मुताबिक हिन्दुस्तान में कुल ऊंटों का 85 प्रतिशत ऊंट केवल राजस्थान में पाए जाते हैं। यह बात दीगर है, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, यूपी आदि में भी ऊंटों का पालन किया जाता है। एक दर्जन पेटेंट अपनी झोली में रखने वाले डॉ. सैन ने इनके दर्द को संजीदगी से समझा है। इस पेटेंट से उन्होंने रेगिस्तान का जहाज कहे जाने वाले ऊंटों और उनके कारोबारियों के लिए आशा की किरण जगा दी है। डॉ. सैन को सोलर असिसटेड मोबाइल कैमल डेयरी मिल्किंग मशीन का यूके के इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी राइट्स ऑफिस से डिजाइन पेटेंट मिला है। यदि यह जमीनी हकीकत में बदलता है तो डिजाइन की गई इस मशीन में रेगिस्तान में भी 04 डिग्री तापमान तक घुमन्तू ऊंटों का दूध स्टोर किया जा सकता है। 20 लीटर क्षमता के डिजाइन की लागत करीब 1 से 1.5 लाख तक रहेगी। इस मशीन में चराई के दौरान मिल्किंग के बाद दूध ऑटोमेटिक ही ठंडा और स्टोर हो जाएगा। यह सौर ऊर्जा पर आधारित है, जोकि रेगिस्तान में भरपूर मात्रा में मिलती है। टीएमयू के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर श्री अक्षत जैन इस एक्सक्लूसिव पेटेंट डिजाइन पर डॉ. मुकुल सैन को बधाई देते हुए कहते हैं, यह पेटेंट ऊंटों और ऊंट पालकों के लिए बेशकीमती सौगात है। उन्होंने उम्मीद जताई, इस नवाचार से ऊंट के दूध का गुणवत्तापूर्ण संरक्षण के संग-संग बाजार का भी विस्तार होगा। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज़ के डीन प्रो. प्रवीन कुमार जैन कहते हैं, कॉलेज के लिए यह गौरव का विषय है। ऐसे प्रसंस्करण भविष्य में दूध के क्षेत्र में नई संभावनाएं और नवाचार के द्वार खोलेंगे। 
पंजाब के अबोहर में जन्मे डॉ. सैन ने ऊंटों और ऊंट पालकों के दर्द को करीब से देखा है। छोटूपन में यह दंश तो वह नहीं समझ पाए लेकिन एग्रीकल्चर और डेयरी में उच्च शिक्षा-दीक्षा के दौरान उन्होंने ऊंटों के जीवन कल्याण की ठानी। सोचा एक ऐसा डिजाइन ईजाद किया जाए, जिससे इनके दिन बहुर जाएं। डॉ. सैन नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिटयूट- एनडीआरआई, करनाल से डेयरी इंजीनियरिंग में पीएचडी हैं। राजस्थान के बीकानेर में प्रवास के दौरान उन्होंने ऊंट के दूध की गुणवत्ता के संरक्षण की ठानी, क्योंकि इसमें औषधीय गुण हैं। जैसे ऊंट का दूध बेनिफिसियल एक्टिव प्रोटीन से भरपूर है। डायबिटीज और पेट के रोगों में वरदान है। इसका प्रयोग ऑटिज़्म रोगियों के लिए भी किया जाता है। अब तक इसका सर्वाधिक बाजार मिल्क पाउडर के रूप में है। अब उम्मीद की जाती है, यह लिक्विड रूप में भी मिल जाएगा। डॉ. सैन प्रतिभा के धनी हैं। नवाचार के प्रति उनका नज़रिया बेमिसाल है। 2024 से लेकर 2026 तक 12 आईपीआर ग्रांटेड हैं। इनमें से 10 आईपीआर भारतीय हैं, कनाडा से 01 कॉपीराइट भी उनकी उपलब्धियों में शुमार हैं। डॉ. सैन की झोली में आधा दर्जन इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस हैं। 28 शोध पत्र देश-विदेश में प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. सैन की 2020 में नेचुरल फाइबर कंपोजिस्ट्स, 2023 में फ्यूचरिस्टिक ट्रेंड्स इन एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग एंड फूड साइंसेज़ पब्लिश हो चुकी हैं। इसके अलावा वेलेराइजेशन ऑफ वेस्ट राइस स्ट्रा और एडवांसेज़ इन इंडीजीनियस डेयरी प्रोडक्ट्स की पांडुलिपियां प्रकाशकों के पास हैं। इन पुस्तकों को स्प्रिंजर सरीखे इंटरनेशलन पब्लिशर्स प्रकाशित करेंगे। इसके अलावा आठ इंटरनेशनल बुक चैप्टर समेत एक लैब मैन्युअल भी उनकी झोली में है। डॉ. सैन भविष्य की प्लानिंग बताते हुए कहते हैं, दूध हमेशा से उनके चिंतन और मनन का विषय है। वह अब दूध के उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की तकनीकों पर भी रिसर्च करेंगे।  
हकीकत यह है, ऊंटों और पालकों की दुश्वारियां जग जाहिर हैं। देश में सर्वाधिक ऊंटों की संख्या राजस्थान में है। राजस्थान के ख़ासकर बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर सरीखे जिलों में पुरसा हाल नहीं है। कड़वी सच्चाई यह है, राजस्थान सरकार की आंख मूंदु नीति के चलते ऊंट पालन कारोबार मुनाफे का सौदा कभी नहीं रहा है। इस पेटेंट के बाद न केवल ऊंट पालक अपना दूध बेच सकेंगे, बल्कि इनके प्रति मुहब्बत में भी इजाफा होगा, क्योंकि सरकार की मौजूदा नीति के मुताबिक ऊंट को न तो वध के लिए नहीं बेचा जा सकता है और न ही अवैध ट्रैफिकिंग की जा सकती है। राजस्थान की रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाले ऊंट मशीनीकरण और परिवहन के आधुनिक साधनों के चलते ऊंटों की उपयोगिता में भारी गिरावट आई है। शोध रिपोर्टस के मुताबिक साढ़े चार दशक में राजस्थान में ऊंटों की संख्या 15 लाख से घटकर केवल एक लाख ही रह गई है। अंदेशा है, डायनासोर की मानिंद एक दिन ऊंट भी कागजों तक सिमट कर रह जाएंगे। ऐसे में डॉ. मुकुल सैन का पेटेंट ऊंटों और उनके पालकों के लिए भगवान सरीखा है। इस पेटेंट के बाद ऊंट से लेकर घुमन्तू पालकों तक की सूरत-सीरत बदल जाएगी। ऑटोमिल्किंग के संग-संग इमिडेट कूलिंग मिलेगी। हयूमन टच एक्सक्लूड हो जाएगा और दूध हाइजीन रहेगा। कोल्ड चेन मैनेजमेंट के कारण दूध की गुणवत्ता भी बरकरार रहेगी। दूध उपलब्धता में बेहतर वृद्धि हो जाएगी। ऊंट के दूध में थैरेप्यूटिक गुण होने के कारण एक्सपोर्ट के वैश्विक द्वार खुल जाएंगे। अंततः ऊंटों की तेजी से गिरती संख्या का ग्राफ भी रूक जाएगा। 
(प्रो. श्याम सुंदर भाटिया सीनियर जर्नलिस्ट हैं। प्रिंट मीडिया में चार दशक का प्रचुर अनुभव है। यदि आप इस स्टोरी का उपयोग करते हैं तो मेरे व्हाट्स अप नम्बर- 9258118529 पर पीडीएफ देने का सादर अनुरोध है।)

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