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भारत में स्तन कैंसर से जीवित रहने की दर बढ़ी

 

लेकिन विकसित देशों से अब भी काफी पीछे: WHO

नई दिल्ली। भारत में स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं के जीवित रहने की दर (सर्वाइवल रेट) पिछले कुछ वर्षों में लगातार बेहतर हुई है, लेकिन अभी भी यह विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी पहली देशवार रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्तन कैंसर का पता चलने के बाद केवल लगभग हर तीन में से दो महिलाएं (65.7%) ही कम-से-कम पांच वर्ष तक जीवित रह पाती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अंतर को कम करने के लिए बीमारी की शीघ्र पहचान और समय पर उपचार अत्यंत आवश्यक है।
2017-2021 के आंकड़ों पर आधारित अनुमान
WHO के अनुमान, जो प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर मेडिसिन (Nature Medicine) में प्रकाशित हुए हैं, के अनुसार वर्ष 2017-2021 के दौरान भारत में स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं की पांच वर्षीय जीवित रहने की अनुमानित दर 65.7% रही। इसके मुकाबले वैश्विक औसत (मीडियन) 77.8% है।
उच्च आय वाले देशों में यह दर 87.3%, अमेरिका क्षेत्र में 88.5% और यूरोपीय क्षेत्र में 84% दर्ज की गई।
भारत और दुनिया में पांच वर्षीय स्तन कैंसर सर्वाइवल रेट
भारत – 65.7%
वैश्विक मीडियन – 77.8%
उच्च आय वाले देश – 87.3%
उच्च-मध्यम आय वाले देश – 78.7%
निम्न-मध्यम आय वाले देश – 60.1%
निम्न आय वाले देश – 41.9%
WHO अमेरिका क्षेत्र – 88.5%
WHO यूरोप क्षेत्र – 84%
WHO अफ्रीका क्षेत्र – 39%
194 देशों का पहला व्यापक अध्ययन
यह अध्ययन पहली बार WHO के सभी 194 सदस्य देशों में स्तन कैंसर के पांच वर्षीय सर्वाइवल रेट का अनुमान प्रस्तुत करता है। इसका उद्देश्य WHO ग्लोबल ब्रेस्ट कैंसर इनिशिएटिव के तहत देशों को एक आधार उपलब्ध कराना है, ताकि प्रगति का आकलन किया जा सके। इस पहल का लक्ष्य हर वर्ष समयपूर्व स्तन कैंसर मृत्यु दर में 2.5% की कमी लाना और वर्ष 2040 तक 25 लाख लोगों की जान बचाना है।
भारत में सुधार हुआ, लेकिन चुनौतियां कायम
इससे पहले भारतीय शोधों में भी स्तन कैंसर से जीवित रहने की दर में सुधार दर्ज किया गया था। राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम (National Cancer Registry Programme) के 2024 के अध्ययन के अनुसार, 1990 के दशक में यह दर 31-54% थी, जो 2012-2015 के दौरान निदान हुई महिलाओं में बढ़कर 66.4% हो गई।
हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि समय पर जांच और गुणवत्तापूर्ण कैंसर उपचार तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित कर भारत अभी और सुधार कर सकता है।
जागरूकता और उपचार तक पहुंच सबसे बड़ी चुनौती
एम्स (AIIMS) में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. अभिषेक शंकर के अनुसार, भारत में 65.7% का सर्वाइवल रेट कैंसर उपचार प्रणाली की कई कमियों को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत-पीएमजेएवाई और सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग कार्यक्रमों से स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन आज भी अनेक महिलाएं कम जागरूकता, सामाजिक कलंक, आर्थिक कठिनाइयों और जांच में देरी के कारण कैंसर की उन्नत अवस्था में अस्पताल पहुंचती हैं।
इसके अलावा पैथोलॉजी, इमेजिंग, रेडियोथेरेपी, दवाओं और उपचार के बाद फॉलो-अप सेवाओं तक समान पहुंच न होना, विशेषकर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच असमानता, बेहतर परिणामों में बाधा बन रही है।
आय के अनुसार बड़ा अंतर
WHO की रिपोर्ट बताती है कि विभिन्न क्षेत्रों और आय वर्गों के देशों में जीवित रहने की दर में बड़ा अंतर है। इसका प्रमुख कारण कैंसर की शीघ्र पहचान, समय पर निदान और उपचार सुविधाओं तक पहुंच में असमानता है।
महिलाओं में सबसे आम कैंसर
रिपोर्ट के अनुसार, 158 देशों में स्तन कैंसर महिलाओं में सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर है। वर्ष 2024 में दुनिया भर में इससे लगभग 6.9 लाख महिलाओं की मृत्यु हुई, जिनमें से करीब 70% मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हुईं।
इन अनुमानों के लिए 67 देशों के कैंसर रजिस्ट्रियों के वास्तविक आंकड़ों का उपयोग किया गया, जबकि जिन देशों में पूर्ण रजिस्ट्री उपलब्ध नहीं थी, वहां सांख्यिकीय मॉडलिंग के माध्यम से अनुमान लगाए गए। अध्ययन में कैंसर का चरण, दवाओं और रेडियोथेरेपी की उपलब्धता, मैमोग्राफी क्षमता तथा वयस्क मृत्यु दर जैसे कारकों को भी शामिल किया गया।

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