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ब्रह्माण्ड में लिथियम वृद्धि के लिए सूर्य जैसे तारों का बुढ़ापा महत्वपूर्ण: भारतीय वैज्ञानिकों के नए निष्कर्ष

चित्र 1: तारों में रेड जायंट के माध्यम से तारों में लिथियम का विकास लाल विशाल, आरसी के एच इ -फ्लैश (आरजीबी टिप) और एच इ -कोर ज्वलन चरण

A study by Indian Institute of Astrophysics (IIA) scientists, published in Nature Astronomy, reveals that low-mass stars like our Sun produce lithium during their late-stage helium-core burning phase (“helium flash”), rather than destroying it as previously believed. This discovery solves a long-standing cosmic puzzle: why the universe contains far more lithium than standard stellar evolution models predict. The findings challenge established astronomical theories and indicate that the Sun will eventually become a lithium producer in about 6 to 7 billion years.

 

By- JYOTI RAWAT

हमारे स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वाहनों को ऊर्जा देने वाली हल्की, चमकदार धातु ‘लिथियम’ ने आधुनिक दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। आज की तकनीक का एक बड़ा हिस्सा लिथियम बैटरियों द्वारा ही संचालित है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ब्रह्मांड में यह लिथियम कहाँ से आता है?

खगोलविदों के लिए एक पुरानी पहेली

विज्ञान की अब तक की समझ यह थी कि लिथियम का अधिकांश हिस्सा करीब 13.7 अरब साल पहले हुए ‘बिग-बैंग’ (ब्रह्मांड की उत्पत्ति) के समय बना था। समय के साथ ब्रह्मांड में कार्बन, ऑक्सीजन और लोहे जैसे तत्वों की मात्रा में तो दस लाख गुना तक की भारी वृद्धि हुई, लेकिन लिथियम की मात्रा सिर्फ चार गुना ही बढ़ सकी। खगोलविदों के लिए यह हमेशा से एक बड़ी पहेली रहा है कि ब्रह्मांड में इस अतिरिक्त लिथियम को कौन बना रहा है, क्योंकि प्रचलित वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुसार हमारे सूर्य जैसे कम द्रव्यमान (मास) वाले तारे अपने पूरे जीवनकाल में लिथियम को बनाने के बजाय उसे नष्ट करते रहते हैं। यही वजह है कि एक ही समय पर बनने के बावजूद आज हमारे सूर्य में पृथ्वी की तुलना में 100 गुना कम लिथियम मौजूद है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने सुलझाई गुत्थी

इस दशकों पुरानी खगोलीय पहेली को भारत के वैज्ञानिकों ने सुलझा लिया है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए) के वैज्ञानिकों ने अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर पहली बार ठोस व्यावहारिक प्रमाण खोज निकाले हैं। प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर एस्ट्रोनामी’ में प्रकाशित इस ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार, सूर्य जैसे कम द्रव्यमान वाले तारे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में लिथियम को नष्ट नहीं करते, बल्कि बड़े पैमाने पर उसका उत्पादन करते हैं। शोधकर्ताओं ने इसके लिए ऑस्ट्रेलिया के ‘गैलाह’ (आकाशगंगा पुरातत्व परियोजना) सर्वेक्षण और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के ‘गाइया’ अंतरिक्ष मिशन से मिले हजारों तारों के स्पेक्ट्रा के विशाल डेटा का बारीकी से अध्ययन किया।

पुरानी धारणाओं को सीधी चुनौती

इस शोध के प्रमुख लेखक प्रोफेसर ईश्वर रेड्डी ने बताया कि यह खोज तारों से जुड़ी उस पुरानी वैज्ञानिक धारणा को सीधी चुनौती देती है जिसके तहत माना जाता था कि तारे लिथियम को खत्म कर देते हैं। इस खोज का सीधा सा मतलब यह है कि हमारा सूर्य भी अपने भविष्य में खुद लिथियम का निर्माण करेगा, जिसकी भविष्यवाणी मौजूदा स्थापित मॉडल नहीं कर पाते थे। इससे साफ होता है कि तारों के विकास से जुड़े सिद्धांतों में अब तक कोई महत्वपूर्ण भौतिक प्रक्रिया छूट रही थी।

क्या होता है “हीलियम फ्लैश”?

वैज्ञानिकों ने उस सटीक समय को भी ढूंढ निकाला है जब यह तारा लिथियम बनाना शुरू करता है; इसे “हीलियम फ्लैश” (तारे के केंद्र में अचानक हीलियम प्रज्वलन की शुरुआत) कहा जाता है, जो मुख्य हाइड्रोजन-ईंधन के खत्म होने के बाद होता है। हमारा सूर्य आज से करीब 6 से 7 अरब साल बाद अपने जीवन के इस अनोखे और चमकीले चरण में पहुंचेगा। इसके साथ ही, इस अध्ययन ने तारों को ‘लिथियम से भरपूर’ (लिथियम-रिच) श्रेणी में वर्गीकृत करने के लिए एक नया वैज्ञानिक पैमाना भी सुझाया है, जो पहले के तय मानकों से 250 गुना अधिक सटीक और संवेदनशील है।

भविष्य की राह और प्रेरणा

वैज्ञानिकों के लिए अब अगला रोमांचक कदम यह समझना होगा कि हीलियम फ्लैश के दौरान तारों के भीतर लिथियम बनने और आपस में घुलने-मिलने की वह अज्ञात परमाणु प्रक्रिया क्या है, जिसने बिग-बैंग के बाद से पूरे ब्रह्मांड में इस अनमोल तत्व को बढ़ाने में मदद की। भारतीय वैज्ञानिकों की इस शानदार सफलता पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने बधाई देते हुए कहा कि प्रोफेसर ईश्वर रेड्डी और उनकी टीम का यह शोध देश में मौलिक खोज विज्ञान का एक बेमिसाल उदाहरण है, जो निश्चित रूप से हमारे युवा वैज्ञानिकों को वैश्विक स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करेगा।

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[प्रकाशन विवरण :

https://www.nature.com/articles/s41550-020-1139-7. pdf

https://www.nature.com/articles/s41550-020-1139-7?utm_campaign=MultipleJournals_USG_ASTRO&utm_source=Nature_community&utm_medium=Community_sites&utm_content=BenJoh-Nature-MultipleJournals-Astronomy_and_Astrophysics-Global

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