दून पुस्तकालय में सुनील नेहरू ने साझा किए ऑडेन्स कोल आरोहण के रोमांचक अनुभव
देहरादून, 7 अगस्त, 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के सभागार में शुक्रवार को हिमालय के एक अत्यंत दुर्गम और रोमांचकारी उच्च पर्वतीय दर्रे ऑडेन्स कोल के आरोहण पर आधारित सचित्र व्याख्यान का आयोजन किया गया। प्रकृति, पर्वत और हिमालय के प्रति जिज्ञासा रखने वाले लोगों के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में पर्वतारोही एवं हिमालय प्रेमी सुनील नेहरू ने अपने ऑडेन्स कोल आरोहण से जुड़े अनुभव, संस्मरण और यात्रा के दौरान लिए गए मनोहारी छायाचित्रों के माध्यम से उपस्थित लोगों को उच्च हिमालय की रोमांचक दुनिया से परिचित कराया।
ऑडेन्स कोल लगभग 17,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक महत्वपूर्ण उच्च हिमालयी दर्रा है, जो गंगोत्री–III (21,506 फीट) तथा जोगिन–I (21,270 फीट) चोटियों के बीच स्थित है। यह दर्रा गंगोत्री के निकट स्थित रुद्रगैरा घाटी को केदारनाथ क्षेत्र की भिलंगना घाटी से जोड़ता है। अपने कठिन भूगोल, हिमनदों, बर्फीले ढलानों और चुनौतीपूर्ण मार्ग के कारण इसे भारतीय हिमालय के उत्कृष्ट उच्च हिमालयी पथारोहण मार्गों में गिना जाता है।
कार्यक्रम में सुनील नेहरू ने ऑडेन्स कोल की यात्रा के दौरान सामने आई भौगोलिक एवं प्राकृतिक चुनौतियों का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि “ऑडेन्स कोल तक पहुंचना केवल एक पर्वतारोहण अभियान नहीं, बल्कि हिमालय को उसके अत्यंत निकट से समझने और महसूस करने का अनुभव है। यहां प्रकृति हर कदम पर अपना अलग रूप दिखाती है। कठिन चढ़ाई, बदलता मौसम, बर्फ, ग्लेशियर और अत्यंत विरल वातावरण के बीच आगे बढ़ना जितना चुनौतीपूर्ण है, उतना ही रोमांचकारी भी। इस यात्रा ने मुझे हिमालय की विराटता, संवेदनशीलता और उसकी नाजुक पारिस्थितिकी को और गहराई से समझने का अवसर दिया।”
उन्होंने अपने सचित्र व्याख्यान में ऑडेन्स कोल क्षेत्र की भौगोलिक संरचना, हिमनदों, पर्वतीय मार्गों, मौसम की परिस्थितियों और अभियान के दौरान आने वाली कठिनाइयों को तस्वीरों के माध्यम से समझाया। उनके छायाचित्रों में उच्च हिमालय का विराट और अलौकिक प्राकृतिक संसार जीवंत दिखाई दिया। उन्होंने यात्रा के दौरान सामने आए कुछ रोचक प्रसंगों और संस्मरणों को भी साझा किया, जिन्हें श्रोताओं ने विशेष रुचि के साथ सुना।
ऑडेन्स कोल का नाम जॉन बिकनेल ऑडेन के नाम पर पड़ा, जो प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि डब्ल्यू. एच. ऑडेन के बड़े भाई थे। जॉन बिकनेल ऑडेन ने वर्ष 1939 में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए गंगोत्री क्षेत्र की पर्वत-श्रेणियों और हिमनदों का सर्वेक्षण करते हुए इस दर्रे की खोज की थी। कार्यक्रम में ऑडेन्स कोल के नाम और इसके ऐतिहासिक एवं पर्वतीय संदर्भों से जुड़े इन पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने सुनील नेहरू का स्वागत करते हुए कहा कि हिमालय को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि उसकी प्रकृति, संस्कृति, पर्यावरण और मानवीय अनुभवों के साथ समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे सचित्र व्याख्यान लोगों, विशेषकर युवाओं में हिमालय के प्रति जिज्ञासा और संवेदनशीलता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस अवसर पर विभापुरी दास, पुस्तकालयाध्यक्ष डी. के. पाण्डे, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश बाबला, चन्द्रशेखर सेमवाल, सुरेन्द्र सजवाण, द्विजेन्द्र बहुगुणा, विजय भट्ट,ओ.पी. भारद्वाज, देवेन्द्र काण्डपाल, आलोक सरीन सहित प्रकृति एवं हिमालय प्रेमी, लेखक, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार, युवा पाठक तथा बड़ी संख्या में पुस्तकालय के सदस्य और शहर के विभिन्न क्षेत्रों से आए लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में निकोलस ने सुनील नेहरू तथा सभी उपस्थित अतिथियों और श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से कहा गया कि पुस्तकालय समय-समय पर विविध विषयों, विभिन्न वर्गों और लोगों की रुचियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे कार्यक्रमों की पहल करता रहा है। पुस्तकालय का प्रयास है कि अध्ययन और पुस्तकों के साथ-साथ प्रकृति, पर्यावरण, कला, संस्कृति, इतिहास, साहित्य, विज्ञान, समाज और हिमालय से जुड़े विविध विषयों पर संवाद और विचार-विमर्श के लिए भी एक सार्थक मंच उपलब्ध कराया जाए।
कार्यक्रम सहज एवं संवादपरक वातावरण में सम्पन हुआ। उपस्थित लोगों ने सुनील नेहरू के अनुभवों तथा ऑडेन्स कोल से जुड़े उनके छायाचित्रों को हिमालय की दुर्गम दुनिया को निकट से देखने का एक महत्वपूर्ण अवसर बताया।
