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जब 1942 में भारत के कुछ हिस्सों में जनता ने संभाली सत्ता

During the 1942 Quit India Movement, the British launched “Operation Zero Hour,” arresting top national leaders to crush the uprising. Instead of collapsing, ordinary citizens seized control, establishing remarkable parallel governments (Samanantar Sarkar) in regions like Ballia, Satara, Tamluk, and Talcher—effectively liberating these areas five years before 1947. From Ballia’s brief democratic rule under Chittu Pandey to Satara’s three-year-long Prati Sarkar and Tamluk’s cyclone-resilient Jatiya Sarkar, these self-governing bodies ran independent courts, police forces, and welfare systems. This article highlights these historically overlooked revolts, proving that India’s freedom was forged by spontaneous, decentralized citizen power rather than top-down leadership alone..Jay Singh Rawat

–जयसिंह रावत –

15 अगस्त 1947 को भारत ने ब्रिटिश शासन से औपचारिक स्वतंत्रता हासिल की, लेकिन उससे पांच वर्ष पूर्व 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान बलिया, सतारा, तामलुक और ओडिशा के विभिन्न क्षेत्रों में जनता ने औपनिवेशिक सत्ता को बेदखल कर अपनी ‘समानांतर सरकारें’ (राष्ट्रीय सरकारें) स्थापित कर ली थीं। इन प्रयोगों की अवधि अलग-अलग रही—कहीं कुछ दिन तो कहीं कई वर्ष—लेकिन इनमें किसान, मजदूर, छात्र, महिलाएं और आम ग्रामीण व्यापक स्तर पर भागीदार बने।

8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया और महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया। 9 अगस्त की भोर में ब्रिटिश सरकार ने शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजों का मानना था कि नेतृत्व विहीन होते ही आंदोलन थम जाएगा, परंतु देश भर में स्वतःस्फूर्त जनविद्रोह फूट पड़ा और कई क्षेत्रों में इस विद्रोह ने वैकल्पिक प्रशासनिक संरचना का रूप ले लिया।

बागी बलिया: जनशक्ति का अल्पकालिक विद्रोह

उत्तर प्रदेश का बलिया जिला आंदोलन की तीव्रता के कारण ‘बागी बलिया’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में छात्रों, किसानों और आम नागरिकों ने सरकारी प्रतिष्ठानों, थानों व डाकघरों पर प्रदर्शन किए। स्थानीय कांग्रेस नेता पंडित चित्तू पांडे ने इस आंदोलन की कमान संभाली।

19 अगस्त 1942 को तत्कालीन जिलाधिकारी जगदीश्वर निगम ने जनदबाव के आगे झुकते हुए चित्तू पांडे के नेतृत्व में स्थानीय राष्ट्रीय सरकार के गठन की सहमति दी और सत्ता हस्तांतरित कर दी। जेलों से कार्यकर्ताओं को रिहा कराया गया और स्थानीय प्रशासन पर जनता का नियंत्रण स्थापित हुआ। हालांकि, अगस्त के अंतिम सप्ताह तक ब्रिटिश सरकार ने सैन्य बल के जरिए पुनः नियंत्रण स्थापित कर दमन चक्र शुरू कर दिया। कुछ दिनों का यह प्रयोग ऐतिहासिक साबित हुआ, जिसने दिखाया कि व्यापक जनसमर्थन के बल पर औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देकर वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी की जा सकती है।

सतारा कीप्रति सरकार’: वर्षों तक चली समानांतर व्यवस्था

बलिया का प्रयोग भले ही अल्पकालिक रहा, लेकिन महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थापित ‘प्रति सरकार’ ने 1943 से मई 1946 तक ब्रिटिश प्रशासन को लगातार चुनौती दी। क्रांतिसिंह नाना पाटिल के नेतृत्व में गठित इस सरकार में यशवंतराव चव्हाण, जी.डी. बापूलाड और किसन वीर जैसे नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सतारा के लगभग 150 गांवों में इसका गहरा प्रभाव था। ब्रिटिश अदालतों के विकल्प के रूप में ‘न्यायदान मंडल’ बनाए गए जो स्थानीय विवादों का निपटारा करते थे। आंदोलन की सुरक्षा और औपनिवेशिक संसाधनों पर कब्जे के लिए जी.डी. बापूलाड के नेतृत्व में ‘तूफान सेना’ नामक गुरिल्ला इकाई गठित की गई। प्रति सरकार ने राजनीतिक प्रतिरोध के साथ-साथ खाद्यान्न वितरण और सामाजिक सुधार के कार्य भी संचालित किए, जिससे कई गांवों में ब्रिटिश शासन पूरी तरह बेअसर हो गया।

तामलुक कीताम्रलिप्त जातीय सरकार

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले स्थित तामलुक उपखंड में 17 दिसंबर 1942 को ‘ताम्रलिप्त जातीय सरकार’ का गठन हुआ, जो सितंबर 1944 तक सक्रिय रही। सतीश चंद्र सामंत, सुशील कुमार धाड़ा और अजय मुखर्जी इसके प्रमुख सूत्रधार थे।

अक्टूबर 1942 में आए विनाशकारी चक्रवात के बाद इस सरकार ने प्रशासन, शिक्षा व स्वास्थ्य के साथ-साथ राहत व पुनर्वास का व्यापक कार्य संभाला। तामलुक आंदोलन का एक अमर अध्याय 71 वर्षीया मातंगिनी हाजरा का बलिदान है। 29 सितंबर 1942 को जुलूस का नेतृत्व करते हुए पुलिस की गोलियों से वे शहीद हो गईं, लेकिन अंतिम सांस तक राष्ट्रध्वज तिरंगा उनके हाथों में ऊंचा रहा। सितंबर 1944 में महात्मा गांधी के परामर्श पर इस जातीय सरकार को भंग किया गया।

ओडिशा में समानांतर प्रशासन और एरम का विद्रोह

ओडिशा के तालचर में किसानों और प्रजामंडल कार्यकर्ताओं ने ब्रिटिश समर्थित रियासती शासन के खिलाफ तीव्र प्रतिरोध किया। वहीं एरम-बासुदेवपुर क्षेत्र में सितंबर 1942 में पंचायतों व गांवों को मिलाकर ‘स्वाधीन बंचानिधि चकला’ नामक समानांतर व्यवस्था गठित की गई।28 सितंबर 1942 को एरम में एकत्र जनसभा पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें 29 आंदोलनकारी शहीद हुए। यह नरसंहार भारतीय इतिहास में ‘रक्ततीर्थ एरम’ के नाम से दर्ज हुआ।

समानांतर सरकारों का ऐतिहासिक महत्व

इन समानांतर सरकारों का मुख्य महत्व यह था कि इन्होंने औपनिवेशिक शासन के उस दावे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया, जिसके तहत भारतीयों को स्वशासन के अयोग्य बताया जाता था। बलिया, सतारा, तामलुक और ओडिशा के प्रयोगों ने साबित किया कि भारतीय जनता न केवल विरोध प्रदर्शन कर सकती है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर शासन व सामाजिक व्यवस्था को कुशलतापूर्वक संचालित भी कर सकती है।

यद्यपि दमनकारी सैन्य बल के प्रयोग से अंग्रेजों ने 1947 तक शासन बनाए रखा, लेकिन 1942 के इन प्रयोगों ने औपनिवेशिक सत्ता की नैतिक व प्रशासनिक वैधता को जड़ से कमजोर कर दिया। यह स्वतंत्रता संग्राम का वह स्वर्णिम अध्याय था, जब आम जनता ने स्वयं अपनी नेता बनकर स्वशासन की अद्भुत क्षमता का प्रदर्शन किया।

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लेखक परिचय : जयसिंह रावत उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और सामाजिक चिंतक हैं, जो लगभग आधी सदी से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वे PTI और दैनिक जागरण  सहित देश के प्रमुख समाचार पत्रों व एजेंसियों में  सेवाएं दे चुके हैं। उन्होंने उत्तराखंड के इतिहास, संस्कृति, पर्यावरण और जनजातीय समाज पर कई शोधपरक पुस्तकें व  सैकड़ों  लेख लिखे हैं। लेकिन इस लेख में प्रकट विचार और तथ्य उनके निजी हैं, जिनसे एडमिन की सहमति जरुरी नहीं-एडमिन 

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