देहरादून में भारत-नेपाल के बीच सीमा सुरक्षा पर महामंथन, खुले बॉर्डर की चुनौतियों से लेकर लिपुलेख तक चर्चा
सीमा अपराध, तस्करी, घुसपैठ और तीसरे देशों के नागरिकों की गतिविधियों पर नजर | सीमा स्तंभों के निर्माण, नो-मैन्स लैंड और जीपीएस मैपिंग पर भी विचार | लिपुलेख में भारत-चीन व्यापार को लेकर नेपाल की चिंता भी एजेंडे में

–उषा रावत द्वारा –
देहरादून, 21 अगस्त। भारत और नेपाल के बीच सीमा प्रबंधन एवं सुरक्षा को लेकर 14वीं संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group) की दो दिवसीय बैठक देहरादून में चल रही है। 20 और 21 अगस्त को हो रही इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी खुले सीमा क्षेत्र में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों, सीमा अपराध, तस्करी, अवैध आवाजाही, घुसपैठ, सूचनाओं के आदान-प्रदान और सीमा से जुड़े तकनीकी मामलों पर मंथन कर रहे हैं। बैठक में सीमा प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने के साथ-साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के मुद्दे भी शामिल हैं।

बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। उत्तराखंड में यह सीमा पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जिलों से लगती है। दोनों देशों के सीमावर्ती इलाकों में सदियों से लोगों की आवाजाही, सामाजिक संबंध और स्थानीय व्यापार होता रहा है। ऐसे में दोनों देशों के सामने चुनौती यह है कि सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जाए, लेकिन सामान्य नागरिकों की पारंपरिक आवाजाही और सीमा पार कारोबार प्रभावित न हो।

गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी कर रहे नेतृत्व
देहरादून में हो रही बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व गृह मंत्रालय की संयुक्त सचिव पौसुमी बसु कर रही हैं, जबकि नेपाली प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई नेपाल के गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव आनंद काफ्ले कर रहे हैं। दोनों देशों के गृह एवं विदेश मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों के अलावा सुरक्षा और सीमा प्रबंधन से संबंधित एजेंसियों के प्रतिनिधि भी चर्चा में शामिल हैं। भारतीय पक्ष की ओर से एसएसबी, आईटीबीपी और सर्वे ऑफ इंडिया सहित संबंधित संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है।
बैठक में सीमा पर तैनात सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और समय पर सूचनाओं के आदान-प्रदान पर विशेष जोर है। दोनों देशों की खुली सीमा का फायदा अपराधी नेटवर्क, तस्कर और अन्य अवैध गतिविधियों में शामिल तत्व न उठा सकें, इसके लिए संयुक्त निगरानी और समन्वय को मजबूत करने के उपायों पर विचार किया जा रहा है।
अपराध, तस्करी और अवैध आवाजाही पर नजर
नेपाल के काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, बैठक के एजेंडे में सीमा पार अपराध, धार्मिक कट्टरपंथ, तीसरे देशों के नागरिकों की आवाजाही, तस्करी, मादक पदार्थों का अवैध कारोबार, हथियारों और गोला-बारूद की अवैध आवाजाही तथा नकली भारतीय मुद्रा के प्रसार जैसे मुद्दे शामिल हैं। दोनों पक्ष सुरक्षा एजेंसियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान और सीमा प्रबंधन से जुड़े नियमों को अधिक प्रभावी बनाने पर भी चर्चा कर रहे हैं।
नो-मैन्स लैंड में अतिक्रमण और सीमा क्षेत्र में अनधिकृत कारोबार भी बैठक के महत्वपूर्ण विषयों में हैं। इसके अलावा सीमावर्ती जिलों के अधिकारियों के बीच पहले से चल रहे समन्वय तंत्र के फैसलों की समीक्षा भी की जा रही है। नेपाल और भारत के सीमावर्ती जिलों में स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय के लिए अलग-अलग स्तरों पर नियमित तंत्र मौजूद है।
सीमा स्तंभों की मरम्मत और जीपीएस मैपिंग
बैठक का एक महत्वपूर्ण पक्ष सीमा से जुड़े तकनीकी मामलों पर भी है। नेपाल की ओर से सीमा स्तंभों के निर्माण, क्षतिग्रस्त स्तंभों की मरम्मत और रखरखाव, नो-मैन्स लैंड के प्रबंधन तथा सीमा स्तंभों की जीपीएस मैपिंग जैसे विषय उठाए गए हैं। सीमा के आसपास रहने वाले लोगों की जमीन के स्वामित्व से संबंधित विवरणों के संकलन और सीमा पार आने-जाने वाले आम लोगों की व्यावहारिक समस्याओं पर भी चर्चा हो रही है।
इससे पहले 12 से 14 अगस्त के बीच लखनऊ में भारत और नेपाल के सर्वे अधिकारियों की बैठक हुई थी। इसमें सीमा से संबंधित तकनीकी काम को आगे बढ़ाने, सीमा स्तंभों के निर्माण और मरम्मत तथा आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से वास्तविक स्थिति का आकलन करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। ड्रोन से प्राप्त हवाई तस्वीरों और जमीन से जुटाए गए आंकड़ों के संयुक्त इस्तेमाल की दिशा में भी काम आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
पुराने नक्शों से लेकर सीमा विवाद तक
देहरादून बैठक में सीमा से जुड़े पुराने रिकॉर्ड और ऐतिहासिक नक्शों को भी चर्चा में शामिल किया गया है। सीमा निर्धारण से संबंधित पुराने दस्तावेजों को मौजूदा जमीनी स्थिति के साथ मिलाकर देखने की जरूरत पर विचार किया जा रहा है। इससे उन क्षेत्रों में सीमा प्रबंधन को लेकर स्पष्टता बढ़ाने में मदद मिल सकती है, जहां पुराने रिकॉर्ड और वर्तमान स्थिति के बीच अंतर को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार संयुक्त कार्य समूह का मूल दायरा सीमा प्रबंधन से जुड़े व्यावहारिक और तकनीकी मुद्दे हैं। कालापानी-लिपुलेख और सुस्ता जैसे बड़े क्षेत्रीय विवादों का अंतिम समाधान इस मंच के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। नेपाल के विश्लेषकों ने भी इस बात को रेखांकित किया है कि सीमा प्रबंधन की तकनीकी प्रक्रिया और बड़े राजनीतिक सीमा विवादों को अलग-अलग स्तर पर देखा जाता है।
लिपुलेख में भारत-चीन व्यापार पर नेपाल की चिंता
बैठक में लिपुलेख को लेकर नेपाल की चिंता भी महत्वपूर्ण विषय के रूप में सामने आई है। भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के माध्यम से व्यापार को लेकर नेपाल लंबे समय से अपनी आपत्ति दर्ज कराता रहा है। देहरादून में चल रही बातचीत में इस विषय पर नेपाल के रुख और चिंताओं को भी उठाया जा रहा है।
यह मुद्दा इसलिए संवेदनशील है क्योंकि लिपुलेख-कालापानी-लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच राजनीतिक मतभेद पहले से मौजूद हैं। ऐसे में सीमा प्रबंधन के व्यावहारिक विषयों पर बातचीत के साथ संवेदनशील सीमा क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों का सामने आना बैठक को सामान्य सुरक्षा बैठक से अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।
बदले क्षेत्रीय माहौल में बैठक का महत्व
देहरादून में यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब भारत और नेपाल के संबंधों में कई स्तरों पर नए सिरे से संवाद बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है। भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने 17 से 19 अगस्त तक नेपाल की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने नेपाली नेतृत्व और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। नेपाल के राष्ट्रपति ने उन्हें नेपाली सेना के मानद जनरल की उपाधि भी प्रदान की। उनकी यात्रा का प्रमुख उद्देश्य दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और सैन्य संबंधों को मजबूत करना था।
इससे कुछ दिन पहले भारत के नेपाल में राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने भी नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से मुलाकात की थी। दोनों देशों के बीच विकास परियोजनाओं, व्यापार, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई थी। ऐसे में देहरादून की सीमा सुरक्षा बैठक को व्यापक द्विपक्षीय संबंधों में संवाद बढ़ाने की कड़ी के रूप में भी देखा जा रहा है।
उत्तराखंड के लिए भी अहम
भारत-नेपाल सीमा से जुड़े मुद्दों का उत्तराखंड के लिए विशेष महत्व है। पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर के सीमावर्ती इलाकों में दोनों देशों के बीच पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक संपर्क है। सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ स्थानीय लोगों की आवाजाही, व्यापार और रोजमर्रा की गतिविधियां सुचारु रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
देहरादून में हो रही चर्चा में इसलिए सुरक्षा और सुविधा के बीच संतुलन अहम रहेगा। सीमा पर अपराध और तस्करी रोकने के लिए निगरानी बढ़ाने के साथ स्थानीय नागरिकों की वैध आवाजाही को अनावश्यक रूप से प्रभावित न करने पर भी दोनों देशों को सहमति बनानी होगी।
दो दिवसीय बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही होगा कि सीमा सुरक्षा और प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर केवल चर्चा न हो, बल्कि सीमा स्तंभों, नो-मैन्स लैंड, तकनीकी सर्वेक्षण, सूचना साझा करने और स्थानीय स्तर के समन्वय से जुड़े फैसलों को समयबद्ध तरीके से लागू करने की व्यवस्था भी बने। देहरादून में भारत और नेपाल के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हो रहा यह संवाद इसी दृष्टि से दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
